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जतुगृहपर्व

  • आदिपर्वका एक अवान्तर पर्व ( अध्याय १४० से १५० तक ) ।
  • ( क ) मिथिलाके एक भूतपूर्व राजा, जो अब यम-सभा में विराजमान होते हैं ( सभा० ८ । १९ ) ।
  • ( ख ) युधिष्ठिरके समकालिक मिथिलाके एक राजा, जिसे भीमसेनने दिग्विजयके समय पराजित किया था ( सभा० ३० । १३ ) ।
  • ( ग ) एक विदेहराज जनक, जिनके दरबारमें वन्दीद्वारा शास्त्रार्थमें हारे हुए कहोड़को समुद्रमें डलवा दिया गया था ( वन० १३२ । १५ ) ।
  • इनका अपनी यज्ञशालामें आये हुए अष्टावक्रसे वार्तालाप ( वन० १३३ । २०-३० ) ।
  • इनका अष्टावक्रको वन्दीके शास्त्रार्थ करनेका अवसर देना ( वन० १३३ । ३० ) ।
  • हारे हुए वन्दीको अष्टावक्रने इच्छानुसार जलमें डुबानेकी बात स्वीकार करना ( वन० १३४ । २९ ) ।
  • कहोड़का जनकके सामने प्रकट होकर पुत्रकी प्रशंसा करना ( वन० १३४ । ३२-३६ ) ।
  • राजाकी आज्ञासे वन्दीका समुद्रके जलमें प्रवेश ( वन० १३४ । ३७ ) ।
  • धर्मव्याधद्वारा कौशिक ब्राह्मणके प्रति जनकके गुणोंका वर्णन ( वन० २०७ । ३०-३९ ) ।
  • विदेहराज जनक सीताके पिता थे ( वन० २०४ । १९ ) ।
  • इनका राज्य छोड़कर संन्यास ग्रहण करनेका उपक्रम ( शान्ति० १८ । ४-५ ) ।
  • इनका अरुणिमा मुनिसे
  • कुटुम्बी जन और धनका नाश होनेपर क्या करना चाहिये, इस विषयमें प्रश्न करना ( शान्ति० २८ । ४ ) ।
  • जनकका स्वर्ग और नरकका प्रत्यक्ष दर्शन कराकर अपने सैनिकोंको युद्धके लिये प्रोत्साहित करना ( शान्ति० ९९ । ४-७ ) ।
  • कालकवृक्षीय मुनिके समझानेपर जनकका क्षेमदर्शीसे सन्धि करना और उसका सत्कार करके उसके साथ अपनी कन्याका ब्याह कर देना ( शान्ति० १०६ । २१-२८ ) ।
  • इनकी विरक्ति विषयक प्रश्न ( शान्ति० १०८ । २ ) ।
  • महर्षि माण्डव्यके तृष्णा विषयक प्रश्नका जनकद्वारा उत्तर ( शान्ति० २७६ अध्याय ) ।
  • पराशरजीसे इनके कल्याण-प्राप्तिके विषयमें जनक के प्रश्न ( शान्ति० २९० । ४ ) ।
  • पराशरजीसे इनके विविध प्रकारके प्रश्न ( शान्ति० २९६ । १-२; शान्ति० २९८ । २ ) ।
  • कराल जनकको वसिष्ठका उपदेश ( शान्ति० ३०२ अध्यायसे ३०८ अध्याय तक ) ।
  • वसुमान् जनकको एक धर्मविषयक उपदेश ( शान्ति० ३०९ अध्याय ) ।
  • महर्षि याज्ञवल्क्यसे देवरातपुत्र जनकका प्रश्न करना और उनके द्वारा उनके प्रश्नों का समाधान ( शान्ति० ३१० अध्याय से ३१८ अध्याय तक ) ।
  • जरा-मृत्युके उल्लङ्घनके विषयमें महर्षि पञ्च शिखसे जनदेव जनकका प्रश्न ( शान्ति० ३१९ । ५ ) ।
  • धर्मध्वज जनककी परीक्षाके लिये आयी हुई और उनके शरीरमें प्रविष्ट हुई सुलभासे उसपर दोषारोपण करते हुए इनका प्रश्न ( शान्ति० ३२० । ७५ ) ।
  • राजा जनकद्वारा शुकदेवजीका पूजन ( शान्ति० ३२६ । २२ ) ।
  • शुकदेवजीको उनका ज्ञानोपदेश ( शान्ति० ३२६ । २२-५१ ) ।
  • जनकने जीवनमें कभी मांस नहीं खाया था ( अनु० १९५ । ६५ ) ।
  • ब्राह्मणरूपधारी धर्म और जनकका ममत्व-त्यागविषयक संवाद ( आश्व० ३२ अध्याय ) ।

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