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घटोत्कच

  • हिडिम्बाके गर्भसे भीमसेनद्वारा उत्पन्न एक राक्षस (आदि० १५४ । ३१) ।
  • इसका 'घटोत्कच' नाम होनेका कारण (आदि० १५४ । ३८) ।
  • आवश्यकता पड़नेपर अपने पितृवर्ग (पाण्डवों) की सेवाके लिये इसका कुन्तीको आश्वासन (आदि० १५४ । ४५) ।
  • इन्द्रकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये इन्द्रद्वारा इसकी सृष्टि (आदि० १५४ । ४६) से इसकी लङ्का-यात्रा (सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७५१) ।
  • इसके द्वारा पाण्डवोंका परिचय (सभा० ३१ । ७२ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७६२) ।
  • विभीषणसे कर लाकर इसका सहदेवको देना (सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७६२) ।
  • भीमसेनकी आज्ञासे द्रौपदीको कंधेपर चढ़ाकर इसका गन्धमादनकी यात्रा करना (वन० १५६ । २१) ।
  • इसका दुर्गम मार्गमें पाण्डवोंको पीठपर बिठाकर ले जाना और उन्हें संकटसे पार करना (वन० १६६ । २१) ।
  • प्रथम दिनमें अलम्बुषके साथ द्वन्द्वयुद्ध (भीष्म० ५५ । ४२-४५) ।
  • दुर्योधनके साथ युद्ध (भीष्म० ५८ । १४-१५) ।
  • भगदत्तके साथ मायायुद्ध छेड़ना और इसके अद्भुत पराक्रमसे पराजित होकर कौरवसेनाका उस दिन युद्ध बंद कर देना (भीष्म० ६३ । ३०-४०) ।
  • इसके द्वारा इसका पराजित होना (भीष्म० ६४ । ५०-५२) ।
  • दुर्योधनके साथ युद्ध करके उसे प्राण-संशयमें डाल देना (भीष्म० ७१ । १९ से ७२ । ७ तक) ।
  • वज्रनरेशके गजरराजको मारकर उसे पराजित करना (भीष्म० ७२ । १२) ।
  • इसके द्वारा विकर्णकी पराजय (भीष्म० ७२ । ३६) ।
  • इसके द्वारा बृहद्बलकी पराजय (भीष्म० ७२ । ४१) ।
  • कौरव महारथियोंके प्रहारसे व्याकुल होकर इसका आकाशमें उड़ना (भीष्म० ७३ । ६) ।
  • इसकी आसुरी मायासे कौरवसेनाका पलायन (भीष्म० ७४ । ४३-४७) ।
  • दुर्मुखके साथ इसका द्वन्द्वयुद्ध (भीष्म० ११० । १३-१४; भीष्म० १११ । ३०-३१) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इसकी वीरताका वर्णन (द्रोण० १० । ७२-७३) ।
  • अलम्बुषके साथ इसका युद्ध (द्रोण० १४ । ४४-४७) ।
  • इसके घोड़ोंका वर्णन (द्रोण० २३ । ७५) ।
  • अलम्बुषके साथ युद्ध (द्रोण० २५ । ६१-६२) ।
  • अलम्बुषके साथ युद्ध (द्रोण० २६ । २७-२८) ।
  • इसके द्वारा अलम्बुषका वध (द्रोण० १०१ । २८-२९) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्धमें इसके पुत्र अञ्जनपर्वाका उसके द्वारा मारा जाना तथा इसका भी पराजित होना (द्रोण० १५६ । ५६-५८) ।
  • अश्वत्थामाद्वारा इसकी पराजय (द्रोण० १६६ । १५-३८) ।
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनकी आज्ञासे इसका कर्णके साथ युद्धके लिये जाना (द्रोण० १७३ । ६३-६५) ।
  • घटोत्कच और जटासुरके पुत्र अलम्बुषका घोर युद्ध तथा अलम्बुषका वध (द्रोण० १७४ अध्याय) ।
  • इसके रूप तथा रथ आदिका वर्णन और कर्णके साथ मायामय घोर युद्ध (द्रोण० १७५ । ४०) ।
  • इसके द्वारा अलायुधका वध (द्रोण० १७८ । ३१) ।
  • इसका मायामय घोर युद्ध करके कौरव-सेनाका संहार करना (द्रोण० १७५ । २५-४०) ।
  • कर्णद्वारा छोड़ी हुई इन्द्रदत्त शक्तिके प्रहारसे घटोत्कचका वध (द्रोण० १७६ । ५८) ।
  • यह यक्षों और ब्राह्मणोंसे द्वेष एवं घृणा करता था (द्रोण० १८१ । २६-२७) ।
  • व्यासजीके आवाहन करनेपर यह भी गङ्गाजीके जलसे प्रकट हुआ था (आश्रम० ३२ । ८) ।
  • यह मृत्युके पश्चात् यक्षों एवं देवताओंमें मिल गया (स्वर्ग० ५ । ३७) ।

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