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चित्ररथ

  • (१) एक देवगन्धर्व, जो पिता कश्यप और माता मुनिका पुत्र था ( आदि० ६५ । ४३ ) ।
  • यह अर्जुनके जन्मोत्सवमें गया था ( आदि० १२२ । ५६ ) ।
  • यही गन्धर्वराज अङ्गारपर्णके नामसे विख्यात था ( आदि० १६१ । ५ ) ।
  • प्रदोषकालमें गङ्गाजीके जलके भीतर अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करते समय पाण्डवोंके वहाँ आ जानेसे इसका उनके ऊपर क्रोध प्रकट करना और फटकारना ( आदि० १६१ । ५-१५ ) ।
  • गन्धर्वको अर्जुनका मुँहतोड़ उत्तर ( आदि० १६१ । १६-२४ ) ।
  • अर्जुनके साथ इसका युद्ध ( आदि० १६१ । २५ ) ।
  • अर्जुनके आग्नेयास्त्रसे इसके रथका दग्ध होना और इसकी मूर्च्छा तथा अर्जुनका इसे युधिष्ठिरके पास घसीट ले जाना ( आदि० १६१ । २९-३३ ) ।
  • इसकी जीवन-रक्षाके लिये युधिष्ठिरसे कृपाभिक्षाकी प्रार्थना ( आदि० १६१ । ३४ ) ।
  • अर्जुनद्वारा इसकी जीवनदान ( आदि० १६१ । ३७ ) ।
  • इसका चित्ररथ नाम होनेका कारण तथा अर्जुनके कारण इसका 'दग्धरथ' नाम होना ( आदि० १६१ । ४० ) ।
  • इसके द्वारा विश्वावसुसे अपनेको चाक्षुषी विद्याकी प्राप्तिका कथन और चाक्षुषी विद्याके महत्त्वका वर्णन ( आदि० १६१ । ४३-४६ ) ।
  • इसके द्वारा पाण्डवोंको गन्धर्वदेशीय दिव्य अश्वोंका दान और उनकी प्रशंसा ( आदि० १६१ । ४८-५४ ) ।
  • इसका अर्जुनको चाक्षुषी विद्या प्रदान करना ( आदि० १६१ । ५६ ) ।
  • अर्जुनके साथ इसकी मित्रता ( आदि० १६१ । ५८ ) ।
  • इसका पाण्डवोंपर अपने आक्रमण और पराजयका कारण बताना ( आदि० १६९ । ५९ ) ।
  • किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको पुरोहितरूपमें वरण करनेके लिये इसकी अर्जुनको प्रेरणा ( आदि० १६१ । ७० ) ।
  • इसका अर्जुनको तपती और संवरणकी कथा सुनाना ( आदि० १७० अध्यायसे १७२ तक ) ।
  • वसिष्ठके साथ विश्वामित्रके वैरका कारण सुनाकर इसके द्वारा वसिष्ठके अद्भुत क्षमाबलका वर्णन ( आदि० १७३ अध्यायसे १७४ अध्यायतक ) ।
  • राजा शक्तिसे राक्षसभावको प्राप्त हुए राजा कल्माषपादके द्वारा विश्वामित्रकी प्रेरणासे वसिष्ठके पुत्रोंके भक्षण एवं वसिष्ठके शोककी कथा सुनाना ( आदि० १७५ अध्याय ) ।
  • इसके द्वारा कल्माषपादके उद्धार और वसिष्ठजीसे उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति का वर्णन ( आदि० १७६ अध्याय ) ।
  • शक्तिपुत्र पराशरके जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीके और्वोपाख्यान सुनानेकी कथाका वर्णन ( आदि० १७७ अध्यायसे १७८, १७९ अध्यायतक ) ।
  • पराशरके राक्षससत्रके आरम्भ और समाप्ति तथा कल्माषपादको ब्राह्मणी आङ्गिरसीके शापकी कथा कहना ( आदि० १८० अध्यायसे १८१ अध्यायतक ) ।
  • अर्जुनके पूछनेपर इसका धौम्यको पुरोहित बनानेकी सलाह देना ( आदि० १८२ । १-२ ) ।
  • चित्ररथका अर्जुनसे आग्नेयास्त्रको ग्रहण करना ( आदि० १८२ । ३ ) ।
  • यह कुबेरकी सभामें रहकर भगवान् धनाश्र्यक्षकी उपासना करता है ( सभा० १० । २६ ) ।
  • इसने राजा युधिष्ठिरको चार सौ दिव्य घोड़े दिये, जो वायुके समान वेगशाली थे ( सभा० ५२ । २३ ) ।
  • यह गन्धर्वोद्वारा पृथ्वीदोहनके समय बछड़ा बना था ( द्रोण० ६९ । २५ ) ।
  • (२) मार्तिकावत देशका राजा, जिसकी अपनी पत्नीके साथ श्री हुई स्त्रीकामीको रेणुकाके देखा था ( वन० ११६ । ७ ) ।
  • (३) एक पाञ्चाल राजकुमार, द्रोणाचार्यद्वारा इसका वध ( द्रोण० १२२ । ४३-४९ ) ।
  • (४) अङ्गदेशका एक राजा, जो देवशर्माकी पत्नी भद्रवतीके पति थे ( अनु० ४२ । ८ ) ।
  • (५) यदुवंशी उपजुके पुत्र एवं शूरके पिता ( अनु० १४० । २९ ) ।

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