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दुर्योधन

  • (१) धृतराष्ट्र और गान्धारीके सौ पुत्रोंमेंसे
  • एक, जो सबसे बड़ा था । यह अपने ग्यारह महारथी भाइयोंमें प्रधान था ( आदि० ६३ । ११६-१२० ) ।
  • यह कुरुकुलको कलङ्कित करनेवाला, दुर्बुद्धि तथा खोटे विचार रखनेवाला था और कलिके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ८७ ) ।
  • दुर्योधनके द्वारा प्रज्वलित की हुई वैरकी भारी आग असंख्य प्राणियोंके विनाशका कारण बन गयी । इसके सौ भाइयोंकी उत्पत्ति पुलस्त्यकुलके राक्षसोंके अंशसे हुई थी ( आदि० ६७ । ८८-८९ ) ।
  • इसकी जन्म-कथा ( आदि० ११४ । १९-२५ ) ।
  • इसके जन्म-समयमें प्रकट हुए अमाङ्गलिक अपशकुन ( आदि० ११४ । २७-२९ ) ।
  • इसके जन्मकालिक उपद्रवोंको देखकर इसे कुल-संहार बतलाते हुए इसे त्याग देनेके लिये धृतराष्ट्रको विदुरकी सलाह ( आदि० ११४ । ३४-३९ ) ।
  • जिस दिन भीमसेनका जन्म हुआ, उसी दिन दुर्योधनका भी हुआ ( आदि० १२२ । १९ ) ।
  • इसके द्वारा गङ्गातटवर्ती प्रमाणकोटि तीर्थमें जलक्रीडाका आयोजन और विष खिलाकर बेहोश किये हुए भीमसेनका जलमें प्रक्षेप ( आदि० १२७ । २७-४४ ) ।
  • इसका भीमसेनके सारथिको उसका गला घोंटकर मार डालना ( आदि० १२८ । ३६ ) ।
  • भीमसेनको भोजनमें पुनः कालकूट विष डलवानेका कुकृत्य ( आदि० १२८ । ३७ ) ।
  • इसकी गदायुद्धमें प्रवीणता ( आदि० १२९ । ६९ ) ।
  • इसका रणभूमिमें अश्वकौशल दिखाना ( आदि० १३३ । ३२-३५ ) ।
  • भीमसेनके साथ गदायुद्ध करते हुए इसका अश्वत्थामाद्वारा निवारण ( आदि० १३४ । ५ ) ।
  • इसके द्वारा कर्णका राज्याभिषेक ( आदि० १३४ । २८ ) ।
  • इसकी कर्णसे अटल मित्रताके लिये याचना ( आदि० १३५ । ४० ) ।
  • कर्णका पक्ष लेकर, इसका भीमसेन एवं पाण्डवोंपर आक्षेप ( आदि० १३६ । १७-१८ ) ।
  • द्रुपदद्वारा इसकी पराजय ( आदि० १३७ । २२ के बाद दा० पाठ ) ।
  • युधिष्ठिरपर प्रज्ञाका अनुग्रह देखकर इसकी चिन्ता ( आदि० १४० । २९ ) ।
  • पाण्डवोंको वारणावत भेजनेके विषयमें दुर्योधन और धृतराष्ट्रका संवाद ( आदि० १४१ । ३-२४ ) ।
  • लाक्षागृह बनवाने तथा पाण्डवोंको जलानेके लिये इसका पुरोचनको आदेश ( आदि० १४३ । २-१० ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें इसका कर्ण और भाइयोंसहित उपस्थित होना ( आदि० १८४ । १०४ ) ।
  • लक्ष्यवेधके लिये धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाते समय इसका झटकेसे उत्तान गिरना और लज्जित हो अपने स्थानपर लौट जाना ( आदि० १८४ । २८ के बाद ) ।
  • पाण्डवोंके विनाशके लिये इसके द्वारा धृतराष्ट्रके प्रति विविध उपायोंका कथन ( आदि० १९९ । २८-३१; आदि० २०० । ४-२० ) ।
  • पाण्डवोंको आधा राज्य देनेके लिये इसे भीष्मकी सम्मति ( आदि० २०२ । ५-१५ ) ।
  • इसका युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें भाइयोंसहित आना ( सभा० ३४ । ६ ) ।
