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दुर्वासा

  • अपनी पुत्री सुदर्शनाको अग्निदेवके हाथों सौंपना ( अनु० २ । ३४ ) ।
  • (१) कठोर व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्मके विषयमें अपने निश्चयको सदा गुप्त रखनेवाले एक ब्राह्मण महर्षि, जो बड़े ही उग्र स्वभावके थे ( आदि० ११० । ४—५ ) ।
  • कुन्तीद्वारा इनकी परिचर्या ( आदि० ११० । ४ ) ।
  • इनके द्वारा कुन्तीको देवतार्जक वशीकरणमन्त्रका उपदेश ( आदि० ११० । ५—६ ) ।
  • ये भगवान् शङ्करके अंशभूत श्रेष्ठ द्विज हैं ( आदि० २२२ । ५२ ) ।
  • राजा श्वेतकिके शतवर्षीय यज्ञका सम्पादन करनेके लिये इनको भगवान् शङ्करका आदेश और इनका उस आदेशको शिरोधार्य करना ( आदि० २२२ । ५५—५८ ) ।
  • इनके द्वारा श्वेतकिके यज्ञका सम्पादन ( आदि० २२२ । ५९ ) ।
  • ये इन्द्रकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ७ । ११ ) ।
  • ब्रह्माजीकी सभामें रहकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ११ । २३ ) ।
  • इन्होंने जहाँ भगवान् श्रीकृष्णको वरदान दिया था, वह स्थान वरदानतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ ( वन० ८२ । ६३—६४ ) ।
  • इनके द्वारा महर्षि मुद्गलके दान-धर्म आदिकी छः बार परीक्षा ( वन० २६० । १२—२१ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनको वरप्रदान ( वन० २६१ । २३ ) ।
  • इनका पाण्डवोंके आश्रमपर जाना ( वन० २६३ । १—२ ) ।
  • स्नानके लिये गये हुए इनका पूर्ण तृप्तिका अनुभव करनेके कारण पाण्डवोंके यहाँ न जाकर शिष्योंसहित वहींसे पलायन ( वन० २६३ । २९ ) ।
  • राजा कुन्तिभोजके यहाँ आगमन और शर्तके साथ निवास ( वन० ३०३ । ७—८ ) ।
  • इनके द्वारा कुन्तीको अथर्ववेदीय उपनिषदोंमें प्रसिद्ध मन्त्रका दान ( वन० ३०५ । २० ) ।
  • पत्नीसहित भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना और इनका उन्हें वर देना ( द्रोण० ११ । ९ ) ।
  • इनका श्रीकृष्णका आतिथ्य स्वीकार करके उनके क्रोधकी परीक्षा करना ( अनु० १५९ । १८—३६ ) ।
  • श्रीकृष्णकी सेवासे प्रसन्न होकर रुक्मिणीसहित उन्हें वर देना तथा श्रीकृष्णने जो इनकी जूठनको अपने पैरोंमें नहीं लगाया था, उसे अप्रिय कार्य बताना ( अनु० १५९ । ३७—४८ ) ।
  • महापराक्रमी भगवान् शिव ही दुर्वासा नामक ब्राह्मण बनकर द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णसहित टिके रहे ( अनु० १६० । ३७ ) ।
  • कुन्तीद्वारा क्रोधी एवं तपस्वी दुर्वासाकी आराधना और उनके द्वारा कुन्तीको वरकी प्राप्तिके प्रसंगकी चर्चा ( आश्रम० ३० । २—६ ) ।
  • मौसलकाण्डमें यदुवंशविनाशके पश्चात् एक जगह बैठे हुए श्रीकृष्णने दुर्वासाके
  • उस कथनका स्मरण किया था, जिसे इन्होंने खीरके उच्छिष्ट भागको पैरमें न लगानेके कारण इनसे कहा था ( मौसल० ४ । १९ ) ।

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