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देवयानी

  • शुक्राचार्यकी प्यारी पुत्री ( आदि० ७६ । १५ ) ।
  • बिना कचके ही गौओंको लौटकर आयी देख देवयानीके मनमें उनके मारे जानेकी आशङ्का और 'कचके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती' ऐसा कहकर उसका पितासे कचको बुलानेका अनुरोध ( आदि० ७६ । २०-२२ ) ।
  • दूसरी बार भी देवयानीके अनुरोधसे शुक्राचार्यद्वारा कचको जीवनदान ( आदि० ७६ । ४२ ) ।
  • तीसरी बार पुनः कचको जीवित करनेके लिये देवयानीका आग्रह ( आदि० ७६ । ४५-५० ) ।
  • इसका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध ( आदि० ७७ । २-११ ) ।
  • प्रार्थनाके अस्वीकृत होनेपर इसके द्वारा कचको शाप ( आदि० ७७ । १७ ) ।
  • कचद्वारा इसको शाप ( आदि० ७७ । १९-२० ) ।
  • इसके द्वारा इसका वस्त्र पहन लेनेके कारण शर्मिष्ठाको फटकार ( आदि० ७८ । ८ ) ।
  • शर्मिष्ठाद्वारा भर्त्सनापूर्वक इसका कुएँमें गिराया जाना ( आदि० ७८ । १२-१३ ) ।
  • इसकी राजा ययातिसे भेंट, वार्तालाप और राजा ययातिके द्वारा इसका कुएँसे उद्धार, कुएँसे निकलनेपर इसके द्वारा राजा ययातिसे अपना पाणिग्रहण करनेके लिये प्रार्थना तथा ब्राह्मणकन्या होनेके कारण ययातिद्वारा इसकी प्रार्थनाको अस्वीकार करना ( आदि० ७८ । १७-२४ ) ।
  • धायका नामक धायके द्वारा इसका शुक्राचार्यके नगरमें न जानेके लिये अपने पिताको संदेश देना ( आदि० ७८ । २५-२७ ) ।
  • शर्मिष्ठाने मेरी पुत्रीको मारा है, यह सुनकर पिताका इसे खोजते हुए वनमें जाना तथा इसे हृदयसे लगाकर सान्त्वना देना ( आदि० ७८ । २८-३१ ) ।
  • शर्मिष्ठाके द्वारा किये हुए अपमानका इसके द्वारा अपने पिता शुक्राचार्यके समक्ष वर्णन ( आदि० ७८ । ३१-३६ ) ।
  • शुक्राचार्यका इसके समक्ष अपने शक्तिका कथन और इसे सान्त्वना प्रदान ( आदि० ७८ । ३७-४१ ) ।
  • शुक्राचार्यका सहनशीलताकी प्रशंसा करते
  • हुए इसको आश्वासन देना ( आदि० ७१ । १-७ ) ।
  • इसकी दानवोंके बीचमें निवास करनेसे अरुचि, विद्वानोंके लिये धनके लोभसे कटुवचन कहनेकी निन्दा ( आदि० ७१ । ८-१३ तथा दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • शुक्राचार्यका अपनी प्रियपुत्री देवयानीके प्रति किये गये अनुचित बर्तावको अमह्य बताना और देवयानीको संतुष्ट करनेके लिये वृषपर्वाको प्रेरित करना ( आदि० ८० । १-१२ ) ।
  • वृषपर्वाके मुँहमाँगी वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा करनेपर एक हजार कन्याओंके साथ शर्मिष्ठाके आजीवन अपनी दासी बनकर रहनेके लिये उसके पिता वृषपर्वासे इसकी माँग ( आदि० ८० । १३ ) ।
  • शर्मिष्ठाद्वारा दासीभाव स्वीकार करनेपर दासमें जानेके लिये इसकी स्वीकृति ( आदि० ८० । २४ ) ।
  • सखियोंके साथ वनमें क्रीड़ा करती हुई शर्मिष्ठासेवित देवयानीका ययातिको दर्शन ( आदि० ८१ । १-७ ) ।
  • ययातिके पूछनेपर देवयानीका उन्हें शर्मिष्ठासहित अपना परिचय देना और उनसे अपना पति बननेके लिये प्रार्थना करना ( आदि० ८१ । ८-१० ) ।
  • ययातिको ब्राह्मणकी महिमा बताते हुए अपनेको ब्राह्मण कन्यासे विवाहका अनधिकारी बताना और देवयानीके पिताकी आज्ञाके बिना उस स्वीकार न कर सकनेका निश्चय प्रकट करना ( आदि० ८१ । १०-२६ ) ।
  • ययातिके साथ अपने विवाहके लिये इसकी अपने पितासे प्रार्थना ( आदि० ८२ । १० ) ।
  • पिताद्वारा इसका ययातिको समर्पण ( आदि० ८२ । १४ ) ।
  • इसका ययातिके साथ विधिपूर्वक विवाह एवं पतिगृहगमन ( आदि० ८२ । ३६-३८ ) ।
  • देवयानीका विहार और दीर्घकालतक आनन्दोपभोग ( आदि० ८२ । १-४ ) ।
  • इसका गर्भ-धारण और प्रथम पुत्रका जन्म ( आदि० ८२ । ५ ) ।
  • शर्मिष्ठाकी पुत्र-प्राप्तिसे देवयानीको चिन्ता और किसी श्रेष्ठ ऋषिसे उसे सन्तानकी प्राप्ति हुई—यह सुनकर इसका क्रोधरहित हो महलमें लौट जाना ( आदि० ८३ । १-७ ) ।
  • ययाति द्वारा देवयानीके गर्भसे यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंकी उत्पत्ति ( आदि० ८३ । ९; ७५ । ३५ ) ।
  • ययातिके धर्मिष्ठ होनेका यह रहस्यका बालकोंद्वारा ही भेदन होनेसे देवयानीका शर्मिष्ठाको फटकारना और ययातिके रुष्ट हो वहाँसे अपने पिताके घर जाना ( आदि० ८३ । ११-२६ ) ।
  • इसके द्वारा पितासे ययातिके असद्वर्तावका निवेदन और इसके पिता द्वारा राजाको वृद्ध होनेका शापदान ( आदि० ८३ । २८-३१ ) ।

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