  • युधिष्ठिरके लिये आयी हुई भेंट-सामग्रीको ग्रहण करना और सँभाल कर रखना ( सभा० ३५ । १३ ) ।
  • सबके विदा हो जानेपर भी युधिष्ठिरकी दिव्यसभामें दुर्योधन और शकुनि कुछ कालतक ठहरे रहे ( सभा० ४५ । ३८ ) ।
  • दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पा- पानीपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर इसका चिन्तित होना ( सभा० ४७ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये इसका शकुनिसे वार्तालाप ( सभा० ४८ अध्याय ) ।
  • इसका धृतराष्ट्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना तथा जुएके लिये अनुरोध करना ( सभा० ४९ । १२-३६; ४२ तथा ५० अध्याय ) ।
  • इसके द्वारा राजसूययज्ञमें युधिष्ठिरके लिये विभिन्न देशोंसे आयी हुई भेंटोंका धृतराष्ट्रके प्रति वर्णन ( सभा० अध्याय ५१ से ५२ तक ) ।
  • इसके द्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका अपने पिताके प्रति वर्णन ( सभा० ५३ अध्याय ) ।
  • इसका धृतराष्ट्रको उभाड़ना ( सभा० अध्याय ५५ से ५६ तक ) ।
  • जुएके अवसरपर विदुरकी इसकी फटकार तथा विदुरजीका इसे चेतावनी देना ( सभा० ६४ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीको फटकारकर सभाभवनमें लानेके लिये इसका विदुरको आदेश ( सभा० ६६ । १३ ) ।
  • विदुरका इसे पुनः फटकारना ( सभा० ६६ । २-१२ ) ।
  • द्रौपदीको सभाभवनमें लानेके लिये इसका प्रातिकामीको आदेश ( सभा० ६७ । १२ ) ।
  • द्रौपदीके प्रति इनके छल-कपटयुक्त वचन ( सभा० ७० । ३-६; सभा० ७१ । २० ) ।
  • इसके द्वारा अर्जुनकी वीरताका वर्णन ( सभा० ७४ । ६ के बाद ) ।
  • धृतराष्ट्रसे पुनः जुएके लिये इसका अनुरोध ( सभा० ७४ । १३-२३ ) ।
  • पुरवासियोंद्वारा इसकी निन्दा ( वन० ७ । १३-१७ ) ।
  • विदुरसे काम्यकवनमें लौट आनेपर इसकी चिन्ता ( वन० ७ । २-६ ) ।
  • इसे मैत्रेय ऋषिका शाप ( वन० १० । ३४ ) ।
  • इसके द्वारा द्वैतवनको यात्राविषयक कर्णप्रयुक्तिकी मन्त्रणा स्वीकार करना ( वन० २३८ । २-१६ ) ।
  • घोषयात्राके लिये प्रस्थान ( वन० २३९ । २२ ) ।
  • गौओंकी देख-भाल करना और इसके सैनिकोंका गन्धर्वोंके साथ संवाद ( वन० २४० अध्याय ) ।
  • दुर्योधन आदि कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध ( वन० २४१ अध्याय ) ।
  • चित्रसेन आदि गन्धर्वोंद्वारा दुर्योधन आदिकी पराजय तथा चित्रसेनका दुर्योधनको बंदी बनाना ( वन० २४२ । ६ ) ।
  • गन्धर्वोंके हाथसे छुड़ानेके लिये पाण्डवोंके प्रति इसकी पुकार ( वन० २४३ । ११ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इसका कर्णसे अपनी पराजयका समाचार बताना ( वन० २४८ अध्याय ) ।
  • कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए दुःशासनको राजा बननेका आदेश ( वन० २४९ । १-२७ ) ।
  • इसका आमरण अनशनमें हिं▨ बैठना ( वन० २५१ । १९-२७ ) ।
  • कृत्याद्वारा इसका रसातलमें पहुँचाया जाना ( वन० २५१ । २९ ) ।
