← अनुक्रमणिका

अनुरोध

  • ( वन० १६० । १२-२४ ) ।
  • सत्यभामासे पतिको अनुकूल बनाये रखनेका उपाय बताना ( वन० २३३ । १० से २३४ अध्यायतक ) ।
  • दुर्वासाके आतिथ्यके लिये चिन्तित होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करना ( वन० २६३ । ८-१६ ) ।
  • द्रौपदीपर संकट जानकर भक्तवत्सल भगवान्‌का आना और द्रौपदीका उनसे दुर्वासाके आगमन आदिका वृत्तान्त निवेदन करना ( वन० २६३ । १७-१९ ) ।
  • श्रीकृष्णका अपनेको भूखा बताकर द्रौपदीसे भोजन माँगना तथा द्रौपदीका लज्जित होकर यह बताना कि खानेके लिये कुछ नहीं बचा है ( वन० २६३ । २०-२१ ) ।
  • जयद्रथद्वारा भेजे हुए कोटिकास्यको उत्तर देना ( वन० २६६ अध्याय ) ।
  • जयद्रथको फटकारना ( वन० २६७ । १९; २६८ । ८-९ ) ।
  • जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन ( वन० २७० अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर विराट-नगरमें स्वयं सैरन्ध्रीरूपमें रहनेकी बात बताना ( विराट० २ । १८ ) ।
  • सैरन्ध्रीवेषमें इनका विराटपत्नी सुदेष्णासे अनुरोध ( महलोंमें रखनेका अनुरोध ( विराट० ५ । ८ ) ।
  • कीचकको धर्मकी बातें कहकर समझाना ( विराट० १४ । ३४-३७ ) ।
  • कीचकको फटकारना ( विराट० १४ । ३७-५२ ) ।
  • कीचकके घर सुदेष्णा-के भेजनेसे सुरा लानेके लिये जाना ( विराट० १५ । १० ) ।
  • कीचकके भरी सभामें लात मारनेपर इनका राजा विराटको उलाहना देना और फटकारना ( विराट० १६ । १०-१२ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८२० के बाद दा० पाठ ) ।
  • सुदेष्णाके पूछनेपर रोनेका कारण बताना ( विराट० १६ । ४१ ) ।
  • रातमें भीमसेनके पास जाना ( विराट० १७ । ७-८ ) ।
  • भीमसेनसे अपना दुःख बताना और कीचकको मार डालनेके लिये आग्रह करना ( विराट० १८ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंके दुःखसे दुखी होकर भीमसेनके सम्मुख विलाप करना ( विराट० १९ अध्याय ) ।
  • भीमसेनसे अपना दुःख निवेदन करना ( विराट० २० अध्याय ) ।
  • कीचकद्वारा अपनेपर बीती हुई घटनाका भीमसेनसे वर्णन करना और कीचकके वध-के लिये आग्रह करना ( विराट० २१ । १८-४८ ) ।
  • कीचकको नृत्यशालामें मिलनेके लिये संकेत देना ( विराट० २२ । १६-१७ ) ।
  • उपकीचकद्वारा श्मशानमें ले जाये
  • जाते समय पतियोंको पुकारना ( विराट० २३ । १२-१४ ) ।
  • वृहन्नलारूपधारी अर्जुनसे मिलना ( विराट० २४ । २१ ) ।
  • महलसे निकल जानेके लिये कहनेपर तेरह दिन और रहनेके लिये रानी सुदेष्णासे प्रार्थना करना ( विराट० २४ । २९ ) ।
  • उत्तरसे वृहन्नला-रूपधारी अर्जुनको सारथि बनानेका प्रस्ताव करना ( विराट० २६ । १६-१९ ) ।
  • शान्तिदूत बनकर जानेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णसे केशकर्षणकी याद दिलाते हुए अपना दुःख सुनाना और युद्धकी ही सम्मति देना ( उद्योग० ८२ । ४-४१ ) ।
  • विलाप करती हुई सुभद्रा और उत्तराके पास आना तथा शोकसे मूर्च्छित होना ( द्रोण० ७८ । ३६-३७ ) ।
