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दुष्यन्त

  • (१) पूरुवंशके एक सुप्रसिद्ध राजा, चक्रवर्ती सम्राट् ( आदि० ६८ । ३ ) ।
  • इनके राज्यकालमें प्रजाजनोंकी धार्मिकताका वर्णन ( आदि० ६८ । १६-१९ ) ।
  • इनकी भगवान् विष्णुके समान शारीरिक शक्ति, सूर्यतुल्य तेज एवं गदायुद्धकी कुशलता ( आदि० ६८ ।
  • ११-१३ ) ।
  • इनकी मृगयाका वर्णन ( आदि० ६९ । १-१३ ) ।
  • इनका कण्वके मनोहर आश्रममें प्रवेश तथा वहाँकी शोभाका निरीक्षण ( आदि० ७० । २४-५१ ) ।
  • कण्वके आश्रममें इनकी शकुन्तलासे भेंट । उसे अपना परिचय देकर उसके प्रति प्रेम प्रकट करना एवं उससे उसका परिचय पूछना ( आदि० ७१ । ३-१३ ) ।
  • शकुन्तलाके कण्वपुत्री कहकर परिचय देनेपर इनका मुनिकी ऊर्ध्वरेता बताकर इस बातपर संशय प्रकट करना ( आदि० ७१ । १४-१७ ) ।
  • शकुन्तलाका इनसे अपने जन्मका विस्तृत परिचय देना ( आदि० ७१ । १८ से ७२ अध्यायतक ) ।
  • इनका शकुन्तलाको अपनी भार्या बनानेके लिये प्रेरित करना और विवाहके आठ भेद बतलाकर उसके साथ गान्धर्वविवाहका समर्थन करना ( आदि० ७३ । १-१४ ) ।
  • शकुन्तलाके साथ इनका गान्धर्वविवाह और समागम तथा उसे राजधानीमें शीघ्र बुला लेनेके लिये आश्वासन ( आदि० ७३ । १९-२९ और द० पाठ ) ।
  • इनके द्वारा शकुन्तलाके गर्भसे भरतकी उत्पत्ति ( आदि० ७४ । १-२ ) ।
  • इनका शकुन्तलाको अस्वीकार करना ( आदि० ७४ । १९-२० ) ।
  • शकुन्तलाका इनके प्रति धर्मकी याद दिलाना, असत्यभाषण और अधर्मसे भय बताना तथा पत्नी एवं पुत्रकी महिमा बतलाते हुए पुत्रको अङ्गीकार करनेके लिये रोषपूर्ण अनुरोध करना ( आदि० ७४ । २४-७२ ) ।
  • इनके द्वारा शकुन्तलाकी भर्त्सना ( आदि० ७४ । ७३-८१ ) ।
  • इनके द्वारा शकुन्तलाका सत्य-धर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन ( आदि० ७४ । १०१-१०० ) ।
  • आकाशवाणीद्वारा इनके समक्ष शकुन्तलाकी उक्तिका समर्थन करनेपर इनका उसको अङ्गीकार करना ( आदि० ७४ । १०९-१२६ ) ।
  • सौ वर्षोंतक राज्य भोगनेके बाद इनका स्वर्गगमन ( आदि० ७४ । १२६ के बाद द० पाठ ) ।
  • ये इलिनके पुत्र थे, इनकी माताका नाम रथन्तरी था ( आदि० ६४ । १७ ) ।
  • ये यमकी सभामें रहकर सूर्यपुत्र भगवान् यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । १५ ) ।
  • इन्होंने जीवनमें कभी मांस नहीं खाया था ( अनु० ११५ । ६४ ) ।
  • (२) पूरुवंशी महाराज अजमीढके द्वारा 'नीली' के गर्भसे उत्पन्न, इनके दूसरे भाईका नाम 'परमेष्ठी' था ( आदि० ९४ । ३२ ) ।
  • दुष्यन्त और परमेष्ठी सभी पुत्र 'पाञ्चाल' कहलाये ( आदि० ९४ । ३३ ) ।

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