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द्रुपद

  • शक्ति का आना और इन महाबली नरेशका अपनी पत्नी शैब्याके साथ ऋषियोंके आश्रमोंमें जाकर सत्यवान्‌को ढूँढ़ना ( वन० २९८ । २ ) ।
  • सत्यवान्‌के वनसे न लौटनेपर इनकी चिन्ता ( वन० २९८ । ८ ) ।
  • शाल्व-देशकी प्रजाके अनुरोधसे इनका राज्याभिषेक ( वन० २९९ । ११ ) ।
  • सत्यवान्‌के साथ वार्तालाप ( शान्ति० २६७ अध्याय ) ।
  • (२) एक पर्वतीय राजा, जिसके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्णने सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करके युद्ध किया था ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८२४ ) ।
  • ये युधिष्ठिर-की सभामें विराजते थे ( सभा० ४ । ३१ ) ।
  • पाञ्चालदेशके राजा यज्ञसेन, जो मरुद्गणोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६० । ६८ ) ।
  • ये महाराज पृषत्‌के पुत्र थे ( आदि० १२९ । १ ) ।
  • भरद्वाजमुनिके आश्रममें द्रोणके साथ इनका खेलना और अध्ययन करना ( आदि० १२९ । १२ ) ।
  • पृषत्‌की मृत्युके पश्चात् इनका राज्यपर अभिषेक हुआ ( आदि० १२९ । १३ ) ।
  • इनके यहाँ द्रोणका आना और इन्हें अपना सखा या मित्र कहनेके कारण इनके द्वारा फटकारा जाना ( आदि० १३० । १-११ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा द्रुपद-के समीप धनुर्वेद-अध्ययनसम्बन्धी वृत्तान्तकी चर्चा ( आदि० १३० । ४३ ) ।
  • अध्याय-भाव्यमें इनके द्वारा द्रोणको दिये गये आश्वासनकी चर्चा ( आदि० १३० । ४६-४७ ) ।
  • कौरवोंका आक्रमण सुनकर और उनकी विशाल सेनाको अपनी आँखों देख पाञ्चालराज द्रुपदका भाइयोंसहित निकलना और शत्रुओं-पर बाणोंकी बौछार करना ( आदि० १३० । १०-११ ) ।
  • इनका घोर युद्ध करके कौरवसेनाको पराजित करना ( आदि० १३७ । ३२-३५ ) ।
  • इनका भीमसेन और अर्जुनके साथ युद्ध तथा पराजय । अर्जुनद्वारा इन्हें बंदी बनाकर द्रोणको अर्पण करना ( आदि० १३७ । २८-६३ ) ।
  • द्रोणका इन्हें आधा राज्य देकर और मित्र बने रहनेके लिये कहकर छोड़ना और इनका उनके साथ अटूट मैत्रीकी इच्छा प्रकट करना ( आदि० १३७ । ७०-७४ ) ।
  • इनके द्वारा किये हुए द्रोणके अपमानका एक ब्राह्मण द्वारा एकचक्रामें पाण्डवोंके प्रति वर्णन ( आदि० १६५ । ७-१५ ) ।
  • द्रोणविनाशक पुत्रकी प्राप्तिके लिये द्रुपदका ऋषियों और ब्राह्मणोंके आश्रमोंमें घूमना तथा ब्रह्मर्षि याज-उपयाजके पास पहुँचकर उपयाज ऋषिने अपने उद्देश्य-सिद्धिके लिये प्रार्थना एवं इन्हें दस करोड़ धेनुका प्रलोभन देना ( आदि० १६६ । १-१२ ) ।
  • उपयाजका उनकी प्रार्थनाको अस्वीकार कर देना ( आदि० १६६ । १३ ) ।
  • इनका द्रोणकी महिमा बताकर द्रोणान्तक पुत्रके लिये महर्षि याजसे प्रार्थना करना और उनको एक अर्बुद धेनुका प्रलोभन देना ( आदि० १६६ । २२-३१ ) ।
  • इनको यज्ञकुण्डसे 'धृष्टद्युम्न' नामक पुत्र एवं 'कृष्णा' नामकी कन्याकी प्राप्ति ( आदि० १६६ । ३९-४४ ) ।
  • लाक्षागृहमें पाण्डवोंकी मृत्यु होनेका समाचार सुनकर इनका शोक, अर्जुनके लिये इनकी चिन्ता तथा उन्हींके साथ द्रौपदीका विवाह करनेका इनका संकल्प ( आदि० १६६ । ५६ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ४५३ ) ।
  • अपने पुरोहितद्वारा इनको पाण्डवोंके जीवित रहनेका आश्वासन और द्रौपदीके स्वयंवरके लिये अनुरोध ( आदि० १६६ । ६० दा० पाठ, पृष्ठ ४५३ ) ।
  • द्रुपदने अर्जुनको ढूँढ़ निकालनेके लिये ऐसा दृढ़ धनुष बनवाया था, जिसे दूसरा कोई झुका भी न सके ( आदि० १८४ । ८-९ ) ।
  • इनकी स्वयंवरके समय लक्ष्यवेधके लिये घोषणा ( आदि० १८४ । ११ ) ।
  • स्वयंवरमें आये हुए राजाओंद्वारा इनपर आक्रमण और पाण्डवोंद्वारा इनकी रक्षा ( आदि० १८४ । १३-१६ ) ।
