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धर्मधर्मा

  • स्कन्दकी अनुचरी मातृका ( शल्य० ४६ । २० ) ।
  • (२) धर्मद्वारा भूमिकी रक्षा करना ( आदि० ६६ । १९ ) ।
  • (३) युधिष्ठिरका सम्बन्धी और सहायक राजा ( द्रोण० १८५ । ३१ ) ।
  • (४) सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले एक देवता, जो ब्रह्माजीके दाहिने स्तनसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६६ । ३१ ) ।
  • ये भगवान् सूर्यके भी पुत्र कहे गये हैं ( आदि० ६६ । ३२ ) ।
  • दक्ष-प्रजापतिकी कीर्ति आदि दस पुत्रियाँ इनकी पत्नी थीं ( आदि० ६६ । १३-१५ ) ।
  • आठों वसु इनके पुत्र थे ( आदि० ६६ । १७ ) ।
  • इनके तीन श्रेष्ठ पुत्र हैं—राम, काम और हर्ष ( आदि० ६६ । २२ ) ।
  • शून्योनिमें जन्म लेनेके लिये इनको अणीमाण्डव्यका शाप ( आदि० ११ । १५-१६ ) ।
  • इनके अंश विदुर और युधिष्ठिर थे ( आदि० १० । ८६, ११७ ) ।
  • इनके द्वारा कुन्तीके गर्भसे युधिष्ठिरका जन्म ( आदि० १२२ । ७ ) ।
  • जब द्रौपदीका वस्त्र खींचा जा रहा था, उस समय धर्मस्वरूप श्रीकृष्णने अव्यक्त रूपसे उसके वस्त्रमें प्रवेश करके भाँति-भाँतिके सुन्दर वस्त्रोंद्वारा द्रौपदीको आच्छादित कर लिया ( सभा० ६८ । ४६ ) ।
  • धर्मतीर्थमें इन्होंने तपस्या की थी ( वन० ८४ । १ ) ।
  • वैतरणीके तटपर इन्होंने यज्ञ किया था ( वन० ११४ । ४ ) ।
  • इनका मृगरूपसे ब्राह्मणका अरणि-काष्ठ लेकर भागना ( वन० ३११ । १ ) ।
  • यक्ष-रूपसे नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीमसेनको मूर्च्छित करना ( वन० ३१२ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरके साथ प्रश्नोत्तर ( वन० ३१३ । ४५-१३२ ) ।
  • युधिष्ठिरके उत्तरसे प्रसन्न होकर इनके द्वारा चारों पाण्डवोंको जीवनदान ( वन० ३१३ । १३३ ) ।
  • धर्मके पास पहुँचनेके द्वार—अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर ( वन० ३१४ । ८ ) ।
  • युधिष्ठिरको इनका वरदान देना ( वन० ३१४ । २५ ) ।
  • वसिष्ठका रूप धारण करके विश्वामित्रकी परीक्षा लेना ( उद्योग० १०६ । १८-२१ ) ।
  • ब्रह्माजीकी आज्ञासे धर्मने दैत्यों और दानवोंको अपने पाशमें बाँधकर वरुणके अधिकारमें दे दिया ( उद्योग० १२८ । ४५ ) ।
  • भगवान् नारायणने धर्मके पुत्ररूपसे अवतार लिया था ( द्रोण० २०१ । ५७ ) ।
  • इन्होंने अपनी पत्नी श्री के गर्भसे नाम नामक पुत्र उत्पन्न किया ( शान्ति० १२ । १३२-१३३ ) ।
  • ये तनु नामक मुनिके रूपमें उत्पन्न हुए थे ( शान्ति० १२८ । २२-२३ ) ।
  • जापक ब्राह्मणके साथ इनका संवाद ( शान्ति० १९१ । २०-२८ ) ।
  • ब्राह्मणरूपसे सत्य नामक ब्राह्मणकी परीक्षा ली ( शान्ति० २७२ । १७ ) ।
  • ब्राह्मणरूप धारण करके सददर्शनकी परीक्षा ली ( अनु० २ । १९ ) ।
  • मैत्रेयके रूपमें सत्यवादी धर्मने पृथ्वीकी रक्षा करना ( अनु० १२ अध्याय दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १२६ । २४-२८ ) ।
  • ब्राह्मणरूपमें राजा जनकसे इनका संवाद और अन्तमें प्रसन्न होकर इनका अपना परिचय देना तथा राजाकी प्रशंसा करना ( आश्व० ३२ अध्याय ) ।
  • ब्राह्मणरूप धारण करके इन्होंने ब्राह्मणदारिकी परीक्षा ली ( आश्व० १० अध्याय ) ।
  • क्रोधरूपमें जमदग्निकी परीक्षा ली ( आश्व० ११ । ४२-५२ ) ।
  • माण्डव्यके शापसे धर्म ही विदुर हुए थे ( आश्व० २८ । १२ ) ।
  • धर्म, विदुर और युधिष्ठिरका एकत्व ( आश्व० २८ । २१ ) ।
  • पाण्डवोंके महाप्रस्थानके समय कुत्तेका रूप धारण करके उनके पीछे गये ( महाप्रस्था० ३ । १७ ) ।
  • विदुर और युधिष्ठिर मृत्युके पश्चात् धर्ममें ही विलीन हुए थे ( स्वर्गा० ५ । २२ ) ।

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