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गीता

  • कुरुक्षेत्रमें युद्धके अवसरपर स्वजनोंके वधकी आशङ्कासे मोहग्रस्त हुए अर्जुनके शोक, चिन्ता और दैन्यका निवारण करके उन्हें कर्तव्य कर्ममें निष्काम भावसे लगा देनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको जो उपदेश दिया था, वही 'गीता' (अथवा 'श्रीमद्भगवद्गीता') के नामसे विख्यात है । वेदव्यासजीने गीताके इस प्रसङ्गको भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें अध्याय २५ से ४२ तक लिपिबद्ध किया है । इसमें कुल सात सौ श्लोक हैं । श्रीमद्भगवद्गीताके प्रत्येक अध्यायके विषयोंका संक्षिप्त दिग्दर्शन इस प्रकार है—दोनों सेनाओंके प्रधान-प्रधान वीरों एवं शङ्खध्वनिका वर्णन तथा स्वजन-वधके पापसे भयभीत हुए अर्जुनका विषाद (भीष्म० २५ अध्याय) ।
  • अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करने हेतु भगवान्‌द्वारा नित्यानित्य वस्तुके विवेचनपूर्वक सांख्ययोग, कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञकी स्थिति और महिमाका प्रतिपादन (भीष्म० २६ अध्याय) ।
  • सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग और कर्मयोग आदि समस्त साधनोंके अनुसार कर्तव्य कर्म करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन एवं स्वधर्म-पालनकी महिमा तथा कामनिरोधके उपायका वर्णन (भीष्म० २७ अध्याय) ।
  • सगुण भगवान्‌के प्रभाव, निष्काम कर्मयोग तथा योगी महात्मा पुरुषोंके आचरण और उनकी महिमाका वर्णन करते हुए विविध यज्ञों एवं ज्ञानकी महिमाका वर्णन (भीष्म० २८ अध्याय) ।
  • सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तिसहित ध्यानयोगका वर्णन (भीष्म० २९ अध्याय) ।
  • निष्काम कर्मयोगका प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा तथा मनोनिरग्रहपूर्वक ध्यानयोग एवं योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन (भीष्म० ३० अध्याय) ।
  • ज्ञान-विज्ञान, भगवान्‌की व्यापकता, अन्य देवताओंकी उपासना एवं भगवत्प्राप्तिकी प्रभावसहित न जाननेवालोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी महिमाका कथन (भीष्म० ३१ अध्याय) ।
  • ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर एवं भक्तियोग तथा शुक्ल और कृष्ण मार्गोंका प्रतिपादन (भीष्म० ३२ अध्याय) ।
  • ज्ञान-विज्ञान और जगत्‌की उत्पत्तिका, आसुरी और दैवी सम्पदावालोंका, भगवत्प्राप्तिकी प्रभावसहित भगवान्‌के स्वरूपका, सकाम-निष्काम उपासनाका एवं भगवद्भक्तिकी महिमाका कथन (भीष्म० ३३ अध्याय) ।
  • भगवान्‌की विभूति और योगशक्तिका तथा प्रभावसहित भक्तियोगका कथन; अर्जुनके पूछनेपर भगवान्‌द्वारा अपनी विभूतियोंका और योगशक्तिका पुनः वर्णन (भीष्म० ३४ अध्याय) ।
  • विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना, भगवान् और संजयद्वारा विश्वरूपका वर्णन, अर्जुनद्वारा भगवान्‌के विश्वरूपका देखा जाना, भयभीत हुए अर्जुनद्वारा भगवान्‌की स्तुति-प्रार्थना, भगवान्‌द्वारा विश्वरूप और चतुर्भुजस्वरूपके दर्शनकी महिमा और केवल अनन्य भक्तिसे ही भगवत्प्राप्तिका कथन (भीष्म० ३५ अध्याय) ।
  • साकार और निराकारके उपासकोंकी उत्तमताका निर्णय तथा भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं भगवत्प्राप्तिवाले पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन (भीष्म० ३६ अध्याय) ।
  • ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुषका वर्णन (भीष्म० ३७ अध्याय) ।
  • ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत्‌की उत्पत्तिका तथा सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंका, भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं गुणातीत पुरुषके लक्षणोंका वर्णन (भीष्म० ३८ अध्याय) ।
  • दैवी सम्पदा, भगवत्प्राप्तिके उपायका, जीवात्माका प्रभावसहित परमेश्वरके स्वरूपका एवं अक्षर-अक्षर और पुरुषोत्तमके तत्त्वका वर्णन (भीष्म० ३९ अध्याय) ।
  • फलसहित दैवी और आसुरी सम्पदाका वर्णन तथा शास्त्रविपरीत आसुरीगुणोंके त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरण करनेके लिये प्रेरणा (भीष्म० ४० अध्याय) ।
  • श्रद्धाका और शास्त्रविपरीत घोर तप करनेवालोंका वर्णन; आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्-पृथक् भेद तथा ॐ, तत्, सत्‌के प्रयोगकी व्याख्या (भीष्म० ४१ अध्याय) ।
  • त्यागका, सांख्य-सिद्धान्तका, फलसहित वर्ण-धर्मका, उपासनासहित ज्ञाननिष्ठाका, भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगका एवं गीताके माहात्म्यका वर्णन (भीष्म० ४२ अध्याय) ।

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