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द्रौपदी

  • महाराज द्रुपदकी सती-साध्वी पुत्री कृष्णा, जो शची देवीके अंशसे उत्पन्न हुई थीं ( आदि० १६७ । १५७ ) ।
  • महर्षि याजद्वारा अग्निमें आहुति डालनेपर यज्ञकुण्डसे कुमार धृष्टद्युम्नके बाद इनका प्राकट्य हुआ । अतः ये धृष्टद्युम्नकी बहिन हुईं ( आदि० १६६ । ३९-४४ ) ।
  • इन्हें पाञ्चाली कहा जाता था । इन्हें पाण्डवोंनें पत्नीरूपमें प्राप्त किया तथा इनके गर्भसे उनके पाँच पुत्र हुए । युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक और सहदेवसे श्रुतकर्माका जन्म हुआ था ( आदि० १५१ । ७५ ) ।
  • इनके अनुपम सौन्दर्यका वर्णन ( आदि० १६६ । ४७-४७ ) ।
  • इनके जन्मके समयकी आकाशवाणी—इस कन्याका नाम कृष्णा है । यह समस्त युवतियोंमें श्रेष्ठ एवं सुन्दरी है । क्षत्रियोंका संहार करनेके लिये प्रकट हुई है । यह यथासमय देवताओंका कार्य सिद्ध करेगी । और इसके द्वारा देवताओंको महान् भय प्राप्त होगा ( आदि० १६६ । ४८-४९ ) ।
  • ब्राह्मणोंद्वारा इनका नामकरण ( आदि० १६६ । ५४ ) ।
  • व्यासजीका द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना—भगवान् शंकरद्वारा इन्हें पाँच पति प्राप्त होनेका वरदान ( आदि० १८४ अध्याय ) ।
  • इनके स्वयंवरमें विभिन्न देशोंसे आये हुए राजाओंका धृष्टद्युम्नद्वारा इनको परिचयप्रदान ( आदि० १८४ अध्याय ) ।
  • सूतजातिके पुरुषको अपना पति न बनानेके विषयमें इनकी घोषणा ( आदि० १६६ । २२ ) ।
  • इनका अर्जुनके गलेमें जयमाला डालना ( आदि० १६७ । २५ के बाद दा० पाठ ) ।
  • अर्जुन और भीमसेनके साथ इनका कुम्भकारके घरमें जाना ( आदि० १६७ । ४५-४७ ) ।
  • घर जाकर पाण्डवोंका मातासे द्रौपदीको भिक्षा बताना और माताका बिना देखे ही उसे पाँचोंको उपयोगमें लानेकी आज्ञा देना ( आदि० १६७ । १-२ ) ।
  • कुम्भकारके घर जानेपर इनके सम्बन्धमें द्रुपदके उहापोह और चिन्ता ( आदि० १९१ । १४-१८ ) ।
  • व्यासद्वारा द्रुपदको इनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना और इन्हें स्वर्गलोककी लक्ष्मी बताना ( आदि० १९६ अध्याय ) ।
  • धौम्य मुनिद्वारा क्रमशः प्रत्येक पाण्डवके साथ विधिपूर्वक इनके विवाहसंस्कारका सम्पादन ( आदि० १९७ अध्याय ) ।
  • कुन्तीद्वारा इनको आशीर्वाद तथा शिक्षा ( आदि० १९८ । ४-१२ ) ।
  • हस्तिनापुर जाते समय इनको द्रुपदद्वारा दहेज रूपमें विपुलधनराशिकी भेंट ( आदि० २०६ । १ के बाद दा० पाठ ) ।
  • पुत्रवधुओंद्वारा इनका स्वागत ( आदि० २०६ । २२ के बाद दा० पाठ ) ।
  • सुभद्राके आनेपर इनका अर्जुनके प्रति प्रणयकोप ( आदि० २२० । १६-१७ ) ।
  • इनके समीप सुभद्राका गोपीवेषमें आगमन ( आदि० २२० । १९ ) ।
  • दुःशासनद्वारा बलपूर्वक केश पकड़कर इनका सभामें लाया जाना ( सभा० ६० । ३१ ) ।
  • भरी सभामें अपने हारे जानेके सम्बन्धमें इनका समस्त सभासदोंसे प्रश्न ( सभा० ६१ । ४१-४२ ) ।
  • दुःशासनद्वारा वस्त्र खींचे जानेपर इनका आर्तभावसे भगवान्‌को पुकारना ( सभा० ६८ । ४३-४३ ) ।
  • इनकी लाज बचानेके लिये भगवान् श्रीकृष्णका स्वयं चीररूप होना और नये-नये चीर प्रकट करना ( सभा० ६८ । ४५-४८ ) ।
  • कौरवोंकी सभामें इनका चेतावनीयुक विलाप ( सभा० ६९ अध्याय ) ।
  • इनको धृतराष्ट्रसे वरप्राप्ति ( सभा० ७१ । २८-३२ ) ।
  • इनका कुन्तीसे वनगमनके लिये विदा लेना ( सभा० ७९ । १-२ ) ।
  • किर्मीराकी मायासे भयभीत होकर मूर्च्छित होना ( वन० ११ । १६-१८ ) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन तथा उनसे अपने प्रति किये गये अपमान और दुःखका वर्णन ( वन० १२ । ५०-१२० ) ।
  • युधिष्ठिरका क्रोध उभारनेके लिये इनके संतापपूर्ण वचन ( वन० २७ अध्याय ) ।
  • प्रह्लादबलिसंवादका वर्णन करके इनका युधिष्ठिरके क्रोधको उभारना एवं जोर देना ( वन० २२ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरकी बुद्धि एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप ( वन० २७ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरको पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना ( वन० २२ अध्याय ) ।
  • तपके लिये जाते हुए अर्जुनके प्रति इनकी शुभाशंसा ( वन० २७ । २४-२५ ) ।
  • इनकी अर्जुनके लिये चिन्ता ( वन० ८० । १३-१५ ) ।
  • गन्धमादनकी यात्रा में इनका मूर्च्छित होना ( वन० १४४ । ४ ) ।
  • इनके भीमसेनसे सौगन्धिक पुष्पोंकी माँग ( वन० १४६ । ७ ) ।
  • जटासुरद्वारा इनका हरण और भीमसेनका उसे मारकर इनकी तथा भाइयोंकी रक्षा करना ( वन० १५७ अध्याय ) ।
  • इनका आर्षिषेणके आश्रममें भीमसेनसे उस पर्वतपर रहनेवाले राक्षसोंको मारनेका

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