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दक्ष

  • (१) ब्रह्माजीके दाहिने अँगूठेसे उत्पन्न एक महर्षि, जो महातपस्वी एवं प्रजापति थे । इनकी पत्नी ब्रह्माजीके बाएँ अँगूठेसे उत्पन्न हुई थी । उनके गर्भसे दक्षने पचास कन्याएँ उत्पन्न की थीं ( आदि० ६६ । १०-११ ) ।
  • ये ही कल्पान्तरमें दस प्रचेताओंद्वारा मारिषाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे; अतः प्राचेतस दक्ष कहलाते हैं । इनसे समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं; इसीसे ये संपूर्ण लोकके पितामह हैं ( आदि० ७५ । ५ ) ।
  • इनके समान ही गुणशीलवाले इनके एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए । उन्हें नारदजीने मोक्षशास्त्र एवं सांख्यज्ञानका उपदेश दे दिया; जिससे वे विरक्त होकर घरसे निकल गये । तब इन्होंने पुत्रिकारूपमें अनुसार दौहित्रोंको अपना पुत्र माननेका संकल्प लेकर पचास कन्याएँ उत्पन्न की ( आदि० ७५ । ६-८ ) ।
  • इन्होंने इनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको और कालका संचालन करनेमें नियुक्त नक्षत्रावरूपा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं ( आदि० ७५ । ८ ) ।
  • ये अर्जुनके जन्मकालमें कुन्तीदेवीके स्थानपर गये थे ( आदि० १२२ । ५२ ) ।
  • ये भगवान् ब्रह्माकी सभामें रहकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ११ । १८ ) ।
  • इन्होंने सरस्वतीके तटपर यज्ञ किया और उस स्थानके लिये एक वर दिया कि यहाँ मरनेवालेको स्वर्ग प्राप्त होगा । वही विनशन तीर्थ है ( वन० १३० । २ ) ।
  • ये ब्रह्माजीके मानसपुत्रोंमें सातवें हैं और रौद्रपर्वतपर रहते हैं ( वन० १५३ । १४ ) ।
  • इन्होंने सत्ताईस कन्याएँ सोमको ब्याह दी थीं; इनके पति चन्द्रमा केवल 'रोहिणी' को ही प्यार करते थे; अतः अन्य पत्नियोंने पिता दक्षके पास जाकर इस बातकी शिकायत की; तब दक्षने चन्द्रमासे कहा—'सोम ! तुम अपनी सभी पत्नियोंके प्रति समानतापूर्ण बर्ताव करो; जिससे तुम्हें महान् पाप न लगे ।' इसके बाद इन्होंने सब कन्याओंको समझाकर चन्द्रमाके यहाँ भेजा; परंतु सोमने इनकी बात नहीं मानी । अपनी पुत्रियोंके मुखसे फिर सोमकी शिकायत सुनकर इन्होंने उन्हें शाप देनेकी धमकी दी । जब चन्द्रमाने फिर उनकी बातकी अवहेलना कर दी; तब इन्होंने रोषपूर्वक राजयक्ष्माकी सृष्टि की और वह सोमके शरीरमें प्रविष्ट हो गया ( शल्य० ३५ । ४५-६२ ) ।
  • देवताओंके अनुरोध करनेपर इन्होंने बताया—सोम अपनी पत्नियोंके प्रति समानतापूर्ण बर्ताव करें और सरस्वती समुद्र-संगममें स्नान करके महादेवजीकी आराधना करें; तब इस रोगसे मुक्त हो जायँगे । प्रतिमास पंद्रह दिनतक ये प्रतिदिन क्षीण होंगे और आधे मासतक निरन्तर बढ़ते रहेंगे ( शल्य० ३५ । ७३—७७ ) ।
  • गङ्गाद्वारमें इनके आवाहन करनेपर सरस्वती वहाँ आयी और 'सुरेणु' नामसे विख्यात हुई ( शल्य० ३८ । २८-२९ ) ।
  • बाणशय्यापर पड़े हुए भीष्मको देखनेके लिये ये भी गये थे ( शान्ति० ४७ । १० ) ।
  • इनकी आठ कन्याएँ ब्रह्मर्षियोंको ब्याही गयी थीं, जिनसे अनेक प्रकारके जीव जन्तु तथा देवता-मनुष्य आदि उत्पन्न हुए ( शान्ति० १६६ । १७ ) ।
  • इनका एक नाम 'क' भी है ( शान्ति० २०८ । ७ ) ।
  • शिवजीद्वारा इनके यशका विध्वंस ( शान्ति० २८३ । ३२-३७ ) ।
  • यज्ञके समय इनके साथ इनका संवाद ( शान्ति० २८४ । २०-२१ ) ।
  • यज्ञविध्वंसके बाद इनका शिवजीकी शरणमें जाना ( शान्ति० २८४ । ५७ ) ।
  • शिवजीसे क्षमा-प्रार्थना करना ( शान्ति० २८४ । ६१-६४ ) ।
  • सहस्रनामद्वारा शिवजीका स्तवन करना ( शान्ति० २८४ । ६९-७० ) ।
  • इनके द्वारा रुद्रको शाप ( शान्ति० ३४२ । १ ) ।
  • इनके द्वारा चन्द्रमाको शाप । इनकी आठ कन्याओंमें जो अन्तिम दस थीं, वे मनुको ब्याही गयी थीं ( शान्ति० ३४२ । ५० ) ।
  • (२) गरुड़की प्रमुख संतानोंमेंसे एक ( उद्योग० १०१ । १३ ) ।
  • (३) एक विश्वेदेव ( अनु० ९१ । ३५ ) ।

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