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द्रोण

  • (१) गङ्गाद्वारनिवासी महर्षि भरद्वाजके पुत्र, जो बृहस्पतिके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६७ । ६९ ) ।
  • एक दिन भरद्वाज मुनि गङ्गाजीमें स्नान करनेके लिये गये, वहाँ घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके वस्त्र बदल रही थी । उसका वस्त्र खिसक गया था । उस अवस्थामें उसे देखकर मुनिका वीर्य स्खलित हो गया । मुनिने उसे उठाकर एक द्रोण ( यज्ञ-कलश ) में रख दिया था । उस द्रोणसे उत्पन्न होनेके कारण ही उस बालकका नाम ‘द्रोण’ हुआ । इन्होंने सम्पूर्ण वेदों और वेदाङ्गोंका अध्ययन किया था ( आदि० १२९ । ३३—३८ ) ।
  • परशुरामजीसे इनका समस्त अस्त्र-शस्त्रविद्याका अध्ययन ( आदि० १२९ । ६६ ) ।
  • महर्षि अग्निवेशके आश्रममें इनका द्रुपदके साथ अध्ययन ( आदि० १३० । ४०—४२ ) ।
  • द्रुपदद्वारा इनको छात्रावस्थामें आश्वासन ( आदि० १३० । ४६ ) ।
  • शरद्वानकी पुत्री कृपीसे इनका विवाह ( आदि० १३० । ५० ) ।
  • कृपीके गर्भसे इनके द्वारा अश्वत्थामाका जन्म ( आदि० १३० । ५० ) ।
  • धनकी याचनाके लिये इनका द्रुपदके यहाँ जाना ( आदि० १३० । ६२ ) ।
  • द्रुपदद्वारा इनका तिरस्कार ( आदि० १३० । ६४—७३ ) ।
  • द्रुपदसे तिरस्कृत होकर इनका हस्तिनापुरमें आकर कृपाचार्यके घर गुप्तरूपसे बास करना ( आदि० १३० । ९५ ) ।
  • इनका कौरव कुमारोंकी वीटा ( गुल्ली ) एवं अपनी अँगूठीको कुएँमें निकालना ( आदि० १३० । ९९ ) ।
  • कौरवकुमारोंद्वारा भीष्मके प्रति इनके पराक्रमकी प्रशंसा ( आदि० १३० । ३६ ) ।
  • भीष्मद्वारा इनका सत्कार एवं कौरवराजकुमारोंको पढ़ानेके लिये इनसे अनुरोध ( आदि० १३० । ३९—७९ ) ।
  • इनका इनके प्रति अधिक वात्सल्य ( आदि० १३१ । ७—८ ) ।
  • इनके द्वारा कौरवों एवं पाण्डवोंकी शिक्षा ( आदि० १३१ । ९ ) ।
  • इनके समीप अध्ययनके लिये कर्णका आगमन ( आदि० १३१ । ११ ) ।
  • ये राजकुमारोंको तो कमण्डलु भर लानेको कहते और अश्वत्थामाको बड़ा भरके देते; वह जल्दी घड़ा भरकर आ जाता तो उसे अकेलेमें कोई अस्त्रसंचालनकी उत्तम विधि बताते थे ( आदि० १३१ । १६—१७ ) ।
  • अर्जुनको अद्वितीय धनुर्धर बनानेके लिये इनका आश्वासन ( आदि० १३१ । २७ ) ।
  • इनके द्वारा कौरवोंको विविध अस्त्रोंकी शिक्षा ( आदि० १३१ । २९ ) ।
  • इनकी अनुपम अस्त्र-विद्याको सुनकर सहस्रों राजाओं तथा राजकुमारोंका इनके समीप अध्ययनके लिये आगमन ( आदि० १३१ । ३० ) ।
  • इनका धनुर्वेदके अध्ययनके लिये आये हुए निषादपुत्र एकलव्यको पढ़ानेके लिये इनकार करना ( आदि० १३१ । ३२ ) ।
  • अर्जुनकी प्रसन्नताके लिये इनका एकलव्यसे अँगूठा काटकर गुरुदक्षिणा देनेके लिये कहना ( आदि० १३१ । ५६ ) ।