  • दानवों तथा कर्णके द्वारा समझाये जानेपर इसका अनशन त्यागकर हस्तिनापुरको प्रस्थान ( वन० २५२ अध्याय ) ।
  • इसके वैष्णव यज्ञका आरम्भ और समाप्ति ( वन० अध्याय २५४ से २५६ तक ) ।
  • इसका महर्षि दुर्वासाको प्रसन्न करके युधिष्ठिरके आश्रमपर जानेके लिये वर माँगना ( वन० २५२ । १९-२२ ) ।
  • गुप्तचरोंद्वारा पाण्डवोंका पता न मिलनेपर मत्स्यदेशमें इसका परामर्श करना ( विराट० २६ । २-७ ) ।
  • मत्स्यदेशपर चढ़ाई करनेका निश्चय ( विराट० २९ । १४ के बाद दा० पाठ ) ।
  • मत्स्यदेशपर आक्रमण करनेके लिये दुःशासनको आदेश देना ( विराट० ३० । २०-२४ ) ।
  • अपने सैनिकोंको उभाड़ते हुए इसका अर्जुनसे युद्ध करनेका ही निश्चय ( विराट० ४० । २-१९ ) ।
  • कर्णकी बातोंसे कुपित हुए आचार्य-वर्गसे इसका क्षमा माँगना ( विराट० ५५ । २३ ) ।
  • अर्जुनके साथ युद्ध और उनमें हारकर भागना ( विराट० ६५ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णसे महायुद्धके रूपमें नारायणी सेना प्राप्त करना ( उद्योग० ७ । १३-२० ) ।
  • इसका बलरामजीके पास सहायता माँगनेके लिये जाना ( उद्योग० ७ । २४ ) ।
  • कृतवर्माके पास नारायणी सेना माँगनेके लिये जाना ( उद्योग० ७ । ३२ ) ।
  • प्रार्थना करनेपर शल्यका साथ देनेके लिये उनसे वचन लेनेके लिये उनसे प्रार्थना ( उद्योग० ८ । १६ ) ।
  • इनके पास ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका संग्रह ( उद्योग० ११ । २७ ) ।
  • धृतराष्ट्रसे अपने पक्षके वीरोंका नाम करते हुए अपना उत्कर्ष तथा पाण्डवोंका अपकर्ष बताना ( उद्योग० ५५ अध्याय ) ।
  • संजयसे पाण्डवोंके रथ तथा घोड़ोंके विषयमें प्रश्न ( उद्योग० ५६ । १ ) ।
  • धृतराष्ट्रसे अपनी प्रबलताका प्रतिपादन ( उद्योग० ५७ । १३-२० ) ।
  • युद्धको यज्ञका रूप देकर युद्ध करनेका ही निश्चय करना ( उद्योग० ५८ । १०-१८ ) ।
  • धृतराष्ट्रको पाण्डव सेनाके लिये आमंत्रण देना ( उद्योग० ५९ अध्याय ) ।
  • भीष्मजीसे अपने पक्षकी प्रबलता बताना ( उद्योग० ६३ । १-८ ) ।
  • श्रीकृष्णके सत्कारके लिये मार्गमें विश्राम-स्थान बनवाना ( उद्योग० ८५ । १२-१७ ) ।
  • श्रीकृष्णको कैद करनेका विचार प्रकट करना ( उद्योग० ८८ । १३ ) ।
  • अपना निमंत्रण अस्वीकार कर देनेपर श्रीकृष्णसे इसका कारण पूछना ( उद्योग० ९१ । १३-१५ ) ।
  • कण्वका दुर्योधनको मातलीयोपाख्यान सुनाना और संधिके लिये समझाना तथा इसके द्वारा कण्वमुनिके उपदेशकी अवहेलना ( उद्योग० १० अध्यायसे १०५ अध्यायतक ) ।
  • कौरव सभामें श्रीकृष्णको उत्तर देते हुए पाण्डवोंको सुईकी नोक बराबर भी भूमि न देनेका निश्चय करना ( उद्योग० १२० अध्याय ) ।
  • कैदकी सम्भावनासे इसका कौरव सभामें चला जाना ( उद्योग० १२८ । २५-२७ ) ।
  • श्रीकृष्णको कैद करनेका षड्यन्त्र ( उद्योग० १३० । ४-८ ) ।
  • रणयात्राके लिये सेनाको आज्ञा देना ( उद्योग० १५३ । ८-१० ) ।
  • इसके द्वारा अपने सेनापतियोंका निर्वाचन और अभिषेक ( उद्योग० १५५ । ३१-३३ ) ।
