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गङ्गाद्वार

  • जहाँ गङ्गाजी पर्वतमालाओंसे निकलकर समतल भूमि या मैदानमें आती हैं, उस स्थानका नाम गङ्गाद्वार है; इसीको 'हरद्वार' या 'हरिद्वार' कहते हैं । गङ्गाद्वारमें प्रतीपने तपस्या की (आदि० ९७ । ५) ।
  • यहाँ भरद्वाज मुनि रहते थे (आदि० १२९ । १३) ।
  • अर्जुनने यहाँके तीर्थोंकी यात्रा की (आदि० २१३ अध्याय) ।
  • गङ्गाद्वार स्वर्गद्वारके समान है, वहाँ एकाग्रचित्त होकर कोटितीर्थमें स्नान करनेसे पुण्डरीक यज्ञका फल मिलता है (वन० ८४ । २७; वन० ८९ । १५; वन० ९० । २१) ।
  • पत्नीसहित महर्षि अगस्त्यने यहाँ तप किया था (वन० ९७ । ११) ।
  • जयद्रथने यहाँ आराधना करके भगवान् शिवको प्रसन्न किया था (वन० २७२ । २४-२६) ।
  • दक्षप्रजापतिने भी यहीं (कनखलमें) यज्ञ किया था (शल्य० ३८ । २०-२८) ।
  • गङ्गाद्वार तथा वहाँके तीर्थविशेष कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत तथा कनखलमें स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है (अनु० २५ । १३) ।
  • गङ्गाद्वारमें भीष्मजीने अपने पिताका श्राद्ध किया था, जिसमें पिण्ड लेनेके लिये शान्तनुका हाथ प्रकट हुआ था (अनु० ८४ । ११-१५) ।
  • धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती गङ्गाद्वारके वनमें दग्ध हुई थीं और वहाँ युधिष्ठिरने उनके लिये श्राद्धकर्म भी कराया था (आश्रम० ३९ । १७-२०) ।

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