  • इनके द्वारा कौरव आदि समस्त छात्रोंकी परीक्षा ( आदि० १३१ । ६१ ) ।
  • ग्राहद्वारा इनका आक्रमण और अर्जुनद्वारा ग्राहको मारकर इनका संकटसे उद्धार । इससे संतुष्ट हुए आचार्य द्रोणका अर्जुनको ब्रह्मास्त्र अस्त्रका दान ( आदि० १३२ । १२—१८ ) ।
  • राजकुमारोंद्वारा अस्त्रकलाके प्रदर्शनके लिये इनकी प्रत्याशासे अनुमति-याचना ( आदि० १३३ । ३ ) ।
  • इनके द्वारा राजकुमारोंके अस्त्रकौशलप्रदर्शनके लिये विशाल प्रेक्षागृह ( रङ्ग-भवन ) का निर्माण ( आदि० १३३ । ४—५ ) ।
  • समस्त दर्शकोंके जुट जानेपर अपने पुत्रके साथ प्रेक्षागृहमें प्रवेश ( आदि० १३३ । १५—२० ) ।
  • द्रोणद्वारा देवपूजन और ब्राह्मणोंसे मङ्गल कार्य-सम्पादन ( आदि० १३३ । २१ ) ।
  • इन्हें दक्षिणारूपमें सुवर्ण, मणि, रत्न और नाना प्रकारके वस्त्रकी प्राप्ति ( आदि० १३३ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • राजकुमारोंद्वारा आचार्य द्रोणकी यथोचित पूजा ( आदि० १३३ । २३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इनकी आज्ञासे राजकुमारोंका अस्त्र-कौशल-प्रदर्शन ( आदि० १३३ । २३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • भीम और दुर्योधनके गदा-युद्धको रोकनेके लिये इनका अश्वत्थामाको आदेश ( आदि० १३४ । ४ ) ।
  • इनके द्वारा रङ्गभूमिमें अर्जुनकी प्रशंसा और उनकी ओर दर्शकोंकी दृष्टिको आकर्षित करना ( आदि० १३४ । ७ ) ।
  • आचार्यको प्रणाम करके इनकी आज्ञा ले कर्णद्वारा भी अस्त्र-कौशल-प्रदर्शन ( आदि० १३४ । १० ) ।
  • द्रुपदको बंदी बनाकर लानेके लिये इनका शिष्योंको आदेश देना और अर्जुनद्वारा बंदी बनाकर लाये हुए द्रुपदको उनका आधा राज्य देकर उन्हें छोड़ देना ( आदि० १३७ अध्याय ) ।
  • ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी परम्परा तथा उसके उपयोगका नियम बतलाकर इनका वह अस्त्र अर्जुनको देना और युद्धभूमिमें विरोधी होकर अपने साथ भी लड़नेके लिये उनसे वचन लेना ( आदि० १३८ । १—१४ ) ।
  • इनके जन्म, अध्ययन तथा द्रुपदद्वारा प्राप्त हुए तिरस्कारका एवं उसके प्रति ब्राह्मणगणद्वारा किये गये पापोंका वर्णन ( आदि० १६५ । १—१५ ) ।
  • धृष्टद्युम्नकी अस्त्रशिक्षा देनेकी इनकी उदारता ( आदि० १६५ । १५ ) ।
  • द्रौपदी तथा पाण्डवोंके लिये उपहार भेजने, धृतराष्ट्रिसहित उनको आदर-पूर्वक द्रुपदनगरसे बुलाने एवं उनका आधा राज्य उन्हें दे देनेके लिये इनका धृतराष्ट्रसे अनुरोध ( आदि० २०२ । १—१२ ) ।
  • कर्णको इनकी फटकार ( भीष्म० २८ । २६—२८ ) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूय-यज्ञमें आये थे ( सभा० ३४ । ८ ) ।
  • युधिष्ठिरका आचार्यके चरणोंमें प्रणाम करना और अपने यज्ञमें उनसे अनुग्रह करनेको कहना ( सभा० ३५ । १-२ ) ।