  • पुत्रोंके वधका समाचार सुनकर विलाप करना और अश्वत्थामाके वधके लिये प्रेरित करना ( सौप्तिक० ११ । १०-१५ ) ।
  • भीमसेनको अश्वत्थामाके वधके लिये प्रेरित करना ( सौप्तिक० ११ । २२-२७ ) ।
  • भीमसेनके वचनोंसे शान्त होकर युधिष्ठिरको अश्वत्थामाकी मणि धारण करने को देना ( सौप्तिक० १६ । २४ ) ।
  • कुन्तीके पास पहुँचकर विलाप करना ( स्त्री० १५ । ३७-३८ ) ।
  • राजदण्ड धारण करनेके लिये युधिष्ठिरको समझाना ( शान्ति० १४ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंके नगरमें प्रवेश करते समय हस्तिना-पुरकी स्त्रियोंद्वारा पाञ्चालीके पतिसेवन, अमोघ पुण्य-कर्म तथा सकल व्रतचर्याकी प्रशंसा ( शान्ति० २८ । ५-६ ) ।
  • सुभद्रा और बलदेवके साथ हस्तिनापुरमें पधारे हुए श्रीकृष्णका द्रौपदी आदिसे मिलना ( आश्रम० ६७ । ४-५ ) ।
  • श्रीकृष्णके सूतिकागृहमें प्रवेश करते समय द्रौपदीका उसके पास जाकर उसे सूचित करना कि तुम्हारे श्वशुर भगवान् मधुसूदन पधार रहे हैं ( आश्रम० ६८ । १ ) ।
  • श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी पिंडलियाँ मोटी बतायी जानेके कारण द्रौपदीने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा और श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया ( आश्रम० ८८ । ४ ) ।
  • चित्राङ्गदा और उलूपीका द्रौपदीके चरण छूना और द्रौपदीका अपनी ओरसे उन्हें नाना प्रकारके उपहार देना ( आश्रम० ८८ । २-४ ) ।
  • श्रीकृष्णका द्रौपदी आदिसे मिलकर द्वारका जानेके लिये रथपर आरूढ़ होना ( आश्रम० ९२ । वैष्णवधर्म, पृष्ठ ६३८ ) ।
  • कुन्ती, गान्धारी, धृतराष्ट्र, गान्धारी और द्रौपदी आदिसे मिलना ( आश्रम० ९५ । १०-११ ) ।
  • कुन्तीका श्रीकृष्णसे द्रौपदीका सदा प्रिय करते रहनेके लिये आदेश देना ( आश्रम० ९६ । १५ ) ।
  • रोती हुई सुभद्रासहित द्रौपदीका अपनी सासके पीछे-पीछे अन्त:पुरको सभी स्त्रियोंको कुन्ती एवं गान्धारीके दर्शनकी इच्छा प्रकट करना और द्रौपदी आदिका परिचय बताना ( आश्रम० २४ । १६ । ३० ) ।
  • द्रौपदीका युधिष्ठिरसे अपनी सासके दर्शनकी इच्छा प्रकट करना और अन्त:पुरका सभी स्त्रियोंको कुन्ती एवं गान्धारीके दर्शनके लिये उत्सुक बताना ( आश्रम० २२ । १४-२२ ) ।
  • द्रौपदी आदिका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रको प्रणाम करना ( आश्रम० २४ । १९ ) ।
  • संजयका धृतराष्ट्रसे द्रौपदीका परिचय देते समय इन्हें मूर्तिमती लक्ष्मी बताना ( आश्रम० २५ । १ ) ।
  • द्रौपदीका अपने पतियोंके साथ महाप्रस्थानके पथपर अग्रसर होना ( महाप्रस्था० १ । १९-२० ) ।
  • मार्गमें द्रौपदीका गिरना और भीमसेनके पूछनेपर युधिष्ठिरका इनके पतनका कारण बताना ( महाप्रस्था० ६ । ३-६ ) ।
  • स्वर्गलोकमें युधिष्ठिरका दिव्यकान्तिसे सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित होती हुई द्रौपदीका दर्शन करना और इन्द्रका स्वर्गलोककी लक्ष्मी बताकर इनका और इनके पुत्रोंका परिचय देना ( स्वर्गारो० १ । १०-१४ ) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in