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गाण्डीव

  • वरुणदेवका एक दिव्य धनुष, जो अग्निदेवके द्वारा अर्जुनको दो अक्षय तरकसौँके साथ प्राप्त हुआ (आदि० २३५ । १—६) ।
  • अग्निका वरुणसे अर्जुनके लिये गाण्डीव धनुष, दो अक्षय तरकस और कपिध्वज रथ माँगना तथा वरुणका उनकी माँग स्वीकार करके वे सब वस्तुएँ प्रस्तुत करना (आदि० २३४ । ३—१०) ।
  • अर्जुनद्वारा गाण्डीव-ग्रहण (आदि० २३४ । २०) ।
  • गाण्डीव धनुष शत्रुऔंके लिये कालस्वरूप है । यह सब आयुधोंसे विशाल है । यह अकेला ही एक लाख धनुषोंके समान है । देवताओं, दानवों और गन्धर्वोंने इसका बहुत वर्षोंतक पूजन किया है । इसमें कभी कहीं कोई चोटका चिह्न नहीं आया है । पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इसे एक हजार वर्षोंतक धारण किया था । तदनन्तर प्रजापतिने पाँच सौ वर्षोंतक इसे अपने पास रक्खा । फिर इन्द्रने पाँच सौ वर्षोंतक, सोमने पाँच सौ वर्षोंतक तथा राजा वरुणने सौ वर्षोंतक इसे धारण किया था (विराट० ४३ । १०६) ।
  • वज्रकी गाँठको ‘गाण्डीव’ कहा गया है । यह धनुष इसीका बना हुआ है । इसलिये ‘गाण्डीव’ कहलाता है । जगत्का संहार करनेके लिये इसका निर्माण हुआ है । देवतालोग सदा इसकी रक्षा करते हैं (उद्योग० ९८ । ९—१०) ।
  • ‘गाण्डीव दूसरेको दे दो’ ऐसा कहनेवालेका सिर काट लेना यह अर्जुनका उपांशु व्रत था (कर्ण० ६९ । ९—१०) ।
  • अग्निदेवके कहनेपर वरुणको वापस देनेके लिये अर्जुनने गाण्डीव धनुष और अक्षय तरकसौँको जलमें डाल दिया था (महाप्रस्था० १ । ३६—४२) ।

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