← अनुक्रमणिका

महाभारतमें आये हुए जनमेजयके नाम

  • भारत; भरत-शार्दूल; भरतश्रेष्ठ; भारताग्र्य; भरतर्षभ; भरतसत्तम; कौरव; कौरवशार्दूल; कौरवनन्दन; कौरवेन्द्र; कौरव्य; कुरुशार्दूल; कुरुश्रेष्ठ; कुरुद्वह; कुरुवृद्ध; कुरुवृद्धोद्भव; कुरुनन्दन; कुरुप्रवीर; कुरुपुङ्गवाग्रज; कुरुसत्तम; पाण्डव; पाण्डवनन्दन; पाण्डवेय; पारिक्षित; पौरव आदि ।
  • (२) एक परलोकवासी नरेश ( आदि० १ । १२८ ) ।
  • ये यमराजके सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ८ । १९ ) ।
  • मान्धाताने इन्हें पराजित किया था ( द्रोण० ६२ । १० ) ।
  • इन्होंने तीन ही दिनोंमें विजयी होकर इस भूमण्डलका राज्य प्राप्त किया था ( शान्ति० १२४ । १४ ) ।
  • ब्राह्मणोंके लिये अपने शरीर और गौका त्याग करके इन्होंने उत्तम लोक प्राप्त किया था ( शान्ति० २३४ । २४; अनु० १३७ । ९ ) ।
  • (३) एक क्षत्रिय राजा, जो क्रोधवश नामक दैत्योंके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ६२ ) ।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इन्हें रण-निमन्त्रण भेजा गया था ( उद्योग० ५ । १६ ) ।
  • यह गदा-युद्धमें कुशल पर्वतीय राजा था । इसे धृतराष्ट्रपुत्र दुर्मुखने मारा था ( कर्ण० ६ । १९-२० ) ।
  • (४) एक राजा, जो भरतवंशी महाराज कुरुके द्वारा वाहिनीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ९४ । ५१ ) ।
  • (५) अश्ववान्कुमार परीक्षित्के वंशमें उत्पन्न एक राजा, जिसके पुत्रका नाम धृतराष्ट्र था ( आदि० ९४ । ५२-५६ ) ।
  • ये परीक्षित्-वंशीय नरेश, अर्जुनके प्रपौत्र और अभिमन्युके पौत्रसे भिन्न थे ( शान्ति० १५० । ३ ) ।
  • ये अनजानमें ब्रह्महत्या कर देनेके कारण प्रजा, ब्राह्मणों और पुरोहितों-द्वारा त्याग दिये गये और दुखी हो वनमें जाकर पुण्यकर्म एवं तपस्या करने लगे । इन्होंने पृथ्वीपर घूम-घूमकर ब्रह्मज्ञानिसमुदायका उपाय पूछा, अन्तमें एक शौनकवंशी इन्द्रोत मुनिकी शरणमें गये ( शान्ति० १५० । ४-८ ) ।
  • इन्द्रोत मुनिके फटकारनेपर इन्होंने उनकी ही शरण ग्रहण की ( शान्ति० १५१ । १-९ ) ।
  • इन्द्रोत मुनिने अश्वमेध यज्ञ कराकर इन्हें पापसे मुक्त किया ( शान्ति० १५३ । ३९ ) ।
  • (६) महाराज पूरुके पुत्र, इनकी माताका नाम कौसल्या था, इन्हींका दूसरा नाम प्रवीर है; इनके द्वारा मनुवंशकी कन्या अनन्ताके गर्भसे प्राचीनवान्की उत्पत्ति हुई थी ( आदि० ९५ । ११-१२ ) ।
  • (७) वरुणकी सभामें विराजमान होनेवाला एक नाग ( सभा० ९ । १० ) ।
  • (८) नीपवंशका

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in