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गरुड़

  • कश्यप और विनताके परम तेजस्वी पुत्र, जो भगवान् विष्णुके वाहन और ध्वज हैं (आदि० २३ । १२) ।
  • ये समय आनेपर अपनी माताकी सहायताके बिना ही अण्डा फोड़कर बाहर निकल आये । इनमें महान् साहस और बल-पराक्रम था । ये अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते थे । इच्छानुसार रूप धारण करने, चलने, पराक्रम दिखानेमें समर्थ थे । प्रज्वलित अग्निपुञ्जके समान अत्यन्त भयङ्कर जान पड़ते थे । इनकी पिङ्गल-वर्णकी आँखें बिजलीके समान चमकती थीं । ये पैदा होते ही सहसा बढ़कर विशाल हो गये और आकाशमें उड़ चले । देवता इन्हें बड़वानलके समान भीषण देख अग्निदेवकी शरणमें गये । अग्निदेवने बताया कि ये महातेजस्वी विनतानन्दन गरुड़ हैं । ये कश्यपकुमार देवताओंके हितैषी और सर्पोंके संहारक हैं (आदि० २३ । १३—१४) ।
  • देवताओंद्वारा इनकी स्तुति (आदि० २३ । १५— २६) ।
  • देवताओंद्वारा स्तुति करनेपर इनका अपने तेजको समेटना (आदि० २३ । २७; आदि० २४ । २) ।
  • अपने और माताके दास्यभावसे छूटनेके लिये इनका सर्पोंसे उपाय पूछना (आदि० २७ । १४-१५) ।
  • स्वर्ग जाते समय इनके पूछनेपर माताका इनको मार्गका भोजन बतलाना (आदि० २८ । २) ।
  • माताका इनके पूछनेपर इन्हें ब्राह्मणकी महिमा बताना और उन्हें न खानेका आदेश देना (आदि० २८ । ३-१२) ।
  • स्वर्ग जाते समय इनको माताका आशीर्वाद (आदि० २८ । १४-१६) ।
  • निषादोंके साथ एक सस्त्रीक ब्राह्मणका इनके मुँहमें आना; इनका कण्ठ जलना तथा इनके द्वारा उसका परित्याग (आदि० २९ । २-५) ।
  • पिता कश्यपका इनको कछुए तथा हाथीके पूर्वजन्मका इतिहास बताकर उन्हें खानेका आदेश देना (आदि० २९ । १३-२२) ।
  • इनके द्वारा हाथी, कछुए एवं वालखिल्य ऋषियोंको लेकर उड़नेकी अद्भूत घटना (आदि० २९ । २७ से ३० । २५) ।
  • बालखिल्य मुनियोंद्वारा इनका नामकरण (आदि० ३० । ६-७) ।
  • इनके पिताके स्तुति करनेपर बालखिल्य मुनियोंद्वारा उस शाखाका परित्याग (आदि० ३० । १६) ।
  • इनके स्वर्गके समीप जाकर वहाँ अनेक प्रकारके अशुभसूचक उत्पात होना (आदि० ३० । २२-२८) ।
  • भयभीत हुए इन्द्रको बृहस्पतिका अमृतके लिये गरुड़के आनेकी सूचना देना (आदि० ३० । ४०-४२) ।
  • अमृत हरण करनेके लिये इनको स्वर्ग आते देख इन्द्रका देवताओंको सावधान करना (आदि० ३० । ४२-४४) ।
  • इनकी जन्मकथा तथा इनका पक्षियोंके इन्द्रपदपर अभिषेक (आदि० ३१ । ३०-३५; आदि० ३२ । १-५) ।
  • अपना लघु रूप बनाकर चक्रमें इनका घुसना और अमृतके स्थानमें प्रवेश करना । वहाँ अमृतके रक्षक अद्भूत पराक्रमी दो सर्पोंको मारकर इनका अमृतपात्रको लेकर उड़ना (आदि० ३३ । १-११) ।
  • मार्गमें इनका भगवान् विष्णुसे अमृत पिये अजर-अमर होनेका वर पाना एवं उनके लिये भी स्वयं वाहन होनेका वर देना (आदि० ३३ । १२-१६) ।
  • इन्द्रके साथ इनका युद्ध और मित्रता (आदि० ३३ । २८ से ३४ । ७) ।
  • इन्द्रके कथनानुसार गरुड़के द्वारा नागोंका अमृत की प्राप्तिसे वञ्चित होना; इन्द्रके मनोरथकी पूर्ति और विनताका दासीभावसे छुटकारा (आदि० ३४ । १-२०) ।
  • इनके कुशाँपर अमृत रखनेसे उनका पवित्र होना (आदि० ३४ । २४) ।
  • ये अर्जुनके जन्म-समयमें वहाँ पधारे थे (आदि० १२२ । ५०) ।
  • श्रीकृष्णके ध्वजपर गरुड़की स्थिति (सभा० २९ । २२-२४) ।
  • इनका युद्धमान् नामक नागको पकड़ना (वन० १६० । १५) ।
  • इनकी सम्पूर्ण बाल्यअवस्था (उद्योग० १०५ । ३-१७) ।
  • भगवान् विष्णुद्वारा इनके गर्वका नाश (उद्योग० १०५ । २२) ।
  • इनकी भगवान्से क्षमा याचना (उद्योग० १०५ । २२-२९) ।
  • गुरुदक्षिणा के लिये चिन्तित हुए गालवको इनका आश्वासन देना (उद्योग० १०७ । १७-१८) ।
  • गालवसे पूर्व दिशाका वर्णन करना (उद्योग० १०८ अध्याय) ।
  • गालवसे दक्षिण दिशाका वर्णन करना (उद्योग० १०९ अध्याय) ।
  • गालवसे पश्चिम दिशाका वर्णन करना (उद्योग० ११० अध्याय) ।
  • गालवसे उत्तर दिशाका वर्णन करना (उद्योग० १११ अध्याय) ।
  • ऋषम पर्वतपर पंखहीन होना और शाण्डिलिसे क्षमा-याचना करना (उद्योग० ११२ । ८-११) ।
  • शाण्डिलिकी वरदानसे पंखोंकी प्राप्ति (उद्योग० ११२ । १७) ।
  • गालवको धनके लिये राजर्षि ययातिके पास चलनेका परामर्श (उद्योग० ११४ । १-८) ।
  • ययातिसे अपने आगमनका प्रयोजन बताना (उद्योग० ११४ । ११-२०) ।
  • ययातिकी कन्याके मिलनेपर गालवसे विदा लेना (उद्योग० ११५ । १६) ।
  • गालवको गुरुदक्षिणाके लिये छः सौ घोड़े और माधवी को भी गुरुकी सेवामें समर्पित करनेके लिये सम्मति देना (उद्योग० ११५ । ९-१०) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको अपने पुत्र मयूरका दान (शल्य० ४६ । ५१) ।
  • श्रीनारायणकी आज्ञासे राजा उपरिचर वसुको पातालसे उठाकर आकाशचारी बनाना (शान्ति० ३३० । १७) ।
  • ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके विषयमें अपना अनुभव सुनाना (अनु० १३ । दा० पाठ) ।
  • इनका कार्तिकेयको मयूर भेंट करना (अनु० ८६ । २१) ।

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