← अनुक्रमणिका

गन्धमादन

  • (१) हिमालयके उत्तरभागमें स्थित बदरिकाश्रमके समीपवर्ती पर्वत । गन्धमादनपर कश्यपजीने तपस्या की (आदि० ३० । १०) ।
  • यहीं भगवान् शेषने भी तप किया था (आदि० ३६ । २) ।
  • शतशृङ्गपर्वतपर तपस्याके लिये जाते समय दोनों पत्नियोंसहित पाण्डुका यहाँ आगमन (आदि० ११८ । १८) ।
  • यह गन्धमादन पर्वत दिव्य-रूप धारण करके कुबेरकी सभामें रहकर उन भगवान् धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करता है (सभा० १० । ३२) ।
  • नारायणरूपसे भगवान् श्रीकृष्णने यत्र-संयमसे मुनि होकर दस हजार वर्षोंतक गन्धमादन पर्वतपर निवास किया है (वन० १२ । ११) ।
  • तपस्याके लिये जाते समय अर्जुनने हिमवान् तथा गन्धमादन पर्वतको लाँघकर आगेकी यात्रा की थी (वन० ३७ । ११) ।
  • तपोबलसे ही गन्धमादनपर जाना सम्भव है—यह लोमशका वचन (वन० १४० । २२) ।
  • गन्धमादनपर विशाल बदरिका वृक्ष और भगवान् नर-नारायणका आश्रम है । वहाँ सदा यक्षलोग निवास करते हैं (वन० १४१ । २२-२४) ।
  • पाण्डवोंका गन्धमादनमें प्रवेश और वहाँकी प्राकृतिक स्थितिका वर्णन (वन० १४३ । २-६) ।
  • घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादनपर्वतपर पहुँचना (वन० १४५ अ०) ।
  • गन्धमादनकी प्राकृतिक शोभाका वर्णन (वन० १५८ अध्याय) ।
  • गन्धमादनमें भीमसेनद्वारा कुबेरके सखा राक्षसप्रवर मणिमान्का वध (वन० १६० । ७६-७७) ।
  • अर्जुनका इन्द्रलोकसे लौटकर गन्धमादनपर आना (वन० १६४ अध्याय) ।
  • लङ्कासे निर्वासित हुए कुबेरका गन्धमादनपर निवास (वन० २७५ । ३३) ।
  • यहाँ नर-नारायणने अवर्णनीय तपस्या की है (उद्योग० १६ । १५) ।
  • (२) गन्धमादन-निवासी एवं गन्धमादन नामसे प्रसिद्ध एक वानर-यूथपति, जो दस खरब वानरोंकी सेना साथ लेकर श्रीरामके समीप आया था (वन० २८३ । ५) ।
  • (३) एक राक्षसराज, जो यक्षों, गन्धर्वों और निशाचरोंके साथ कुबेरकी सभामें उनकी उपासना करता है (सभा० १० । ३०-३१) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in