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चन्द्रमा

  • (१) शीतल किरणोंवाले सोम, जो क्षीरसागर-मन्थन होते समय उससे प्रकट हुए थे ( आदि० १८ । ३४ ) ।
  • ये अत्रिपुत्र और बुधके पिता हैं ( द्रोण० १४४ । ४ ) ।
  • इन्हें प्रजापति दक्षने अपनी सत्ताईस कन्याएँ पत्नीरूपमें प्रदान की थीं ( आदि० ६६ । १३; आदि० ७५ । ९; शल्य० ३५ । ४५ ) ।
  • सोमके सत्ताईस पत्नियाँ हैं, जो सम्पूर्ण लोकमें विख्यात हैं । पवित्र व्रतका पालन करनेवाली वे सोम-पत्नियों काल-विभागका ज्ञापन करनेमें नियुक्त हैं । लोक-व्यवहारका निर्वाह करनेके लिये वे सब-की-सब नक्षत्रवाचक नामोंसे युक्त हैं ( आदि० ६६ । १६-१७ ) ।
  • ये नक्षत्रोंके साथ मेरु पर्वतकी परिक्रमा करते और पर्वसंधिके समय विभिन्न मासोंका विभाग करते रहते हैं । इस प्रकार महामेरुका उल्लङ्घन करके समस्त प्राणियोंका पोषण करते हुए वे पुनः मन्दराचलको चले जाते हैं ( वन० १६३ । ३२-३३ ) ।
  • चन्द्रमण्डलका व्यास ग्यारह हजार योजन; उनकी परिधि बत्तीस हजार योजन और उनकी मोटाई उनसठ सौ योजन है ( भीष्म० १२ । ४२-४३ ) ।
  • इनकी सभी पत्नियाँ अनुपम रूपवती थीं; परंतु रोहिणीका सौन्दर्य उन सबसे बढ़कर था, अतः वे अन्य पत्नियोंकी उपेक्षा करके सदा रोहिणीके पास रहने लगे । यह देख दूसरी स्त्रियोंने पिता दक्षसे उनकी शिकायत की । दक्षने समझाते हुए कहा-'तुम्हें सबपर समान भाव रखना चाहिये ।' उनके इस आदेशकी अवहेलना करके सोम पूर्ववत् रोहिणीमें ही आसक्त रहने लगे । इससे कुपित हो दक्षने उनके लिये राजयक्ष्माकी सृष्टि की और वह रोग उनके शरीरमें समा गया । सोम क्षीण हो चले । उनके क्षीण होनेसे ओषधियाँ और प्रजाका भी क्षय होने लगा । तब देवताओंके अनुरोधसे दक्षने उनके रोगकी निवृत्तिका उपाय बताते हुए कहा-'सोम अपने सब स्त्रियोंके प्रति समान बर्ताव करें और पश्चिम समुद्रमें, जहाँ सरस्वती नदीका संगम हुआ है, वहाँ जाकर स्नान करें । उस तीर्थमें महादेवजीकी आराधनासे इन्हें इनकी पूर्व कान्ति प्राप्त हो जायगी । ये पंद्रह दिन क्षीण होंगे और पंद्रह दिन सदा बढ़ते रहेंगे ।' सोमने अमावस्याको उस तीर्थमें गोता लगाया; इससे उन्हें उनकी शीतल किरणें प्राप्त हो गयीं और वे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करने लगे । वे प्रत्येक अमावस्याको वहाँ स्नान करते हैं ( शल्य० ३५ । ४५-४६ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको मणि और सुमणि नामक पार्षदोंका दान ( शल्य० ४५ । ३२ ) ।
  • शम्बरासुरके प्रति ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन ( अनु० ३६ । १३-१७ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इनका कार्तिकेयको मेंढ़ा देना ( अनु० ८६ । २३ ) ।
  • अजीर्ण-निवारणके लिये पितरों और देवताओंको ब्रह्माजीकी शरणमें जानेकी सलाह देना ( अनु० ९२ । ६ ) ।
  • पूर्ण-मासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु-मिश्रित पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उनसे चन्द्रमा और समुद्रकी भी वृद्धि होती है ( अनु० १३४ । ३-६ ) ।
  • ( २ ) ये सोम या चन्द्रमा आठ वसुओंमेंसे एक हैं । वसुओंमें ये धर्मपत्नी मनस्विनीके पुत्र हैं । उनकी मनोहरा नामक पत्नीसे चार पुत्र उत्पन्न हुए हैं—वर्चा, शिशिर, प्राण और रमण ( आदि० ६६ । १८-२२ ) ।
  • सोमने अपने पुत्र वर्चाको कुछ शर्तोंके साथ केवल सोलह वर्षके लिये देवकार्यकी सिद्धिके निमित्त भूतलपर भेजा था जो 'अभिमन्यु' रूपसे अवतीर्ण हुआ था ( आदि० ६७ । १३-१२४ ) ।
  • ( ३ ) भारतवर्षकी एक प्रमुख नदी, जिसका जल भारतीय प्रजा पीती है ( भीष्म० ९ । २९ ) ।

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