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दुःसह

  • सात्यकिके साथ इसका युद्ध ( द्रोण० ९९ । १५—१७ ) ।
  • सात्यकिसे पराजित होकर इसका सेनासहित पलायन ( द्रोण० १२१ । २९—४६ ) ।
  • सात्यकिके द्वारा पराजय ( द्रोण० १२२ । ३१—३४ ) ।
  • इसके द्वारा प्रतिविन्ध्यकी पराजय ( द्रोण० १६८ । १२ ) ।
  • सहदेवके साथ इसका युद्ध और उनके द्वारा पराजय ( द्रोण० १८८ । २—९ ) ।
  • धृष्टद्युम्नद्वारा इसकी पराजय ( द्रोण० १८५ । १५ ) ।
  • द्रोणाचार्यके मारे जानेपर इसका युद्धस्थलसे भागना ( द्रोण० १९२ । १५ ) ।
  • सहदेवद्वारा पराजित होना ( कर्ण० २२ । १६—२० ) ।
  • धृष्टद्युम्नको काबूमें कर लेना ( कर्ण० ६१ । ३३ ) ।
  • भीमसेनके साथ इसका युद्ध और पाण्डवोंपर आक्षेप ( कर्ण० ६२ । ३३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • क्रोधमें भरे भीमसेन और दुःशासनका घोर युद्ध ( कर्ण० ६२ । ३३ से कर्ण० ६३ । ७ तक ) ।
  • भीमसेनकी गदाकी चोटसे धरतीपर गिरकर दुःशासनका छटपटाना, भीमसेनका इसकी छातीपर चढ़कर इससे यह पूछना कि 'तूने किस हाथसे द्रौपदीके केश खींचे थे ।' दुःशासनका रोष और अभिमानके साथ अपनी गजशुण्ड-दण्डके समान मोटी दाहिनी भुजा दिखाकर यह उत्तर देना कि 'मैंने इसी हाथसे द्रौपदीके केश खींचे थे ।' भीमसेनका इसका उस भुजाको उखाड़कर उसीके द्वारा इसे पीटना और इसकी छाती फाड़कर इसके गरम रक्तको पीना ( कर्ण० ६३ । ८—२५ ) ।
  • दुःशासन जिसमें रहता था, वह सुन्दर महल वीरवर अर्जुनको रहनेके लिये दिया गया ( शान्ति० ४४ । ८—९ ) ।
  • व्यासजीके नियोगसे गान्धारीके गर्भाशयसे इसका भी प्रकट होना ( आश्रम० ३२ । १९ ) ।
  • मृत्युके पश्चात् इसे स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ( स्वर्गा० ५ । २१—२२ ) ।
  • धृतराष्ट्रका एक महारथी पुत्र ( आदि० १११ । ११४; आदि० ६७ । १३; आदि० ११६ । २ ) ।
  • यह पुलस्त्यकुलके राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ८९ ) ।
  • अर्जुनके साथ इसका युद्ध और पराजित होकर भागना ( विराट० ६१ । ४३—४५ ) ।
  • इसका सात्यकिके साथ युद्ध करके घायल होना ( द्रोण० ११६ । २—७ ) ।
  • भीमसेनद्वारा इसका वध ( द्रोण० १२५ । ३६ ) ।

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