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जयद्रथ

  • (१) सिन्धुदेशका राजा वृद्धक्षत्रका पुत्र; इसकी पत्नीका नाम दुःशला था ( आदि० ६७ । १०५-११० ) ।
  • दुःशलाके साथ उसका विवाह ( आदि० ११६ । १७-१८ ) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था ( आदि० १८४ । २१ ) ।
  • युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें सम्मिलित हुआ था ( सभा० ३४ । ८ ) ।
  • कौरवसभा में राजा युधिष्ठिर जुआ खेलते समय यह भी मौजूद था ( सभा० ५८ । २६ ) ।
  • जयद्रथका विवाहकी इच्छासे शाल्वदेशकी ओर जाते समय साथियोंसहित काम्यकवनमें पहुँचना और द्रौपदीको देखकर चकित होना; फिर दुर्जन भावनाका उदय होनेसे उनका परिचय जाननेके लिये कोटिकास्यको उनके पास भेजना ( वन० २६४ । १-१६ ) ।
  • द्रौपदीसे इसका अनुचित प्रस्ताव करना ( वन० २६५ । १२-१७ ) ।
  • द्रौपदीकी इसकी फटकार ( वन० २६७ । १९-२० और दाक्षिणात्य पाठके श्लोक ) ।
  • द्रौपदीका इसको धिक्कारना और फटकारना ( वन० २६८ । १-९ ) ।
  • इसका द्रौपदीको समझाना ( वन० २६८ । १०-१२ ) ।
  • पुनः द्रौपदीकी इसे कड़ी फटकार ( वन० २६८ । १३-२२ ) ।
  • उसका द्रौपदीको पकड़नेकी चेष्टा और उनके धक्के खाकर कटे पेड़की भाँति गिरना, फिर दुबारा उठकर उन्हें पकड़ना और रथपर बैठानेके लिये विवश कर देना ( वन० २६८ । २३-२५ ) ।
  • भीमसेनका जयद्रथको फटकारना ( वन० २६८ । २६-२७ ) ।
  • जयद्रथद्वारा अपहृत हुई द्रौपदीके पीछे धौम्य मुनिका जाना ( वन० २६८ । २८ ) ।
  • युधिष्ठिरके समक्ष धौम्यिकाद्वारा जयद्रथके अत्याचारका वर्णन ( वन० २६९ । १०-२२ ) ।
  • पाण्डवोंका जयद्रथको ललकारना ( वन० २६९ । २६ ) ।
  • द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन ( वन० २७० अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार और जयद्रथका पलायन ( वन० २७१ । १-३३ ) ।
  • भीम और अर्जुनका जयद्रथका पीछा करना और उसे फटकारना ( वन० २७१ । ४२-५१ ) ।
  • भीमसेनका जयद्रथको पकड़कर पीटना और अधमरा कर देना; उसका सिर मुँड़कर पाँच शिखाएँ रख देना; राजाओंकी सभामें युधिष्ठिरका दास बनाकर
  • अपना परिचय देनेके लिये उसे विवश करके बंदी बनाकर रथपर डाल लेना और युधिष्ठिरके सामने उसी दशामें उपस्थित करना ( वन० २७२ । २-१५ ) ।
  • युधिष्ठिरका इसे छोड़ देनेका आदेश और युधिष्ठिरकी दासता स्वीकार कर लेनेके कारण इसे छोड़ देनेके लिये द्रौपदीका भी भीमसेनसे अनुरोध ( वन० २७२ । १७-१८ ) ।
  • जयद्रथका छुटकारा; युधिष्ठिरका उसे उसके पापकर्म्मके लिये धिक्कारते हुए दासभावसे मुक्त कर देना और उसे सकुशल लौट जानेकी आज्ञा देना ( वन० २७२ । २१-२४ ) ।
  • जयद्रथका लज्जित हो सीधे गङ्गाद्वारको जाना और तपस्याद्वारा भगवान् शङ्करको प्रसन्न करके एक दिनके लिये अर्जुनके सिवा अन्य चार पाण्डवोंको जीत लेनेका वरदान प्राप्त करना ( वन० २७२ । २६-२९ ) ।
  • इसका सेनासहित दुर्योधनकी सहायतामें आना ( उद्योग० ११ । १९ ) ।
  • प्रथम दिनके युद्धमें द्रुपदके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ४५ । ५५-५७ ) ।
  • भीमसेनसे दुर्योधन की रक्षा करके भीमसेनपर आक्रमण ( भीष्म० ७९ । १०-२० ) ।
  • भीमसेनके पुरुषार्थसे इसका किंकर्त्तव्यविमूढ़ होना ( भीष्म० ८५ । ३५ के बाद ) ।
  • भीमसेन और अर्जुनके साथ युद्ध ( भीष्म० ११३ अध्यायसे ११४ अध्यायतक ) ।
  • विराटके साथ इसका द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ११४ । ४२-४४ ) ।
  • अभिमन्युके साथ युद्ध ( द्रोण० १४ । ६४-७४ ) ।
  • क्षत्रवर्म्माके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । १०-१२ ) ।
  • व्यूहद्वारपर पाण्डवोंको रोक देना ( द्रोण० ४२ । ७ ) ।
  • धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजयद्वारा इसकी वरप्राप्तिका वर्णन ( द्रोण० ४२ । १२-२२ ) ।
  • पाण्डवोंके साथ युद्ध और व्यूहद्वारको रोके रखना ( द्रोण० ४३ अध्याय ) ।
  • अर्जुनद्वारा की गयी अपने वधकी प्रतिज्ञा जानकर कौरवोंके सामने अपना भय प्रकट करके वहाँसे चले जानेकी आज्ञा माँगना ( द्रोण० ७५ । १०-१२ ) ।
  • इसके ध्वजका वर्णन ( द्रोण० १०५ । २०-२२ ) ।
  • अर्जुनके साथ इसका युद्ध ( द्रोण० १४५ अध्याय ) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे अर्जुनका जयद्रथके कटे हुए सिरको समन्तपञ्चकमें तपस्या करनेवाले, उसके पिताकी गोदमें गिराना तथा उसके सिरके भूमिपर गिरनेसे उनके भी सिरके सौ टुकड़े हो जाना ( द्रोण० १४६ । १०४-१३० ) ।
  • (२) एक राजा, जो यमसभामें बैठकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । ३६ ) ।

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