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गङ्गा

  • देवनदी । भीष्मकी जननी । महर्षि वसिष्ठके शाप और इन्द्रके आदेशसे आठ वसुओंका गङ्गाजीके गर्भसे शान्तनुपुत्र होकर जन्म लेना (आदि० ६७ । ७४) ।
  • गङ्गाजीका आदिदैविक रूप देवाज्ञाके तुल्य है, वे उसी रूपसे एक दिन ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित हुईं । उस समय वायुके झोंकेसे उनके शरीरका चाँदनीके समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा कुछ ऊपरकी ओर उठ गया । उस अवस्थामें उनकी ओर देखनेके कारण महाभिषको ब्रह्माजीके द्वारा मर्त्यलोकमें जन्म लेनेका शाप मिला और इन्हें भी उनके प्रतिकूल आचरण करनेके लिये उनके साथ जानेका संकेत प्राप्त हुआ (आदि० ९६ । ४-८) ।
  • महाभिषका चिन्तन करती हुई गङ्गाका वहाँ जाना और मार्गमें वसुओंसे उनकी उदासीका कारण पूछना (आदि० ९६ । ९-१२) ।
  • 'वसिष्ठके शापवश हमें मर्त्यलोकमें जन्म लेना पड़ेगा; वहाँ आप ही हमारी जननी हों' वसुओंकी गङ्गाजीसे प्रार्थना और इनका इस प्रार्थनाको स्वीकार करना (आदि० ९६ । १२- १६) ।
  • जन्म लेते ही जलमें फेंक देनेके लिये इनसे वसुओंकी अभ्यर्थना (आदि० ९६ । १९) ।
  • शान्तनुको एक पुत्र प्राप्त होनेके लिये इनका वसुओंद्वारा व्यवस्था कराना (आदि० ९६ । २०-२२) ।
  • अपना पति बननेके लिये राजा प्रतीपसे इनकी प्रार्थना (आदि० ९७ । ५) ।
  • दाहिनी जाँघपर बैठनेके कारण इन्हें पत्नीरूपमें नहीं, पुत्रवधूरूपमें प्रतीपका अङ्गीकार करना (आदि० ९७ । ११) ।
  • गङ्गाजीका प्रतीपकी आज्ञाको स्वीकार करना (आदि० ९७ । १२—१५) ।
  • राजा शान्तनुका गङ्गाजीके परम सुन्दर दिव्य लक्ष्मीके समान मनोरम, साक्षात् अनिन्द्य सौन्दर्यसे सम्पन्न, दिव्याभरणभूषित, सूक्ष्माम्बरविलसित तथा कमलोदरकान्तिसे सुशोभित दिव्य रूपका दर्शन तथा उनके प्रति आकृष्ट हो उनसे अपनी पत्नी बननेके लिये प्रार्थना (आदि० ९७ । २०—३३) ।
  • गङ्गाजीका कुछ शर्तोंके साथ उनके अनुरोधको अङ्गीकार करना (आदि० ९८ । १—४) ।
  • शान्तनुके द्वारा इनके गर्भसे आठ देवोपम पुत्रोंकी उत्पत्ति (आदि० ९८ । १२) ।
  • इनके द्वारा नवजात शिशुओंका जलमें प्रक्षेपण (आदि० ९८ । १३) ।
  • भीष्मका जन्म होनेपर उनके भी वधकी आशङ्कासे इनको शान्तनुकी कड़ी फटकार (आदि० ९८ । १६) ।
  • अपने रहस्यको प्रकट करके इनका शान्तनुको उनके नवजात शिशुओं (वसुओं) का संक्षिप्त परिचय देना (आदि० ९८ । १७—२४) ।
  • वसुओंको वसिष्ठद्वारा प्राप्त हुए शापकी बात बताकर और यही एक पुत्र चिरकालतक मानवलोकमें रहेगा, ऐसा कहकर इनके द्वारा शान्तनुके प्रति भीष्मके भावी गुणोंका वर्णन और पालनके लिये उसे साथ लेकर इनका अन्तर्धान हो जाना (आदि० ९९ । १०) ।
  • शान्तनुका गङ्गाजीसे अपने पुत्रको दिखानेके लिये कहना और गङ्गाजीका पालपोषकर बड़े एवं सुशिक्षित किये हुए उस पुत्रको राजाके हाथमें सौंप देना (आदि० १०० । ३०—४०) ।
