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द्वारका ( द्वारवती या द्वारावती )

  • रैवतक पर्वतसे सुशोभित रमणीय कुरास्थली, जहाँ जरासंधसे वैर हो जानेपर समस्त यादव श्रीकृष्णकी सम्मतिसे एकत्र होकर रहने लगे । कुरास्थली दुर्गकी ऐसी मरम्मत करायी गयी थी कि वह देवताओंके लिये भी दुर्गम हो गया था । उस दुर्गमें रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती थीं । फिर वृष्णिकुलके महारथियोंका तो बात ही क्या । रैवतककी दुर्गमताका विचार करके यदुवंशी वहाँ निर्भय एवं प्रसन्न रहते थे । रैवतक या गोमान दुर्गकी लम्बाई तीन योजनकी है । वहाँ एक-एक योजनपर सेनाओंकी तीन-तीन दलोंकी छावनी थी । प्रत्येक योजनके अन्तमें सौ-सौ द्वार थे, जो सेनाओंद्वारा सुरक्षित थे । नारदोंका पराक्रम ही उस गढ़का प्रधान फाटक था । कम-से-कम अठारह रण-दुर्मद क्षत्रिय वीर इस दुर्गकी सुरक्षामें सदा संलग्न रहते थे ( सभा० १४ । ५०-५५ ) ।
  • द्वारका पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका प्रधान निवास स्थान था । वह अमरावतीपुरीसे भी अधिक रमणीय थी । वहाँ वृष्णि-अन्धक-यदुके बैठनेके लिये एक सुन्दर सभा थी, जो दाशार्हके नामसे प्रसिद्ध थी । उसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजन थी । उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि सभी क्षत्रिय और अन्धक वंशके लोग बैठते और सम्पूर्ण लोक-जीवनको रक्षाके साधन रचते थे ( सभा० ३८ । पृष्ठ ८०६ ) ।
  • द्वारकाके रमणीय राजसदन सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा मरु पर्वतके शिखरोंकी भाँति गगनचुम्बी थे । उन भवनोंसे विभूषित द्वारकापुरीकी रचना साक्षात् विश्वकर्माने की थी । इसके चारों ओर बनी हुई चौड़ी खाई इसकी शोभा बढ़ाती थी । वह पुरी ऊँचा श्वेत चहारदीवारसे घिरी थी । वहाँ नन्दनवन, मिश्रकवन, चैत्ररथवन और वैभ्राज नामक वन शोभा देते थे । रमणीय द्वारकापुरीका पूर्वादेशमें उत्तुङ्ग शिखरवाला रैवतकपर्वत उस पुरीका आभूषणरूप जान पड़ता था । दक्षिणमें लतावेष्ट, पश्चिममें सुकक्ष और उत्तरमें रेणुमन्त नामक पर्वत इसकी शोभा बढ़ाते थे । इन पर्वतोंके चारों ओर अनेकानेक मनोहर वन-उपवन वहाँकी श्रीवृद्धि करते थे । पुरीकी पूर्वदिशा में एक रमणीय पुष्करिणी थी, जिसका विस्तार सौ धनुष था । महापुरी द्वारका पचास पचाच द्वारोंसे सुशोभित थी । सुन्दर-सुन्दर महल और अट्टालिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं । तीक्ष्ण यन्त्र, शतघ्नी ( तोप ), विभिन्न यन्त्रोंके समुदाय और लोहेके बने हुए बड़े-बड़े चक्र उस पुरीकी रक्षाके लिये लगाये गये थे । पुरीका विस्तार छानवे योजन था । उसमें जानेके लिये आठ बड़ी-बड़ी सड़कें थीं और सोलह बड़े-बड़े चौराहे शोभा पा रहे थे । शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार उस नगरीका निर्माण किया गया था ( सभा० ३८ । पृष्ठ ८१२ से ८१७ तक )।
  • तीर्थयात्राके अवसरपर यहाँ अर्जुन पधारे थे और उनके स्वागत-का बहुत ही सुन्दर आयोजन किया गया था । यहीं-से उन्होंने सुभद्राका अपहरण किया था ( आदि० अध्याय २१७ से २१९ तक )।
  • द्वारकापुरीपर शाल्वका आक्रमण और वृष्णिवंशी वीरों द्वारा भगवान् श्रीकृष्णद्वारा शाल्वराजका संहार करके इस पुरीकी रक्षा ( वन० अध्याय १४ से २२ तक )।
  • ( पुराणान्तरोंके वर्णनके अनुसार मोक्षदायिनी सात पुरियोंमेंसे एक यह भी है । विभिन्न पुराणोंमें इसकी महिमाका विस्तार-पूर्वक वर्णन किया गया है )।
  • द्वारका और वहाँका पिण्डारक क्षेत्र परम पावन तीर्थ है। इन तीर्थोकी यात्रा करने वालोंको नियमसे रहना और नियमित भोजन करना चाहिये। यहाँके पिण्डारक-तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको अधिकाधिक सुवर्णकी प्राप्ति होती है (वन० ८२। ६५)।
  • यही राजा नृगका निर्वेष्ट्यकी योनिसे उद्धार हुआ था ( अनु० ७० । ७ ) ।
  • यहीं यदुवंशके विनाशके लिये साम्बके पेटसे मूसल पैदा होनेका शाप ऋषियोंद्वारा प्राप्त हुआ था ( मौसल० १ । १९-२१ )।
  • श्रीकृष्णके परमधाम पधारनेपर द्वारकावासी स्त्री-पुरुषोंने द्वारा इस पुरीके खाली कर दिये जानेपर समुद्रने इसे डुबो दिया (मौसल० ७।४१ - ४२)।

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