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जरत्कारु

  • (१) यायावरवंशक ब्राह्मणोंके घरमें उत्पन्न एक ऊर्ध्वरेता और महान् ऋषि, जो आस्तीकके पिता थे ( आदि० १३ । ११; आदि० १५ । २-३ ) ।
  • ( यायावर शब्दका अर्थ इसी अध्यायकी टिप्पणीमें देखना चाहिये । ) इनके द्वारा गर्तमें लटके हुए, अपने पितरोंका दर्शन तथा उनके आदेशसे विवाह करनेका इनका निश्चय ( आदि० १३ । १५-२० ) ।
  • इनके विवाहकी शर्तें ( आदि० १३ । २८-३१ ) ।
  • नागराज वासुकिद्वारा भिक्षाके रूपमें प्राप्त हुई अपने समान नामवाली कन्यासे इनका विवाह होनेकी कथा ( आदि० १४ । २-७ ) ।
  • इनका जरत्कारु नाम होनेका कारण ( आदि० ४० ।
  • ३-४ ) ।
  • इनकी तपस्याका वर्णन ( आदि० ४० । ९ ) ।
  • गर्तमें लटके हुए पितरोंद्वारा इनको अपने दुःखी कथा सुनाना तथा इनसे इनका परिचय पूछना ( आदि० ४५ । ३-१२ ) ।
  • पितरोंको अपना परिचय देकर कुछ शर्तोंके साथ विवाह करनेके लिये इनका उन्हें वचन देना ( आदि० ४५ । १३-१० ) ।
  • पत्नीके लिये विचरते हुए इनका कहीं पत्नी प्राप्त न होनेपर उदासीन हो वनमें जोर-जोरसे पुकार लगाना तथा धीरे-धीरे कन्याकी भिक्षा माँगना ( आदि० ४६ । १२-१३ ) ।
  • दूतोंद्वारा इनका उद्देश्य जानकर नागराज वासुकिना इनकी समस्त शर्तोंको स्वीकार करके इनके साथ अपनी बहिनका ब्याह कर देना ( आदि० ४६ । १९-२३; आदि० ४७ । ५ ) ।
  • पत्नीके साथ इनकी शर्त एवं ऋतुकाल आनेपर उसमें गर्भाधान ( आदि० ४७ । ८-१३ ) ।
  • धर्मलोपके भयसे पत्नीके द्वारा जगाये जानेपर इनके द्वारा पत्नीका परित्याग ( आदि० ४७ । १५-४३ ) ।
  • पुत्रके लिये पत्नीके प्रार्थना करनेपर 'तुम्हारे उदरमें गर्भ है' इस प्रकार पत्नीको इनका आश्वासन ( आदि० ४७ । ४२ ) ।
  • (२) नागराज वासुकिनी बहिन, जरत्कारु नामक ऋषिकी पत्नी तथा आस्तीककी माता ( आदि० १३ । ६-७ ) ।
  • धर्मलोपके भयसे पतिको जगानेपर पतिके द्वारा इनका परित्याग ( आदि० ४७ । १९-४३ ) ।
  • पुत्रके लिये प्रार्थना करनेपर जरत्कारु ऋषिके द्वारा इनको आश्वासन ( आदि० ४७ । ४२ ) ।
  • जरत्कारु ऋषिके चले जानेपर मातृ-शापसे चिन्तित हुए वासुकिनी इनका आश्वासन ( आदि० ५२ । ९-१३ ) ।
  • अपने पुत्र आस्तीकको सर्पोंकी रक्षाके लिये इनकी प्रेरणा ( आदि० ५४ । ५-१६ ) ।
  • (१) एक राक्षसी, जिसने जरासंधके शरीरके दोनों टुकड़ोंको जोड़ा था ( सभा० १७ । ४० ) ।
  • पूर्वकालमें ब्रह्माजीने गृहदेवीके नामसे इसकी सृष्टि की थी और इसे दानवोंके विनाशके लिये नियुक्त किया था । जो अपने घरकी दीवारपर इसे अनेक पुत्रादिसे युक्त स्त्रीके रूपमें भक्तिपूर्वक लिखता है—उसका दिन दूना रात चौगुना वृद्धि होती है; अन्यथा उसे हानि उठानी पड़ती है । मगधराज बृहद्रथके घरमें इसकी प्रसूति होती थी; अतः उसने प्रसन्न होकर दो टुकड़ोंमें उत्पन्न हुए शिशु जरासंधको जोड़कर बृहद्रथको सुरक्षित रूपसे दे दिया था ( सभा० १८ । १-७ ) ।
  • इसने बृहद्रथको अपना परिचय देना ( सभा० १८ । १-८ ) ।
  • इसकी मृत्युके कारणका श्रीकृष्णद्वारा अर्जुनके प्रति कथन ( द्रोण० १८१ । १२-१४ ) ।
  • (२) 'जरा' नामक एक व्याध, जिसने मृगके भ्रमसे सोते हुए श्रीकृष्णके एक पैरमें बाण मारा था ( मौसल० ४ । २२-२३ ) ।

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