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गन्धर्वनागर

  • नगर, ग्राम आदिका वह आभास, जो आकाशमें या स्थलमें दृष्टिदोषसे दिखायी पड़ता है । जब गरमीके दिनोंमें मरुभूमि या समुद्रमें वायुकी तहोंका घनत्व असमान होता है, उस समय प्रकाशकी गतिके विच्छेदसे दूसरे शहर, गाँव, वृक्ष, नौका आदिका प्रतिबिम्ब आकाशमें पड़ता है और कभी-कभी उस आकाशके प्रतिबिम्बका प्रतिबिम्ब उलटकर पृथ्वीपर पड़ता है, जिससे कभी दूरके गाँव, नगर या तो आकाशमें उलटे टँगे या समीप दिखायी पड़ते हैं । यह दृष्टिदोष वायुकी असमान तहके कारण उस समय होता है, जब नीचेकी तहकी वायु इतनी जल्दी हल्की हो जाती है कि ऊपरकी वायु और ऊपर नहीं जा सकती । गन्धर्वनगरका फल बृहत्संहितामें लिखा है—हिन्दी-शब्द-सागर) ।
  • महर्षियोंके अन्तर्धानको गन्धर्वनगरकी उपमा (आदि० १२५ । ३५) ।

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