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दारुक

  • भगवान् श्रीकृष्णका सारथि । भगवान् श्रीकृष्णके द्वारका जाते समय युधिष्ठिरने दारुकको हटाकर थोड़ी देर स्वयं सारथ्य किया ( सभा० ८५ । ३० ) ।
  • वे दारुकके साथ द्वारका पहुँचे ( सभा० ८५ । ६० ) ।
  • इसके द्वारा जोतकर लाये हुए गरुडध्वज रथपर आरूढ़ हो भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुए ( सभा० ४५ । ६० ) ।
  • दारुकके पुत्रने प्रद्युम्नके रथका सञ्चालन किया ( वन० १८ । ३, १२, १५, २०, ३३; वन० १९ । ६, १०, १३ ) ।
  • शाल्वके बाणोंसे दारुकका पीड़ित होना ( वन० २१५ ) ।
  • शाल्वका वध करनेके लिये इसका श्रीकृष्णको उत्साहित करना ( वन० २२ । २१-२६ ) ।
  • उतरने सारथ्य कर्ममें अपनी उपमा श्रीकृष्णके सारथि दारुकसे दी ( विराट० ४५ । १६ ) ।
  • इसके सिवा उद्योगपर्वके ८३, ८४, १३१, १३७ अध्यायोंमें; द्रोणपर्वके ८२, ११२ अध्यायोंमें; कर्णपर्वके ७२ अध्यायमें; शान्तिपर्वके ४६, ५३ अध्यायोंमें और आश्वमेधिकके ५२ अध्यायमें भी दारुकका नाम आया है । श्रीकृष्णद्वारा समयपर रथ लानेके लिये आदेश मिलनेपर उसे स्वीकार करना ( द्रोण० ७९ । ४३-४४ ) ।
  • भगवान्की शङ्खध्वनि सुनकर उनके संदेशका स्मरण करके दारुकका जयद्रथ-वधके पश्चात् रथ लेकर श्रीकृष्णके पास जाना ( द्रोण० १४७ । ४५-४६ ) ।
  • सात्यकिके उस रथपर चढ़कर कर्णके साथ युद्ध करते समय इसकी रथ-संचालनकी कुशलता ( द्रोण० १४७ । ५४-५५ ) ।
  • भगवान्के रथको दारुकके देखते-देखते दिव्य घोड़े आकाशमें उड़ा ले गये ( मौसल० ३ । ५ ) ।
  • दारुकको भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको यादव-संहारकी बात बताने और उन्हें बुलानेके लिये जानेका आदेश देना तथा दारुका प्रस्थित होना ( मौसल० ४ । २-३ ) ।
  • दारुकका कुन्तीपुत्रोंसे मिलकर उनसे यदुवंश-विनाशका समाचार सुनाना और अर्जुनको साथ लेकर द्वारका लौटना ( मौसल० ५ । १-५ ) ।
  • अर्जुनका दारुकके प्रति वृष्णिवंशी स्त्रियोंके मिलनेकी इच्छा प्रकट करना ( मौसल० ७ । ६ ) ।

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