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धनुर्वेद

  • वह शास्त्र, जिसमें धनुष आदि अस्त्र-शस्त्रोंका निरूपण हो, चार पादोंसे युक्त अस्त्र-शस्त्र-विद्या । भारतवर्षमें इस विद्याके बड़े-बड़े ग्रन्थ थे, जिन्हें क्षत्रियकुमार अभ्यासपूर्वक पढ़ते थे । मधुसूदन सरस्वतीने अपने प्रस्थानभेद नामक ग्रन्थमें धनुर्वेदको यजुर्वेदका उपवेद लिखा है । आजकल इस विद्याका वर्णन कुछ ग्रन्थोंमें थोड़ा बहुत मिलता है । जैसे—शुक्रनीति, कामन्दकी नीति, अग्निपुराण, वीर-चिन्तामणि, वृद्धशार्ङ्गधर, युद्ध जयार्णव, युक्ति-कल्पतरु, नीतिभूषण इत्यादि । 'धनुर्वेद संहिता' नामक एक अलग पुस्तक भी मिलती है, परंतु उसकी प्राचीनता और प्रामाणिकतामें संदेह है । अग्निपुराणमें ब्रह्मा और महेश्वर इस वेदके आदि प्रकटकर्ता कहे गये हैं । परंतु मधुसूदन सरस्वती लिखते हैं कि 'विश्वामित्रने जिस धनुर्वेदका प्रकाश किया था, यजुर्वेदका उपवेद वही है ।' उन्होंने अपने प्रस्थानभेदमें विश्वामित्रकृत इस उपवेदका कुछ संक्षिप्त ब्यौरा भी दिया है । धनुर्वेदमें चार पाद हैं— दीक्षापाद, संग्रहपाद, सिद्धिपाद और प्रयोगपाद । प्रथम दीक्षापादमें धनुर्लक्षण ( धनुषके अन्तर्गत सब हथियार लिये गये हैं ) और अधिकारियोंका निरूपण है । धनुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं— मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा यन्त्रमुक्त । छोड़े जानेवाले बाण आदिको ‘मुक्त’ कहते हैं । जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय उन खड्ग आदिको ‘अमुक्त’ कहते हैं । जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो; वह अस्त्र ‘मुक्तामुक्त’ कहलाता है । अथवा जिसे छोड़नेके बाद फिर ले लिया जाय वह भाला, बरछा आदि मुक्तामुक्त है, जो किसी यन्त्रके सहारे छोड़ा जाय जैसे तोपसे गोला वह अस्त्र ‘यन्त्रमुक्त’ कहा गया है । अधिकारियोंका लक्षण कहकर फिर दीक्षा, अभिषेक, शकुन आदिका वर्णन है । संग्रहपादमें आचार्यका लक्षण तथा अस्त्रशस्त्रादिके व्युत्पन्नका संग्रह है । तृतीय पादमें गदादिप्रद विशेष विशेष शस्त्रोंके अभ्यास; मन्त्र, देवता और सिद्धि आदि विषय हैं । प्रयोग नामक चतुर्थ पादमें देवाचर्वन, सिद्धि, अस्त्र-शस्त्रादिके प्रयोगोंका निरूपण है ।
  • शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यक्ष और परोक्षास्त्र—ये भी धनुर्वेदके चार भेद हैं । इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार—इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं । वैशम्पायनके अनुसार शार्ङ्गधनुषमें तीन जगह झुकाव होता है; पर वैष्णव अर्थात् वाँसके धनुषका झुकाव बराबर क्रमसे होता है । शार्ङ्गधनुष साढ़े छः हाथका होता है और अश्वारोहियों तथा गजारोहियोंके कामका होता है । रथी और पैदलके लिये बाँसका ही धनुष ठीक है । अग्निपुराणके अनुसार चार हाथका धनुष उत्तम, साढ़े तीन हाथका मध्यम और तीन हाथका अधम माना गया है । जिन धनुषके बाँसमें नौ गाँठें हों; उसे ‘कोदण्ड’ कहना चाहिये । प्राचीनकालमें दो डोरियोंकी गुलेल भी होती थी, जिसे ‘उपलक्षेपक’ कहते थे । डोरी पाँटकी और कनिष्ठा अँगुलीसे अधिक मोटी नहीं चाहिये । तीन छीलकर भी डोरी बनायी जाती है । हिरन या भैंसेकी ताँतकी डोरी भी बहुत मजबूत बन सकती है । ( वृद्धाङ्गधर )
  • बाण दो हाथसे अधिक लंबा और छोटा, मोटा न होना चाहिये । शर तीन प्रकारके होते हैं । जिसका अगला भाग मोटा हो; वह पुरुषजातीय और जो सर्वत्र बराबर हो; वह नपुंसकजातीय कहलाता है । स्त्री जातीय शर बहुत दूरतक जाता है, पुरुषजातीय भिदता खूब है और नपुंसकजातीय निशाना साधनेके लिये अच्छा होता है । बाणके फल अनेक प्रकारके
  • के अग्रभागमें धुरय, गोपुच्छ, अर्धचन्द्र, मृगमुख, भल्ल, वत्सदन्त, द्विभल्ल, कार्णिक, काकतण्ड इत्यादि । तीरमें गति सीधी रखनेके लिये पीछे पंखोंका लगाना भी आवश्यक बताया गया है । जो बाण मारा लोहेका होता है, उसे ‘नाराच’ कहते हैं ।
  • उक्त ग्रन्थमें लक्ष्यभेद, शराकर्षण आदिके सम्बन्धमें बहुत-से नियम बताये गये हैं । रामायण, महाभारत आदिमें शब्दभेदी बाण मारनेतकका उल्लेख है । अन्तिम हिन्दूसम्राट् महाराज पृथ्वीराजके ग्रन्थमें भी प्रसिद्ध है कि वे शब्दभेदी बाण मारते थे । [ --हिन्दी-शब्दसागरसे ]
  • शरदान् धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् और शिक्षक थे । इनसे कृपाचार्यने धनुर्वेद पढ़ा और अपने शिष्योंको पढ़ाया ( आदि० १२९ । ३-५, २१, २२, २३ ) ।
  • द्रोणाचार्यने यह विज्ञान परशुरामसे प्राप्त किया और कौरव-पाण्डवोंको इसकी शिक्षा दी ( आदि० १२९ । ६६; आदि० १३१ । ९ ) ।
  • अग्निर्वेश धनुर्वेदमें अगस्त्यके शिष्य थे ( आदि० १३८ । ९ ) ।
  • इसे युधिष्ठिरने कौरवदलके भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा एवं कर्णमें ही पूर्णतः प्रतिष्ठित बताया था ( वन० ३० । ४ ) ।
  • धनुर्वेदके दस अङ्ग और चार चरण हैं । ( शल्य० ६ । १४ की टिप्पणी; ४५ । २२ ) ।
  • चारों पादोंमें युक्त धनुर्वेद मूर्तिमान् होकर भगवान् स्कन्दकी सेवामें उपस्थित हुआ था ( शल्य० ४४ । २२ ) ।

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