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दमयन्ती

  • भेजना ( वन० ६० । १९—२० ) ।
  • दमयन्तीका पतिके साथ तीन दिनोंतक नगरीके समीप केवल जल पीकर रहना और फल-मूलका आहार करते हुए वनमें जाना । पतिके विदर्भका रास्ता बताकर दाक्षिणा होना और उन्हें अपने साथ विदर्भनरेशके यहाँ चलनेके लिये कहना ( वन० ६१ । ५—३६ ) ।
  • एक धर्मशालामें दमयन्तीका पतिके साथ सोना और उठनेपर उन्हें न देख उनके लिये विलाप करना ( वन० अध्याय ६२ से ६३ । १२ तक ) ।
  • इन्हें अजगरका निगलना ( वन० ६३ । २१ ) ।
  • इनके शापसे व्याधका भस्म होना ( वन० ६३ । ३९ ) ।
  • इन्हें तपस्वियोंका आश्वासन ( वन० ६४ । १२—१५ ) ।
  • इनकी व्यापारी-दलसे भेंट तथा उन सबसे बात-चीत ( वन० ६४ । ११७—१३२ ) ।
  • जंगली हाथियोंके उपद्रवसे क्षतिग्रस्त व्यापारियोंका दमयन्तीको राक्षसी समझकर इसे मारनेका संकल्प करना और दमयन्तीका घने जङ्गलमें भागकर अपनी दयनीय दशापर विलाप करना ( वन० ६५ । २७—३५ ) ।
  • दमयन्तीकी चिन्ता, इनका चेदि-राजके नगरमें पहुँचकर उन्मत्ताकी भाँति घूमना और राजमाताद्वारा महलमें बुलवाया जाना ( वन० ६५ । ४५—५२ ) ।
  • राजमाता और दमयन्तीकी बातचीत ( वन० ६५ । ५३—६६ ) ।
  • राजमातासे शर्त करके दमयन्तीका वहाँ उदेगरहित हो निवास करना ( वन० ६५ । ६७—७६ ) ।
  • सुदेव ब्राह्मणका चेदि-पुरीमें राजाके पुण्याहवाचनके समय सुनन्दाके साथ खड़ी हुई दमयन्तीको देखना, इनके अनुपम सौन्दर्य तथा अन्य लक्षणोंद्वारा इन्हें पहचानना, इनकी दयनीय दशासे व्यथित होना । इन्हें सान्त्वना देनेके विचारसे इनके पास जाकर अपनेको इनके भाईका मित्र बताना और इनके माता-पिता तथा बच्चोंका कुशल-समाचार निवेदन करना । सुदेवको पहचानकर दमयन्तीका अपने सुहृदोंके समाचार पूछना और फूट-फूटकर रोना । सुनन्दाका दमयन्तीकी इस स्थितिके विषयमें राजमाताको सूचित करना और राजमाताका सुदेवको बुलाकर उनसे दमयन्तीका परिचय पूछना ( वन० ६८ अध्याय ) ।
  • सुदेवका दमयन्तीके विषयमें विस्तारपूर्वक सारी बातें बताना । उसके ललाटमें स्थित कमलके चिह्नकी ओर संकेत करना; राजमाताका उस चिह्नसे अपनी बहिनकी पुत्रीके रूपमें दमयन्तीको पहचानकर रोते-रोते गले लगाना । सुनन्दाका भी रोकर बहिन दमयन्तीको हृदयसे लगाना । दमयन्तीका मौसीसे विदर्भ जानेकी आज्ञा माँगना और उनके द्वारा दी हुई संरक्षक सेनाके साथ विदर्भ जाना । वहाँ पिताके घर पहुँचकर मातासे नलके अन्वेषणका
  • प्रयास करनेके लिये कहना । पिताकी आज्ञासे नलको ढूँढ़नेके लिये जाते हुए ब्राह्मणोंको नलसे कहनेके लिये अपना संदेश बताना और जो उस संदेशका उत्तर दें, उनकी सारी परिस्थिति जानकर उनके विषयमें शीघ्र सूचना देनेके लिये कहना ( वन० ६९ अध्याय ) ।
  • पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका मातासे संवाद करके पिताको सूचित किये बिना सुबाहुसे संदेश लाकर बाहुकरूपी राजा ऋतुपर्णके यहाँ कल ही सूर्योदयके बाद दमयन्तीके स्वयंवरका संदेश देकर भेजना ( वन० ७० अध्याय ) ।
  • नलके विषयमें दमयन्तीके विचार ( वन० ७३ । ८-१५ ) ।
  • इनके द्वारा बाहुककी परीक्षाके लिये केशिनीका भेजा जाना ( वन० ७५ । ५ ) ।
  • माता-पिताकी आज्ञा लेकर दमयन्तीका बाहुकको अपने महलमें बुलाना और 'महाराज नल मुझे छोड़कर क्यों चले गये ? क्या तुमने उन्हें कहीं देखा है ?' इत्यादि प्रश्न करके अपना दुःख निवेदन करना । बाहुकरूपी नलके नेत्रोंसे आँसू बहना और उनका 'कलियुगसे प्रेरित होकर सब कुछ करना पड़ा है ।' ऐसा कहकर दमयन्तीके द्वितीय पति-वरणकी भावनापर कटाक्ष करना, दमयन्तीका शपथपूर्वक अपनी निर्दोषता बताना । वायु देवताका आकाशवाणीद्वारा दमयन्तीकी शुद्धताका समर्थन करना और स्वयंवरको नलकी प्राप्तिका एक उपायमात्र बताना । तत्पश्चात् नलका अपने रूपको प्रकट करना और दमयन्तीके साथ उनका मिलन ( वन० ७६ अध्याय ) ।
  • पुष्करसे अपने राज्यको वापस लेकर नलका दमयन्तीको पुनः अपनी राजधानीमें बुलाना ( वन० ७९ । १ ) ।
  • एक त्रिभुवनविख्यात तीर्थ, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है । यहाँ ब्रह्मा आदि देवता भगवान् महेश्वरकी उपासना करते हैं ( वन० ८२ । ७२ ) ।

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