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गालव

  • भृचीक मुनिकी अपनी कन्या सत्यवतीका दान (वन० ११५ । २८; शान्ति० ४९ । ७) ।
  • तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे इनका भृचीकके आश्रमपर जाना (शान्ति० ४९ । १३) ।
  • कुशिकापुत्र गाधि दीर्घकालतक सन्तान- हीन थे; अतः सन्तानकी इच्छासे पुण्य कर्म करनेके लिये वे वनमें रहने लगे । वहाँ सोमयाग करनेसे उन्हें एक कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था । इसे भृचीक मुनिने माँगा । तब गाधिने शुल्क लेकर कन्या देनेकी इच्छा प्रकट की और चन्द्रमाके समान कान्तिमान् तथा श्यामवर्णके एक कर्णका एक हजार घोड़े लेकर उन्होंने अपनी कन्या उन भार्गविको दे दी (अनु० ४ । ९—२०) ।
  • ये अपने पुत्र विश्वामित्रको राज्यसिंहासनपर बिठाकर स्वर्गलोकको चले गये (शल्य० ४० । १६) ।
  • युधिष्ठिरकी सभामें विराजनेवाले एक ऋषि (सभा० ४ । १५) ।
  • ये इन्द्रकी सभामें भी बैठे थे (सभा० ७ । १०) ।
  • गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये इनके गुरु विश्वामित्रसे हठ करना (उद्योग० १०६ । २५) ।
  • गुरुदक्षिणाके लिये आठ सौ घोड़े पानेकी चिन्ता (उद्योग० १०७ । ३-१५) ।
  • गरुडकी पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गरुडके वेगसे इनका व्याकुल होना (उद्योग० ११२ । १५-१८) ।
  • गरुडके साथ धनके लिये ययातिके पास जाना (उद्योग० ११४ । १९) ।
  • ययातिकन्या माधवीको लेकर अयोध्यानरेश हर्यश्वके पास जाना (उद्योग० ११५ । १८) ।
  • राजा हर्यश्वसे दो सौ घोड़े शुल्कके रूपमें माधवीको एक पुत्र उत्पन्न करनेके लिये उनके हाथमें सौंपना (उद्योग० ११६ । १५) ।
  • पुत्रोत्पत्तिके बाद पुनः माधवीको लेकर इनका दिवोदासके पास जाना (उद्योग० ११६ । २२) ।
  • दो सौ घोड़े शुल्कके रूपमें माधवीको दिवोदासके हाथमें एक पुत्रकी उत्पत्तिके लिये देना (उद्योग० ११७ । ७) ।
  • पुत्रोत्पत्तिके पश्चात् पुनः माधवीको लेकर गालवका उशीनरके पास जाना और उशीनरको माधवीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा देते हुए उनसे चार सौ घोड़े माँगना (उद्योग० ११८ । ३-८) ।
  • गरुडकी सलाहसे विश्वामित्रको छः सौ घोड़े और माधवीको देकर गुरुदक्षिणा चुकाना (उद्योग० ११८ । १४) ।
  • फिर एक पुत्रकी उत्पत्तिके बाद माधवीको राजा ययातिको लौटाकर इनका वनको जाना (उद्योग० ११८ । २४) ।
  • स्वर्गसे गिरे हुए ययातिको इनका अपने तपका आठवाँ भाग देना (उद्योग० १२१ । २८) ।
  • नारदजीसे धर्मके विषयमें प्रश्न करना (शान्ति० २८७ । ५-११) ।
  • शिवमहिमाके विषयमें युधिष्ठिरसे अपना अनुभव सुनाना (अनु० १८ । ५२-५८) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शाप करना (अनु० ०४ । ३०) ।
  • महर्षि गालव विश्वामित्रजीके ब्रह्मवादी पुत्रोंमेंसे एक थे (अनु० ०४ । ५२) ।
  • इनके पुत्रका नाम भृङ्गवान् था, जो एक महर्षि थे और जिन्होंने वृद्धकन्यासे विवाह किया था (शल्य० ५२ । १४-१५) ।
  • (२) एक बाभ्रव्यगोत्रीय ऋषि, जो वेदके क्रमविभागके पारङ्गत विद्वान् थे (शान्ति० ३४२ । १०४) ।

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