  • गङ्गा प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली और सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें गिरी । इन सातोंके नाम हैं—गङ्गा, यमुना, सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी । इन धाराओंका जल पीनेवाले पुरुषोंके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं । ये गङ्गा देवलोकमें अलकनन्दा और पितृलोकमें वैतरणी नाम धारण करती हैं । इस मर्त्यलोकमें इनका नाम 'गङ्गा' है । इनका तीर्थरूपसे वर्णन (वन० ८५ । १८—१९) ।
  • इनका राजा भगीरथको वर देना (वन० १०८ । १५) ।
  • इनका भूतलपर गिरना (वन० १०९ । ८) ।
  • इनके द्वारा समुद्रका भरा जाना (वन० १०९ । १८) ।
  • अग्निकी उत्पत्तिके स्थानभूत नदियोमें इनकी भी गणना (वन० २२२ । २२) ।
  • परशुरामजीसे युद्धके लिये उद्यत भीष्मको डाँटना (उद्योग० १७८ । ८६—८८) ।
  • परशुरामजीसे भीष्मके लिये क्षमा माँगना (उद्योग० १७८ । ९२) ।
  • परशुरामजीके साथ होनेवाले युद्धमें सारथ्य करनेपर भीष्मका सारथ्य करना (उद्योग० १८४ । १६) ।
  • इनका अम्बाको नदी होनेका शाप देना (उद्योग० १८४ । १९) ।
  • मेरुपर्वतके शिखरसे दुग्धके समान श्वेत धारावाली, विश्वरूपा अपरिमित शक्तिशाली भयंकर वज्रपातके समान शब्द करनेवाली परम पुण्यप्रदा पुण्यवतो चारो शुभस्वरूपा पुण्यमयी भागीरथी गङ्गा बड़े प्रबल वेगसे सुन्दर चन्द्रमोहृद (चन्द्रकुण्ड) में गिरती हैं । गङ्गाद्वारा प्रकट किया हुआ वह हद समुद्रके समान प्रतीत होता है । भगवान् शङ्कर इन्हें एक लाख वर्षतक अपने मस्तकपर धारण किये रहे । ब्रह्मलोकसे उतरकर त्रिपथगामिनी गङ्गा पहले हिमशृङ्गके पास बिन्दुसरोवरमें प्रविष्ट हुई । वहींसे उनकी सात धाराएँ विभक्त हुई । जिनके नाम इस प्रकार हैं—सीतागङ्गा, नलिनी, पावनी, सरस्वती, जम्बूनदी, सीतागङ्गा और सिन्धु (भीष्म० ६ । २८—५०) ।
  • बाणशय्यापर पड़े हुए भीष्मके पास महर्षियोंको भेजना (भीष्म० ११९ । १७—१८) ।
  • इनका भागीरथी नाम पड़नेका कारण (द्रोण० ६० । ६) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको कमण्डलुका दान (शल्य० ४६ । ५०) ।
  • समुद्रसे वैंतकी नम्रताका वर्णन (शान्ति० ११३ । ८—११) ।
  • इनका जह्नुकी पुत्रीरूपसे प्रसिद्ध होना (अनु० ४ । ३) ।
  • गङ्गाजीमें स्नानका फल (अनु० २५ । ३९) ।
  • इनकी महिमाका वर्णन (अनु० २६ । १६—९६) ।
  • अग्निद्वारा स्थापित किये गये शिवजीके तेजको इनका मेरुपर्वतपर छोड़ना (अनु० ८५ । १८) ।
  • अग्निसे अपने गर्भके स्वरूप आदिका वर्णन (अनु० ८५ । ७२—७६) ।
  • पार्वतीजीसे स्त्रीधर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना (अनु० १४६ । २०—२२) ।
  • अपने पुत्र भीष्मकी मृत्युपर इनका शोक करना (अनु० १६८ । २३—२८) ।
  • भीष्मजीके शरशायी होनेपर वसुओंका गङ्गाजीके तटपर आकर अर्जुनको शाप देनेकी इच्छा प्रकट करना और गङ्गाजीद्वारा उनके इस विचारका अनुमोदन होना (आश्व० ८९ । १२—१५)।

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