  • राजसूय-यज्ञमें 'कौन काम हुआ और कौन नहीं हुआ' इसकी देख-रेखका कार्य द्रोण और भीष्मको सौंपा गया था ( सभा० ३५ । ६ ) ।
  • युधिष्ठिर और शकुनिमें जुएका खेल आरम्भ होनेपर धृतराष्ट्रको आगे करके वहाँ द्रोणाचार्य भी आये थे ( सभा० ६० । २ ) ।
  • आचार्य द्रोण जुआ खेलना पसंद नहीं करते थे ( वन० ७१ । २ ) ।
  • इनमें चारों अङ्गोंसे पूर्ण धनुर्वेद विद्यमान था ( वन० ३० । ४ ) ।
  • पाण्डवोंकी खोजके विषयमें दुर्योधनको इनकी सम्मति ( विराट० २७ अध्याय ) ।
  • वृहन्नलाके वेषमें युद्धके लिये आते हुए अर्जुनके पराक्रमका इनके द्वारा वर्णन ( विराट० ३९ अध्याय ) ।
  • अर्जुनका शङ्खनाद सुनकर उन्हें अर्जुन ही समझकर कौरवोंसे अपशकुनोंका वर्णन ( विराट० ४६ । २४—३३ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाका प्रयत्न ( विराट० ५१ । १८—२१ ) ।
  • अर्जुनके साथ इनका युद्ध और घायल होकर पलायन ( विराट० ५८ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा भीष्मकी बातोंका अनुमोदन ( उद्योग० ७३ । ४४—४६ ) ।
  • श्रीकृष्णके कथनका समर्थन करते हुए दुर्योधनको समझाना ( उद्योग० १२५ । १०—१७ ) ।
  • दुर्योधनको पुनः समझाना ( उद्योग० १२६ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनको युद्ध न करनेके लिये समझाना ( उद्योग० अध्याय १२६ से १३९ तक ) ।
  • भीष्मद्वारा कहे गये कर्णके निन्दासूचक वाक्योंका इनके द्वारा समर्थन ( उद्योग० १६८ । ८—९ ) ।
  • दुर्योधनके पूछनेपर एक मासमें पाण्डव-सेनाके नाश करनेकी अपनी शक्तिका कथन ( उद्योग० १९३ । १८ ) ।
  • आचार्य द्रोणके रथ और घोड़ोंका वर्णन ( भीष्म० २० । ११ ) ।
  • युधिष्ठिरको युद्धकी आज्ञा देकर उनकी शुभकामना करना और उन्हें अपनी मृत्युका उपाय बतलाना ( भीष्म० ४३ । ५३—६६ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें धृष्टद्युम्नके साथ इनका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । २३—२४ ) ।
  • धृष्टद्युम्नके साथ युद्धमें इनका अद्भुत पराक्रम ( भीष्म० ५३ अध्याय ) ।
  • द्रुपदपर विजय और अद्भुत पराक्रम प्रकट करना ( भीष्म० ७७ । ६२—६७ ) ।
  • इनके द्वारा धृष्टद्युम्न की पराजय ( भीष्म० ७७ । ६९—७० ) ।
  • इनके द्वारा विराट-पुत्र शङ्खका वध और विराटकी पराजय ( भीष्म० ८३ । २३—२४ ) ।
  • भीष्मके गिरनेके बाद प्रमुख सेनापति पदपर इनका अभिषेक ( द्रोण० ८ । ५ ) ।
  • धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध ( द्रोण० ८ । ४८—५४ ) ।
  • इनका अद्भुत पराक्रम और मृत्युकी चर्चा ( द्रोण० ८ । ८८—९२ ) ।
  • युधिष्ठिरको जीवित पकड़ने-के लिये दुर्योधनको वर देना ( द्रोण० १२ । २०—२८ ) ।
  • इनका अद्भुत पराक्रम ( द्रोण० १३ । १९—२९; द्रोण० १४ । १—१९ ) ।
  • द्रुपदपर आक्रमण ( द्रोण० १५ । २६ ) ।