  • पाण्डव अज्ञात मनुष्यके साथ कुम्भकारके घर द्रौपदीके चले जानेपर उसके सम्बन्धमें इनकी चिन्ता ( आदि० १९१ । १५-१८ ) ।
  • चिन्तित हुए द्रुपदको धृष्टद्युम्नका आश्वासन देना ( आदि० १९२ । १३-१३ ) ।
  • पाण्डवोंका परिचय जाननेके लिये इनका अपने पुरोहितको आदेश ( आदि० १९२ । १४ ) ।
  • पाण्डवोंका परिचय पानेके लिये इनका युधिष्ठिरसे प्रश्न ( आदि० १९५ । २-७ ) ।
  • युधिष्ठिरका द्रुपदको आश्वासन देना, 'द्रौपदीका विवाह किसके साथ हो'—इस प्रश्नको लेकर युधिष्ठिरके साथ इनका वार्तालाप और एक स्त्रीके अनेक पुरुषोंके साथ
  • विवाहका विरोध ( आदि० १९५ । ८-३२ ) ।
  • व्यासजीके पूछनेपर द्रौपदीके विवाहके सम्बन्धमें इनकी अनुमति ( आदि० १९५ । ७-९ ) ।
  • पाण्डवों एवं द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर व्यासद्वारा इनको दिव्य दृष्टिका दान ( आदि० १९६ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवोंको विपुल धनराशि की दहेज रूपमें भेंट ( आदि० २०६ । ९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • दिग्विजयके समय कर्णद्वारा इनकी पराजय ( वन० २५३ । १३ ) ।
  • भीम भूमि पाण्डवोंद्वारा स्थापित अग्निको लेकर उसकी रक्षाके लिये द्रुपदके ही यहाँ भेजे गये थे ( विराट० ७२ । १-३ ) ।
  • उपप्लव्य नगरमें अभिमन्युके विवाहमें इनका आगमन ( विराट० ७२ । १७ ) ।
  • राजाओंके पास रण-निमन्त्रण भेजनेके लिये इनका प्रस्ताव ( उद्योग० ४ । ८-२४ ) ।
  • अपने पुरोहितको दूत बनाकर कौरव-सभामें भेजनेका प्रस्ताव ( उद्योग० ४ । २५ ) ।
  • पुरोहितको दैत्य-कर्मके लिये इनका अनुमति देना ( उद्योग० ५ । ७ ) ।
  • एक अक्षौहिणी सेना लेकर इनका पाण्डवोंके पास आना ( उद्योग० ५७ । ७-५ ) ।
  • ये पाण्डव-सेनाके सात सेनापतियोंमेंसे एकके पदपर अभिषिक्त हुए थे ( उद्योग० १५० । ११-१२ ) ।
  • उलूकसे दुर्योधनके सन्देशका उत्तर देना ( उद्योग० १६३ । ४१ ) ।
  • संतान-प्राप्तिके लिये इन्हें महादेवजीसे वर-प्राप्ति ( उद्योग० १६७ । ५-६ ) ।
  • हिरण्यवर्माकी चढ़ाईका समाचार पाकर इनका पत्नीसे संकट निवारणका उपाय पूछना ( उद्योग० १९० । १४-२१ ) ।
  • रानीकी सम्मतिसे देवार्चन करना ( उद्योग० १९१ । १ ) ।
  • हिरण्यवर्माको शिखण्डीका परीक्षक लिये संदेश देना ( उद्योग० १९० । २७ ) ।
  • शिखण्डीको द्रोणाचार्यके पास भेजकर उनसे धनुर्वेदकी शिक्षा दिलाना ( उद्योग० १९२ । ६० ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें जयद्रथके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ८५ । ५५-५७ ) ।
  • द्रोणाचार्यसे पराजित होना ( भीष्म० ७७ । ४८; भीष्म० १०५ । २३-२७ ) ।
  • भगदत्तके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( द्रोण० १४ । २६ ) ।
  • भीष्म० १११ । २३-२७ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ युद्ध ( द्रोण० १४ । ४३ ) ।
  • भगदत्तके साथ युद्ध ( द्रोण० १४ । ४०-४२ ) ।
  • इनके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २२ । १२ ) ।
  • इनका बाहीकके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । १८-१९ ) ।
  • वृषसेनद्वारा इनकी पराजय ( द्रोण० १६८ । ४३ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इनका वध ( द्रोण० १६८ । ४३ ) ।
  • इनका श्राद्धकर्म ( शान्ति० १६३ । ५ ) ।
  • व्यासजीके आवाहन करनेपर अन्य परलोकवासी वीरोंके साथ ये भी गङ्गाजीके जलसे प्रकट हुए थे ( आश्रम० ३२ । ८ ) ।
  • ये स्वर्गमें जाकर विश्वेदेवोंमें मिल गये ( स्वर्ग० ५ । १५ ) ।

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