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जनमेजय

  • (१) एक राजर्षि, जो महाराज परीक्षित्के पुत्र थे । इनकी माताका नाम मद्ववती था, इनकी पत्नी वपुष्टमासे शतानीक और शङ्कुकर्ण नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए थे ( आदि० ९ । ९; आदि० ५५ । ८५-८६ ) ।
  • इन्होंने कुरुक्षेत्रमें दीर्घकालतक यज्ञ किया था ( आदि० ३ । १ ) ।
  • इनके तीन भाई थे—श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन ( आदि० ३ । १ ) ।
  • सरमाके शाप देनेपर इनका चिन्तित होना ( आदि० ३ । १ ) ।
  • इन्होंने सोमश्रवाको पुरोहित बनाया और भाइयोंको उनकी प्रत्येक आज्ञाके पालनका आदेश दिया ( आदि० ३ । १२-२० ) ।
  • उनके द्वारा तक्षशिलापर विजय ( आदि० ३ । २० ) ।
  • इनका वेदको अपना उपाध्याय बनाना ( आदि० ३ । ८२ ) ।
  • सर्पयज्ञ करनेके लिये इनको उत्तङ्ककी सलाह ( आदि० ३ । १८३-१८४ ) ।
  • काशिराज सुवर्णवर्माकी पुत्री वपुष्टमासे इनका विवाह ( आदि० ४४ । ८-९ ) ।
  • मन्त्रियोंके द्वारा अपने पिताकी मृत्युका विस्तारपूर्वक समाचार सुनकर तक्षकसे बदला लेनेका निश्चय ( आदि० ५० । ३३-५४ ) ।
  • ऋत्विजोंद्वारा इनको सर्प-सत्र करनेका परामर्श ( आदि० ५१ । ५-७ ) ।
  • इन्होंने यज्ञकी दीक्षा लेनेसे पहले ही सेवकको यह आदेश दे दिया कि मुझे सूचित किये बिना किसी अपरिचित व्यक्तिको यज्ञमण्डपमें न आने दिया जाय । इनका तक्षकको अग्नि-कुण्डमें गिरानेके लिये ऋत्विजोंको बारंबार प्रेरणा ( आदि० ५४ । ४-११ ) ।
  • उनका आस्तीकको वर देना और यज्ञ-समाप्तिका वर माँगनेपर उनसे दूसरा वर माँगनेका आग्रह करना ( आदि० ५६ । १७-२६ ) ।
  • इनके द्वारा यज्ञ बंद करनेकी आज्ञा देकर ऋत्विज आदि सदस्यों और लोहिताक्ष सूत तथा शिल्पीको पुरस्कार ( आदि० ५८ अध्याय ) ।
  • सर्वसत्रमें आये हुए व्यासजीसे इनकी महाभारत-युद्ध-सम्बन्धी वृत्तान्त सुनानेकी प्रार्थना ( आदि० ६० । १८-१९ ) ।
  • इनके प्रार्थना करनेपर व्यासजीकी आज्ञासे वैशम्पायनजीने इनसे पूर्ववंश, भरतवंश एवं कुरुवंशके परिचयपूर्वक सम्पूर्ण पुरातन इतिहास एवं महाभारत युद्धकी कथा सुनायी थी ( आदि० ६० । १८-२४ ) ।
  • इनका व्यासजीसे अपने पिताके दर्शन करानेकी प्रार्थना और व्यासजीका परलोकसे उनका आवाहन करके उसी रूप और अवस्थामें जनमेजयको दर्शन कराना, जनमेजयका पहले पिताको अवभृथ-स्नान कराकर स्वयं स्नान करना तथा आस्तीकसे अपने यज्ञको विविध आश्रमोंका केन्द्र बताना और आस्तीकके कहनेसे महर्षि व्यासका बारंबार पूजन करना । इसके बाद वैशम्पायनजीसे शेष कथा सुनानेके लिये कहना ( आश्रम० ३५ । ४-१८ ) ।
  • कथा सुनकर तथा यज्ञको समाप्त करके राजाने समस्त ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा देकर संतुष्ट किया और सबको विदा करके तक्षशिलासे हस्तिनापुरको चले आये ( स्वर्ग० ५ । ३३-३४ ) ।

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