  • इसका भीष्मको प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषिक्त करना ( उद्योग० १५६ । १३ ) ।
  • रुक्मीकी सहायता लेनेका इनकार करना ( उद्योग० १५८ । ३७ ) ।
  • उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और श्रीकृष्ण, पाण्डव, द्रुपद, विराट, शिखण्डी और धृष्टद्युम्न आदिको कटुवचनोंद्वारा संदेश कहलाना ( उद्योग० १६० अध्याय ) ।
  • भीष्मसे कौरवपक्षके अतिरथियोंका नाम पूछना ( उद्योग० १६५ । १२-१६ ) ।
  • भीष्मसे पाण्डवपक्षके अतिरथियोंकी जानकारी प्राप्त करना ( उद्योग० १६८ । ३९-४२ ) ।
  • शिखण्डीको न मारनेके विषयमें भीष्मसे इसका प्रश्न ( उद्योग० १७३ । १-२ ) ।
  • भीष्मसे शिखण्डीका जन्मवृत्तान्त पूछना ( उद्योग० १८८ । १ ) ।
  • अपने पक्षके वीरोंसे उनकी शक्तिके विषयमें पूछना ( उद्योग० १९३ । २-७ ) ।
  • कुरुक्षेत्रके मैदानमें चलनेके लिये सेनाको आज्ञा देना ( उद्योग० १९५ अध्याय ) ।
  • भीष्मकी रक्षाके लिये दुःशासनको आदेश ( भीष्म० १५ । १२-२२ ) ।
  • इसका मणिमय महान् ध्वज नाग-चिह्नसे विभूषित था ( भीष्म० २० । २५-२६ ) ।
  • युद्धके लिये जाते समय गज-अश्व, रथारूढ़ और उसके गजकी छटाका वर्णन ( भीष्म० २० । ७-८ ) ।
  • द्रोणाचार्यसे दोनों पक्षोंके प्रधान-प्रधान वीरोंका वर्णन करना ( भीष्म० २५ । ७-९ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें भीमसेनके साथ इसका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । १९-२१ ) ।
  • भीमसेनके बाणोंसे आहत होकर इसका मूर्च्छित होना ( भीष्म० ५८ । १७ ) ।
  • भीष्मको उलाहना देना ( भीष्म० ५८ । ३४-४० ) ।
  • गजसेनाके साथ भीमसेनपर आक्रमण ( भीष्म० ६२ । १५ ) ।
  • भीमसेनके साथ युद्ध करके इन्हें मूर्च्छित कर देना ( भीष्म० ६४ । १६-२३ ) ।
  • पाण्डवोंके विशिष्ट पराक्रमके विषयमें भीष्मसे प्रश्न ( भीष्म० ७१ । ३१-३४ ) ।
  • भीमसेनके साथ युद्ध ( भीष्म० ७३ । १०-२३ ) ।
  • भीमसेनद्वारा इसका पराजित और मूर्च्छित
  • होना ( भीष्म० ७५ । ११-१६ ) ।
  • भीमसेनके पराक्रमसे भयभीत होकर इसकी भीष्मसे प्रार्थना ( भीष्म० ८० । ४-६ ) ।
  • धृष्टद्युम्नद्वारा इसका पराजित होना ( भीष्म० ८२ । ५३ ) ।
  • भीमसेनद्वारा एक साथ आठ भाइयोंके मारे जानेसे भीष्मके पास जाकर इसका विलाप करना ( भीष्म० ८८ । ३०-३८ ) ।
  • घटोत्कचके साथ इसका युद्ध और उसके साथी चार राक्षसोंका इसके द्वारा वध ( भीष्म० ९१ । २०-२१ ) ।
  • घटोत्कचके प्रहारसे इसका प्राण-संकटकी स्थितिमें पड़ जाना ( भीष्म० ९२ । १४ ) ।
  • इसके प्रहारसे भीमसेनका मूर्च्छित होना ( भीष्म० ९४ । ५-६ ) ।
  • घटोत्कचसे पराजित होकर भीष्मसे दुःख प्रकट करना ( भीष्म० ९५ । ३-१५ ) ।
  • भीष्मसे पाण्डवोंको मारने अथवा कर्णको युद्धके लिये आज्ञा देनेका अनुरोध करना ( भीष्म० ९७ । ३६-४२ ) ।
  • भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्थाके लिये दुःशासनको आदेश ( भीष्म० ९८ । ३१-४२; भीष्म० १०५ । २-६ ) ।