  • इनके द्वारा कुमारकी पराजय ( द्रोण० १६ । २५ ) ।
  • युगम्वरका वध ( द्रोण० १६ । ३१ ) ।
  • इनके द्वारा व्याघ्रदत्त और सिंहसेनका वध ( द्रोण० १६ । ३७ ) ।
  • अर्जुनके साथ युद्ध और अपनी सेनाको लौटा लेना ( द्रोण० १६ । ५०—५१ ) ।
  • दुर्योधनसे अर्जुनको युद्धस्थलसे दूर हटानेके लिये कहना ( द्रोण० १७ । ३—१० ) ।
  • इनके द्वारा वक्रका वध ( द्रोण० २१ । १६)
  • सत्यजित्का वध ( द्रोण० २१ । २१ )
  • शतानीकका वध ( द्रोण० २१ । २८ )
  • दृढसेनका वध ( द्रोण० २१ । ३२ )
  • क्षेमकका वध ( द्रोण० २१ । ३३ ) ।
  • वसुदानका वध ( द्रोण० २१ । ३५ ) ।
  • क्षत्रदेवका वध ( द्रोण० २१ । ५६ ) ।
  • पाण्डवसेनाको क्षुभित करके धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध ( द्रोण० २१ । ३८—३८ ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवसेनाका संहार ( द्रोण० २२ । ४१—४३ ) ।
  • दुर्योधनसे पाण्डवपक्षके किसी महारथीको मारनेकी प्रतिज्ञा ( द्रोण० २३ । १०—१५ ) ।
  • इनके द्वारा चक्रव्यूहका निर्माण ( द्रोण० २४ । १३—२५ ) ।
  • अभिमन्युके पराक्रमकी प्रशंसा करना ( द्रोण० ३१ । ११—१३ ) ।
  • कर्णके पूछनेपर अभिमन्युकी प्रशंसा करते हुए उसके वधका उपाय बतलाना ( द्रोण० ४८ । ११—३१ ) ।
  • इनके द्वारा अभिमन्युके तलवारका काटा जाना ( द्रोण० ४८ । ३७—३८ ) ।
  • अर्जुनके भयसे भीत जयद्रथको आश्वासन देना ( द्रोण० ७४ । २५—३३ ) ।
  • जयद्रथको आश्वासन देना ( द्रोण० ८७ । १५ ) ।
  • इनके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण करके जयद्रथकी रक्षाकी व्यवस्था ( द्रोण० ८७ । २२ ) ।
  • अर्जुनके साथ युद्ध ( द्रोण० ९१ । ११—२९ ) ।
  • दुर्योधनका उपालम्भ सुनकर उसे ही अर्जुनके साथ युद्ध करनेके लिये भेजना ( द्रोण० ९४ । १९—२६ ) ।
  • दिव्य कवचकी उत्पत्तिका प्रसंग बताकर दुर्योधनके शरीरमें कवच बाँधना ( द्रोण० ९४ । ३१—३८ ) ।
  • धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध ( द्रोण० अध्याय ९५ से ९७ तक ) ।
  • सात्यकिके साथ घोर संग्राम ( द्रोण० ९८ अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके साथ युद्ध और उन्हें पराजित करना ( द्रोण० १०६ । १८—४७ ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवसेनाका संहार और सात्यकिका घात ( द्रोण० ११० । १—३५ ) ।
  • सात्यकिके साथ युद्ध ( द्रोण० ११३ । २९—३३ ) ।
  • सात्यकिद्वारा इनकी पराजय ( द्रोण० ११० । ३० ) ।
  • सात्यकिसे पराजित होकर भागे हुए दुःशासनका फटकारना ( द्रोण० १२२ । १—२७ ) ।
  • इनके द्वारा वीरकेतुका वध ( द्रोण० १२२ । ४१ ) ।
  • चित्रकेतु, सुधन्वा, चित्रवर्मा और चित्ररथका वध ( द्रोण० १२२ । ४८—४९ ) ।
  • धृष्टद्युम्नके प्रहारसे मूर्च्छित होना ( द्रोण० १२२ । ५६ ) ।
