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गौतम

  • (१) सप्तर्षियोंमेंसे एक, जो अन्य ऋषियोंके साथ अर्जुनके जन्मोत्सवमें पधारे थे (आदि० १२२ । ५०-५१) ।
  • इनके एक पुत्रका नाम शरद्वान् गौतम था, जो सरकण्डोंके साथ उत्पन्न हुए थे (आदि० १२९ । २) ।
  • इनके दूसरे पुत्रका नाम चिरकारी था (शान्ति० २६६ । ४) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें उनकी सेवाके लिये उपस्थित होते हैं (सभा० ११ । ११) ।
  • इनका अत्रि मुनिके साथ संवाद (वन० १८५ । १५-१८) ।
  • इनका सत्यवान्‌के जीवित होनेका विश्वास दिलाकर राजा द्युमत्सेनको आश्वासन देना (वन० २९८ । ११-१३) ।
  • सावित्रीसे वनका वृत्तान्त पूछना (वन० २९८ । ३३-३५) ।
  • द्रोणाचार्यके पास आकर उनसे युद्ध बंद करनेके लिये कहना (द्रोण० १९० । ३६-४०) ।
  • शर-शय्यापर पड़े हुए भीष्मजीको देखनेके लिये अन्य मुनियोंके साथ ये भी पधारे थे (शान्ति० ४७ । १०) ।
  • इनका पारियात्र पर्वतपर अपने आश्रममें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या करना । इनके यहाँ लोकपाल यमका पदार्पण और इनके द्वारा उनका सत्कार (शान्ति० १२१ । ४-८) ।
  • यमके साथ इनकी धर्म-चर्चा (शान्ति० १२१ । ९) ।
  • ये उत्तर-दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं (शान्ति० २०८ । ३३) ।
  • इनका अपने पुत्र चिरकारीको उसकी माता अहल्याके वधके लिये आदेश देना (शान्ति० २६६ । ७) ।
  • वनमें जाकर पत्नी-वधके विषयमें चिन्ता करना (शान्ति० २६६ । ७०-७२) ।
  • वनसे लौटनेपर पत्नीको जीवित पाकर इनके द्वारा पुत्रका अभिनन्दन (शान्ति० २६६ । ७७-७९) ।
  • इनके शापसे इन्द्रका हरी दाढ़ी-मूँछोंसे युक्त होना (शान्ति० २९२ । २३) ।
  • इनका अङ्गिरासे धार्मिक विषयोंमें प्रश्न (अनु० २५ । ५-६) ।
  • राजा वृषादर्मिसे प्रतिग्रहके दोष बताना (अनु० ९३ । ४२) ।
  • अरुन्धतीसे अपने शरीरके मोटे न होनेका कारण बताना (अनु० ९३ । ५०) ।
  • यातुधानीके समक्ष अपने नामकी व्याख्या करना (अनु० ९३ । ९०) ।
  • मृणालकी चोरीके विषयमें शपथ खाना (अनु० ९३ । १२२-१२३) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शाप देना (अनु० ९४ । ११) ।
  • अहल्यापर बलात्कार करनेका कारण इनका शाप (अनु० १५३ । ६) ।
  • अपने सभी शिष्योंमें उत्तङ्कपर ही इनका अधिक स्नेह और प्रेम होना; उत्तङ्कके इन्द्रिय-संयम, शौच, पुरुषार्थ, क्रियाशीलता और उत्तमोत्तम सेवासे इनका अधिक प्रसन्न होना तथा अधिक प्रेमके कारण ही इनका उत्तङ्कको घर जानेकी आज्ञा न देना (आश्व० ५६ । ४-६) ।
  • इनकी आज्ञासे इनकी पुत्रीका रोते हुए उत्तङ्कके आँसुओंका अपने हाथोंमें लेना । इनका उत्तङ्कसे उनके मानसिक शोकका कारण पूछना । इनकी घर जानेकी इच्छा जानकर उन्हें सहर्ष आज्ञा प्रदान करना । उनके गुरु-दक्षिणा देनेकी इच्छा प्रकट करनेपर उनकी सेवासे ही अपनेको संतुष्ट बताना और गुरु-दक्षिणा लेनेकी इच्छा न करना; साथ ही उत्तङ्कके पौडशवर्षीय युवक हो जानेपर उनके साथ अपनी कन्याका विवाह कर देना (आश्व० ५६ । ११-२४) ।
  • इनका अपनी पत्नीसे उत्तङ्कके विषयमें पूछना और वह राक्षस सौदासके यहाँ कुण्डल लाने गया है—यह जानकर पत्नीको उसके वधकी आशङ्का बताकर इस अनुचित आशाके लिये उपालम्भ देना । उत्तङ्ककी रक्षाके लिये अपनी पत्नी अहल्याकी इच्छाका अनुमोदन करना (आदि० ५६ । ३२—३५) ।
  • गौतमके पुत्र शरद्वान्को भी 'गौतम' कहा जाता है (आदि० १३० । ३) तथा शरद्वान्के पुत्र कृप और कन्या कृपीके लिये भी 'गौतम' (आदि० १३० । १४) एवं 'गौतमी' नामका प्रयोग देखा जाता है (आदि० १२९ । ४०) ।
  • (२) एक ऋषि; जो अन्य ऋषि-मुनियोंके साथ युधिष्ठिरकी सभामें विराजते थे (सभा० ४ । १७) ।
  • ये इन्द्रकी सभामें भी उपस्थित होकर देवेन्द्रकी उपासना करते थे (सभा० ७ । १८) ।
  • इन्होंने ही गिरिव्रजमें निवास करके उशीनर देशकी शूद्र-जातीय कन्याके गर्भसे काक्षीवान् नामक पुत्र उत्पन्न किया था (सभा० २९ । ३—५) ।
  • (३) एक तपस्वी एवं विद्वान् ब्राह्मण मुनि जो एकत, द्वित और त्रितके पिता थे (शल्य० ३६ । ७९) ।
  • (४) एक तपस्वी ब्राह्मण, जिन्होंने अपने हाथीका अपहरण हो जानेपर धृतराष्ट्रद्वारा इनके साथ संवाद किया था (अनु० १०२ अध्याय) ।
  • (५) मध्यदेशका रहनेवाला एक कृतघ्न ब्राह्मण; जिसका नाम गौतम था, इसका डाकुओंके गाँवमें निवास (शान्ति० १६८ । ३६) ।
  • अपने गाँवके एक सदाचारी ब्राह्मणद्वारा फटकारे जानेपर उसके द्वारा समुद्रकी यात्रा (शान्ति० १६९ । १) ।
  • सभी धर्मोंमें नामक वक्ता अतिथि होना (शान्ति० १६९ । १०) ।
  • राजधर्माका आतिथ्य स्वीकार करके उसके पास पहुँचना (शान्ति० १७१ । २—२८) ।
  • राजधर्माको धनके लिये राक्षसराज विरूपाक्षसे लौटाना (शान्ति० १७१ । ३४—३५) ।
  • विरूपाक्षसे वार्तालाप और धन लेकर लौटना (शान्ति० १७२ । २—२८) ।
  • राजधर्माको मार डालनेका विचार (शान्ति० १७३ । १४—१५) ।
  • जलती हुई लकड़ियोंद्वारा राजधर्माका वध (शान्ति० १७३ । ३) ।
  • राक्षसोंद्वारा इसका वध (शान्ति० १७३ । २३—२४) ।
  • इन्द्रद्वारा जीवनदान (शान्ति० १७३ । १२—१३) ।
  • इसे देवताओंका शाप (शान्ति० १७३ । १७—१८) ।

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