  • शल्यको युधिष्ठिरको रोकनेके लिये आदेश देना ( भीष्म० १०५ । २६-२८ ) ।
  • अपनी सेनाको मारी जाती देख भीष्मसे इसकी नाना ( भीष्म० १०९ । १६-२३ ) ।
  • सात्यकिके साथ इसका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११० । ३७; भीष्म० १११ । १७-१८ ) ।
  • अभिमन्युके साथ युद्ध ( भीष्म० ११७ । १-८ ) ।
  • इसके द्वारा अपने सैनिकोंको प्रोत्साहन ( भीष्म० ११० । २६-३० ) ।
  • सेनापतिकी आवश्यकताका वर्णन करते हुए कर्णसे अनुमति लेना ( द्रोण० ५ । ५-१२ ) ।
  • द्रोणाचार्यसे सेनापति होनेके लिये प्रार्थना करना ( द्रोण० ६ । २-११ ) ।
  • इसके द्वारा द्रोणाचार्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक ( द्रोण० ७ । ५ ) ।
  • युधिष्ठिरको जीवित पकड़ लानेके लिये द्रोणाचार्यसे वर माँगना ( द्रोण० १२ । ६ ) ।
  • पाण्डवोंकी सेनाकी द्रोणाचार्यद्वारा विचलित हुई देख कर्णसे इसका हर्षपूर्ण वार्तालाप ( द्रोण० २२ । ११-१७ ) ।
  • द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना ( द्रोण० ३३ । ७-९ ) ।
  • अभिमन्युको मारनेके लिये अपने महारथियोंको आदेश देना ( द्रोण० ३९ । १६-१९ ) ।
  • अभिमन्युसे युद्ध करनेके लिये कर्णको प्रेरित करना ( द्रोण० ४० । २३-२५ ) ।
  • अभिमन्युके प्रहारसे पीड़ित होकर भागना ( द्रोण० ४५ । १० ) ।
  • अर्जुनके भयसे भीत जयद्रथको इसका आश्वासन ( द्रोण० ७४ । १७-२० ) ।
  • द्रोणाचार्यको उपालम्भ ( द्रोण० ९४ । ४-१८ ) ।
  • अर्जुनसे युद्ध करनेमें अपनी असमर्थता प्रकट करना ( द्रोण० ९४ । २०-२२ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा बाँधे गये दिव्य कवचसे युक्त होकर युद्धके लिये जाना ( द्रोण०
  • ९४ । ७३-७५ ) ।
  • अर्जुनको युद्धके लिये ललकारना ( द्रोण० १०२ । ३६-३८ ) ।
  • अर्जुनके साथ युद्धमें पराजित होकर भागना ( द्रोण० १०३ । ३२ ) ।
  • इसके ध्वजका वर्णन ( द्रोण० १०५ । २४-२५ ) ।
  • सात्यकि द्वारा इसकी पराजय ( द्रोण० ११६ । २४-२५ ) ।
  • सात्यकिसे हारकर भाइयोंसहित भागना ( द्रोण० १२० । ४३-४४ ) ।
  • पाण्डवोंके साथ संग्राम ( द्रोण० १२४ । ३२-४२ ) ।
  • द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना ( द्रोण० १३० । ४-१२ ) ।
  • युधामन्यु और उत्तमौजाके साथ युद्ध ( द्रोण० १३० । ३०-४३ ) ।
  • अर्जुनके वधके लिये कर्णको प्रोत्साहित करना ( द्रोण० १३५ । १२-३३ ) ।
  • अर्जुनके साथ युद्ध ( द्रोण० १३५ अध्याय ) ।
  • जयद्रथवधके बाद खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना ( द्रोण० १५० अध्याय ) ।
  • कर्णसे वार्तालापके प्रसंगमें द्रोणाचार्यपर दोषारोपण ( द्रोण० १५२ । २-१४ ) ।
  • युधिष्ठिरके साथ युद्ध और पराजय ( द्रोण० १५३ । २९-३१ ) ।
  • अपनी सेनाकी रक्षाके लिये अनुरोध ( द्रोण० १५८ । २-४ ) ।
  • कर्णको मार डालनेके लिये उद्यत हुए अश्वत्थामाको मनाना ( द्रोण० १५९ । १३-१५ ) ।
