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दधीच

  • ( १ ) कुरुक्षेत्रके अन्तर्गत एक परम पुण्यमय पावन तीर्थ, जहाँ सरस्वतीपुत्र अङ्गिराका जन्म हुआ था । इसमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता और सरस्वती-लोककी प्राप्ति होती है ( वन० ८३ । १८६-१८८ ) ।
  • ( २ ) महर्षि भृगुके पुत्र, इनके द्वारा वज्रनिर्माणके लिये देवताओंको अस्थिदान ( वन० १०० । २१ ) ।
  • सरस्वती नदीके द्वारा इन्हें सारस्वत नामक पुत्रकी प्राप्ति ( शल्य० ५१ । १३-१४ ) ।
  • इनके द्वारा सरस्वतीको वरदान ( शल्य० ५१ । १७-२४ ) ।
  • देवताओंके द्वारा अस्थिके लिये याचना करनेपर इनका प्राण त्याग करना ( शल्य० ५१ । २९-३० ) ।
  • इनकी अस्थियोंसे वज्र आदि अस्त्रोंका निर्माण ( शल्य० ५१ । ३१-३२ ) ।
  • ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि भृगुने तीव्र तपस्यासे भरे हुए लोकमङ्गलकारी विशालकाय एवं तेजस्वी दधीचको उत्पन्न किया था । ऐसा जान पड़ता था मानो सम्पूर्ण जगत्‌के सारतत्त्वसे उनका निर्माण हुआ हो । ये पर्वतके समान भारी और ऊँचे थे । इन्द्र इनके तेजसे सदा उद्विग्न रहते थे ( शल्य० ५१ । ३३-३४ ) ।
  • दक्षयज्ञमें शिवजीका भाग न देखकर कुपित हो दक्ष आदिको इनका चेतावनी देना ( शान्ति० २८४ । १२-२१ ) ।
  • देवताओंके कहनेसे प्राण त्याग करना ( शान्ति० २९२ । ५० ) ।

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