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गान्धारी

  • (१) पूर्ववंशीय महाराज अजमीढ़की द्वितीय पत्नी (आदि० ९५ । ३०) ।
  • (२) गान्धारराज सुबलकी पुत्री (आदि० १०९ । ९) ।
  • ये मति के अंशसे उत्पन्न हुई थीं (आदि० ६७ । १६०) ।
  • इन्होंने भगवान् शङ्करकी आराधना करके उनसे अपने लिये सौ पुत्र प्राप्त होनेका वरदान पा लिया था (आदि० १०९ । १०) ।
  • पिताद्वारा इनका धृतराष्ट्रके लिये वाग्दान (आदि० १०९ । १२) ।
  • गान्धारी पतित्व-परायणा थी । उन्होंने जब सुना कि मेरे भावी पति अंधे हैं और माता-पिता मेरा विवाह उन्हींके साथ करना चाहते हैं, तब रेशमी वस्त्र लेकर उसके कई तह करके उसीसे अपनी आँखें बाँध लीं । उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मैं सदा पतिके अनुकूल रहूँगी । उनके दोघ नहीं देखूँगी (आदि० १०९ । १३—१५) ।
  • शकुनिद्वारा इनके विवाह-संस्कारका सम्पादन (आदि० १०९ । १५—१७) ।
  • सुन्दरी गान्धारीने अपने उत्तम स्वभाव, सदाचार तथा सद्व्यवहारोंसे समस्त कौरवोंको प्रसन्न कर लिया । अपने सुन्दर व्रतोंसे समस्त गुरुजनोंकी प्रसन्नता प्राप्त करके उत्तम मत्तवाली पतिपरायणा गान्धारीने कभी दूसरे पुरुषोंका नामतक नहीं लिया (आदि० १०९ । १८—१९) ।
  • इनके द्वारा व्यासका सत्कार और उनसे सौ पुत्रोंकी प्रातिके लिये वर-याचना (आदि० ११४ । ८) ।
  • गान्धारीका गर्भ-धारण । कुन्तीके पुत्र होनेका समाचार सुनकर महान् दुः खके कारण अपने उदरपर आघात और इनके गर्भसे एक मांस-पिण्डका प्रादुर्भाव (आदि० ११४ । ९-१२) ।
  • व्यासजीके आदेशानुसार सौ टुकड़ोंमें विभक्त हुए उस मांस-पिण्डकी रक्षा-व्यवस्था होनेपर उससे सौ पुत्रोंकी उत्पत्ति (आदि० ११४ । १७-२२) ।
  • पुत्रीके लिये इनका मनोरथ एवं व्यासद्वारा उसकी पूर्ति (आदि० ११५ । ९-१०) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रको चेतावनी (सभा० ७५ । २-१०) ।
  • इनका दुर्योधनको समझाना (उद्योग० ६९ । ९-१०) ।
  • युद्ध होनेके विषयमें इनका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना (उद्योग० १२१ । १०-१५) ।
  • पाण्डवोंको आधा राज्य देकर संधि करनेके लिये दुर्योधनको समझाना (उद्योग० १२१ । १९-२४) ।
  • कर्णवधका समाचार सुनकर मूर्छित होकर गिरना (कर्ण० ४ । ५; कर्ण० ९६ । ५५) ।
  • श्रीकृष्णके समझानेपर उन्हें उत्तर देना (शल्य० ६३ । ६६-६८) ।
  • पाण्डवोंको शाप देनेकी इच्छा करना (स्त्री० १४ । २) ।
  • व्यासजीके समझानेपर उन्हें उत्तर देना (स्त्री० १४ । १९-२९) ।
  • भीमसेनपर कुपित होकर उनसे अन्यायका कारण पूछना (स्त्री० १५ । १२-१४; स्त्री० १५ । २९-३३) ।
  • युधिष्ठिरपर कुपित होकर उन्हें पूछना और इनकी तनिक-सी दृष्टि पड़ते ही युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना (स्त्री० १५ । २४-३०) ।
  • कुन्ती और द्रौपदीको धीरज देना (स्त्री० १५ । ४१-४४) ।
  • युद्धस्थलमें मारे गये स्वजनोंको देखकर श्रीकृष्णके समक्ष विलाप करना (स्त्री० १६ । १८-६०) ।
  • दुर्योधनको मरा हुआ देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप करना (स्त्री० १७ । ५-३२) ।
  • अपने अन्य पुत्रों तथा दुःशासनको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख इनका करुण रोदन (स्त्री० १८ अध्याय) ।
  • विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति और दुःशलाको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख इनका विलाप (स्त्री० १९ अध्याय) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णसे उत्तरा और विराट्-कुलकी स्त्रियोंके शोक और विलापका वर्णन (स्त्री० २० अध्याय) ।
  • कर्णके शवको देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्त्रीके विलापका श्रीकृष्णके सम्मुख वर्णन (स्त्री० २१ अध्याय) ।
  • अवन्तीनरेश, जयद्रथ तथा दुःशलाको देखकर इनका श्रीकृष्णके सम्मुख शोक प्रकट करना (स्त्री० २२ अध्याय) ।
  • शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख इनका विलाप (स्त्री० २३ अध्याय) ।
  • भूरिश्रवाकी पत्नियोंका विलाप तथा शकुनिको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख इनका शोकोद्गार (स्त्री० २४ अध्याय) ।
  • अन्यान्य वीरोंको मरा हुआ देखकर विलाप करना और कुपित होकर श्रीकृष्णको शाप देना (स्त्री० २५ । ३-६; स्त्री० २५ । ४३-४६) ।
  • राजा धृतराष्ट्रके साथ इनका वनको प्रस्थान (आश्रम० १५ । ८-९) ।
  • वनमें व्यासजीके समक्ष खड़ी होकर इनका उनसे महाराज धृतराष्ट्र तथा द्रौपदी, सुभद्रा, कुन्ती आदि सभी कुरुकुलकी स्त्रियोंके स्वजनोंके लिये होनेवाले शोकका वर्णन करना और सबको मरे हुए सम्बन्धियोंके दर्शन करानेका प्रस्ताव करना (आश्रम० २१ । ३७-४९) ।
  • व्यासजीकी कृपासे इनका राजा धृतराष्ट्र तथा कुरुकुलकी स्त्रियोंके साथ गङ्गाजीसे प्रकट हुए अपने परलोकवासी स्वजनोंके दर्शन करना (आश्रम० २२ अध्याय) ।
  • धृतराष्ट्र और कुन्तीके साथ इनका गङ्गाद्वारके वनमें दावानलसे दग्ध होना (आश्रम० ३० । ३१-३२) ।
  • युधिष्ठिरका इनके लिये जलाञ्जलि देना तथा नाना प्रकारकी वस्तुओका दान एवं श्राद्ध-कर्म करना (आश्रम० ३१ अध्याय) ।
  • 'गान्धारीके शापकी सफलताका अवसर प्राप्त हुआ है'-ऐसी श्रीकृष्णकी मान्यता (मौसल० २ । २१) ।
  • धृतराष्ट्रके साथ इनको कुबेरके दुर्लभ लोकोंकी प्राप्ति (स्वर्ग० ५ । १४) ।
  • (२) उमादेवीकी अनुगामिनी सहचरी (वन० २३१ । ४८) ।

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