  • अश्वत्थामासे पाञ्चालोंको मारनेके लिये अनुरोध ( द्रोण० १५९ । ८६-१०० ) ।
  • पैदल सैनिकोंको प्रदीप जलाने का आदेश ( द्रोण० १६३ । १९ ) ।
  • द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश ( द्रोण० १६३ । २९-३० ) ।
  • भीमसेनसे युद्ध और पराजित होकर भागना ( द्रोण० १६६ । ४३-४८ ) ।
  • कर्णकी सलाहमें शकुनिको पाण्डवों का वध करनेके लिये भेजना ( द्रोण० १७० । ६२-६५ ) ।
  • सात्यकिद्वारा पराजय ( द्रोण० १७१ । २२ ) ।
  • द्रोणाचार्य और कर्णको उपालम्भ ( द्रोण० १७२ । ३-७ ) ।
  • जटासुरके पुत्र अलम्बुषको घटोत्कचके साथ युद्ध के लिये आज्ञा देना ( द्रोण० १७४ । ५-११ ) ।
  • कर्ण को घटोत्कचके चंगुलसे छुड़ानेके लिये अलम्बुषको प्रेरित करना ( द्रोण० १७७ । ९-१३ ) ।
  • अलम्बुषके वधसे पश्चात्ताप करना ( द्रोण० १७८ । ३२-४० ) ।
  • द्रोणा चार्यको उपालम्भ देना ( द्रोण० १८१ । २-८; द्रोण० १८५ । २२-२३ ) ।
  • नकुलके साथ युद्ध और उनसे परास्त होना ( द्रोण० १८७ । ५०-५५ ) ।
  • सात्यकि के साथ संवाद और युद्ध ( द्रोण० १८९ । २३-४८ ) ।
  • द्रोणाचार्यके मारे जानेपर युद्ध-स्थलसे भागना ( द्रोण० १९३ । १० ) ।
  • अश्वत्थामासे द्रोणवधका समाचार सुनानेके लिये कृपाचार्यको आदेश देना ( द्रोण० १९३ । ३५ ) ।
  • अश्वत्थामासे पुनः नारायणास्त्र प्रकट करनेको कहना ( द्रोण० २०० । २५ ) ।
  • सात्यकिद्वारा इसकी
  • पराजय ( द्रोण० २०० । ५३ ) ।
  • अपनी सेनाको आश्वासन देना ( कर्ण० ३ । ७-१७ ) ।
  • कर्णसे सेना पति बननेके लिये प्रार्थना ( कर्ण० १० । २८- ३० ) ।
  • कर्णको सेनापति पदपर अभिषिक्त करना ( कर्ण० १० । ४३ ) ।
  • युधिष्ठिरके साथ युद्धमें इसकी पराजय ( कर्ण० २८ । ७-८; कर्ण० २९ । ३२ ) ।
  • कर्णके कथनानुसार व्यवस्थाके लिये उद्यत होना ( कर्ण० ३१ । ७१-७२ ) ।
  • कर्णका सारथ्य करनेके लिये शल्यसे प्रार्थना ( कर्ण० ३२ । ४-१२ ) ।
  • शल्यके कुपित होकर उठ जानेपर उनकी प्रशंसा करके उन्हें प्रसन्न करना ( कर्ण० ३२ । ५४-६२ ) ।
  • शल्यसे त्रिपुरोपा ख्यानका वर्णन ( कर्ण० ३३ अध्यायसे ३४ । १२१ तक ) ।
  • इसके द्वारा कर्णको परशुरामद्वारा दिव्यास्त्र-प्राप्तिका वर्णन ( कर्ण० ३४ । १२३-१६२ ) ।
  • शल्यको कर्णका सारथि बननेके लिये समझाना ( कर्ण० ३५ अध्याय ) ।
  • नकुल-सहदेवको अपने पराक्रमसे किं कर्तव्यविमूढ़ कर देना ( कर्ण० ५६ । १०-१८ ) ।
  • धृष्टद्युम्नके साथ युद्धमें इसका परास्त होना ( कर्ण० ५६ । ३४-४४ ) ।
  • भीमसेनद्वारा पराजित होना ( कर्ण० ५७ । ५३-६२ ) ।
  • कर्णसे अपनी सेनाकी रक्षाके लिये कहना ( कर्ण० ६४ । ४०-४२ ) ।
  • इसके द्वारा कुलिनद राजकुमारका वध ( कर्ण० ८५ । १४ ) ।
  • अश्वत्थामा द्वारा किये गये संधि प्रस्तावको न मानना ( कर्ण० ८८ । ३०-३३ ) ।
  • कर्णकी मृत्युसे दुखी होना ( कर्ण० ९० । १९ ) ।
  • अपने सैनिकोंको टाढ़स बँधाना ( कर्ण० ९३ । ५२-५९ ) ।