  • धृष्टद्युम्नपर इनकी विजय ( द्रोण० १२२ । ७१—७२ ) ।
  • इनके द्वारा बृहत्क्षत्रका वध ( द्रोण० १२५ । २२ ) ।
  • पुत्रसहित धृष्टकेतुका वध ( द्रोण० १२५ । ३१—४१ ) ।
  • जरासंधकुमार सहदेवका वध ( द्रोण० १२५ । ४५ ) ।
  • धृष्टद्युम्नकुमार क्षत्रधर्माका वध ( द्रोण० १२५ । ५५ ) ।
  • चेकितानकी पराजय ( द्रोण० १२५ । ५६ ) ।
  • भीमसेनद्वारा इनकी पराजय ( द्रोण० १२७ । ५३—५४ ) ।
  • भीमसेनद्वारा आठ बार रथसहित इनका फेंका जाना ( द्रोण० १२८ । १८—२१ ) ।
  • दुर्योधनका उपालम्भ दिखाते हुए युद्धके लिये भेजना ( द्रोण० १३० । १३—२४ ) ।
  • दुर्योधनके उपालम्भ देनेपर उसे उत्तर देना ( द्रोण० १३१ अध्याय ) ।
  • पाण्डवसेनापर आक्रमण और उसका संहार ( द्रोण० १३४ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा केकयों, पुत्रों तथा सारथिसहित राजा शिविका तथा युधिष्ठिरके सभी पुत्रों तथा सारथिसहित राजा शिविका युद्धमें पराजित होना ( द्रोण० १३७ । १३—२६ ) ।
  • युधिष्ठिरके साथ युद्ध ( द्रोण० १३७ । २८—४३ ) ।
  • भीमसेनके साथ युद्ध ( द्रोण० १३९ । ४९ ) ।
  • अर्जुन और भीमसेनके साथ युद्धमें मूर्च्छित होना ( द्रोण० १४२ । ४९ ) ।
  • धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध ( द्रोण० १५० । २—११ ) ।
  • दुर्योधनको अर्जुनकी प्रशंसासे गर्वित उत्तर ( द्रोण० १८५ । १०—२० ) ।
  • दुर्योधनको व्यङ्ग्यपूर्ण उत्तर ( द्रोण० १८५ । २४—३७ ) ।
  • इनके द्वारा द्रुपदके तीन पौत्र, द्रुपद और विराटका वध ( द्रोण० १८६ । ३३—४३ ) ।
  • अर्जुनके साथ घोर युद्ध ( द्रोण० १८८ । २२ ) ।
  • अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर जीवनसे निराश होकर युद्ध ( द्रोण० १९१ अध्याय ) ।
  • अश्वत्थामाका योगधारणाद्वारा ब्रह्मलोकगमन ( द्रोण० १९१ । ४३—५३ ) ।
  • धृष्टद्युम्नद्वारा इनके सिरका काटा जाना ( द्रोण० १९२ । ६२—६३ ) ।
  • अश्वत्थामाके जन्मकालमें इनके द्वारा ब्राह्मणोंके लिये एक हजार गौओंका दान किये जानेकी चर्चा ( द्रोण० १९६ । २९—३० ) ।
  • महाराज युधिष्ठिरने इन्हें खड्गकी प्राप्तिका प्रसंग ( शान्ति० १६६ । ८१ ) ।
  • इनके लिये श्राद्धकर्मका सम्पादन ( शान्ति० १७१ । १२ ) ।
  • ये इन्द्रियसंयम और तपसे ही वेदोंके विद्वान् एवं समाजमें प्रतिष्ठित हुए । तपस्याके द्वारा ही ये अपनी प्रकृतिको प्राप्त हुए ( शान्ति० २९६ । १५—१६ ) ।
  • व्यासजीके कहनेपर परलोकवासी कौरव-पाण्डव वीरोंने साथ ये ब्रह्मलोकमें प्रविष्ट हुए और वहाँ कुछ कालके पश्चात् स्वर्गमें गये, बृहस्पतिके समीप वहाँ कुछ कालके पश्चात् बृहस्पतिके अंशमें मिल गये ( स्वर्ग० ४ । २१; स्वर्ग० ५ । १२ ) ।

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