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गिरिव्रज

  • मगधदेशकी प्राचीन राजधानी । जरासंध गिरिव्रजमें ही रहता था । उसके समयमें गिरिव्रजकी जो प्राकृतिक स्थिति थी, उसका वर्णन श्रीकृष्णने अर्जुनसे इस प्रकार किया था—यहाँ पशुओंकी अधिकता है, जलकी सदा पूर्ण सुविधा रहती है, रोग-व्याधिका प्रकोप नहीं होता । सुन्दर महलोंसे भरा-पूरा यह नगर बड़ा मनोहर जान पड़ता है । यहाँ विहारोपयोगी विपुल, वराह, वृषभ (ऋषभ), ऋषिगिरि (मातंग) तथा चैत्यक नामक पर्वत हैं । बड़े-बड़े शिखरोंवाले ये पाँचों सुन्दर पर्वत शीतल छायावाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं और एक साथ मिलकर एक-दूसरेके शरीरका स्पर्श करते हुए मानो गिरिव्रज नगरकी रक्षा कर रहे हैं । यहाँ अर्बुद और शकवापी नामवाले दो नाग रहते हैं । स्वस्तिक और मणि नामक नागोंके भी यहाँ उत्तम भवन हैं । यहाँ सदा मेघ समयपर वर्षा करते हैं (सभा० २१ । ९-१०) ।
  • यहाँ जरासंधने अपनेद्वारा जीते गये नरेशोंको कैद करके रखा था (सभा० १४ । ६३) ।
  • गिरिव्रजसे मथुराकी ओर जरासंधने अपनी गदा फेंकी थी (सभा० २१ । २३-२४) ।
  • श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेन गिरिव्रजमें गये । भीमने वहाँ जरासंधको मारा और भगवान् श्रीकृष्णने बंदी राजाओंको कैदसे छुड़ाया । फिर भयभीत हो शरणमें आये हुए जरासंधपुत्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया (सभा० २७ अध्याय) ।
  • भीमसेनने पूर्वदिग्विजयके समय जरासंधके पुत्रको 'कर' देनेकी शर्तपर उसके राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया (सभा० ३० । १७-१८) ।
  • गिरिव्रजमें ही राजर्षि घुन्धुमार देवताओंके वरदानको लागकर सोये थे (अनु० ६ । ३९) ।

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