  • संधि के लिये समझाते हुए कृपाचार्यकी उत्तर देना और युद्धका ही निश्चय करना ( शल्य० ५ अध्याय ) ।
  • अश्वत्थामाके पास जाकर सेना पति के पदके लिये पूछना ( शल्य० ६ । १७-१८ ) ।
  • शल्यसे सेनापति बननेके लिये प्रार्थना ( शल्य० ६ । २५- २६ ) ।
  • शल्यको सेनापति पदपर अभिषिक्त करना ( शल्य० ७ । ६-७ ) ।
  • इसके द्वारा चेकितानका वध ( शल्य० १२ । ३९-४३ ) ।
  • भीमसेनद्वारा पराजित होना ( शल्य० १६ । ४२-४४ ) ।
  • अपनी सेनाको उत्साहित करना ( शल्य० १९ । ५८-६६ ) ।
  • इसका अद्भुत पराक्रम ( शल्य० २२ अध्याय ) ।
  • धृष्टद्युम्नद्वारा पराजित होना ( शल्य० २५ । २३ ) ।
  • अकेले भागकर सरोवरमें प्रवेश करना और मायासे उसका पानी बाँध देना ( शल्य० २९ । ५४ ) ।
  • कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माके कहनेपर भी युद्धसे उदासीनता प्रकट करना ( शल्य० ३० । १४-१८ ) ।
  • जलमें छिपे-छिपे युधिष्ठिरसे वार्तालाप करना ( शल्य० ३१ । ३८-५३ ) ।
  • युधिष्ठिरके
  • ललकारनेपर इसका जलसे बाहर निकलना ( शल्य० ३३ । ३३—३९ ) ।
  • कवच आदिसे सुसज्जित होकर इसका किसी एक पाण्डवके साथ युद्धके लिये उद्यत होना ( शल्य० ३६ । १६—१७ ) ।
  • भीमसेनके साथ गदायुद्धके लिये उद्यत होना ( शल्य० ३३ । ५२—५५ ) ।
  • भीमसेनके साथ गदायुद्धके लिये उद्यत होनेपर अपशकुन ( शल्य० ५६ । ८—१४ ) ।
  • भीमसेनके कटु वचनोंका उत्तर ( शल्य० ५६ । ३८—४० ) ।
  • भीमसेनके साथ भयंकर गदायुद्ध ( शल्य० ५७ अध्याय ) ।
  • भीमसेनकी गदाकी चोटसे जाँघ टूट जानेपर इसका पृथ्वीपर गिरना ( शल्य० ५८ । ४०—४८ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा किये गये आक्षेपोंका उत्तर देना ( शल्य० ६१ । २०—३९ ) ।
  • अपने कार्यपर संतोष प्रकट करना ( शल्य० ६१ । ५०—५५ ) ।
  • संजयके सामने विलाप करना ( शल्य० ६२ । ७—२९ ) ।
  • अश्वत्थामाको संदेश देना ( शल्य० ६३ । ३०—४० ) ।
  • अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्माके सामने अपने कार्यपर संतोष प्रकट करना ( शल्य० ६५ । २३—३१ ) ।
  • अश्वत्थामाको सेनापति बनाना ( शल्य० ६५ । ४१ ) ।
  • अश्वत्थामाके कर्मकी प्रशंसा करके प्राण-त्याग करना ( सौप्तिक० ९ । ५६—५७ ) ।
  • कर्णकी सहायतासे इसके द्वारा कलिंगराजकी कन्याके अपहरणकी चर्चा ( शान्ति० ४ । १३ ) ।
  • राजा दुर्योधनका सजा-सजाया भवन वीरवर भीमसेनको रहनेके लिये दिया गया ( शान्ति० ४४ । ६—७ ) ।
  • धृतराष्ट्रसे शीलके सम्बन्धमें इसके प्रश्नकी चर्चा ( शान्ति० १२४ । १८—६४ ) ।
  • व्यासजीके आवाहन करनेपर भाइयोसहित प्रकट होकर इसका धृतराष्ट्र आदि स्वजनोंसे मिलना ( आश्रम० ३२ । ९ ) ।
  • स्वर्गमें राजा दुर्योधन सूर्यके समान तेजस्वी और वीरोचित शोभासे सम्पन्न हो पुण्यकर्मा देवताओंके साथ बैठा था, जिसे युधिष्ठिरने प्रत्यक्ष देखा ( स्वर्गा० १ । ४—५ ) ।

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