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धृतराष्ट्र

  • (१) राजा विचित्रवीर्यके क्षेत्रज पुत्र, विचित्रवीर्यकी पत्नी अम्बिकाके गर्भसे व्यासद्वारा उत्पन्न, ये जन्मसे अन्धे थे ( आदि० १०५ । १३ ) ।
  • भीष्मद्वारा इनका पालन एवं इनके उपनयनादि संस्कारोंका सम्पादन ( आदि० १०८ । १७-१८ ) ।
  • इनकी शारीरिक शक्ति एवं शिक्षा ( आदि० १०८ । १९-२१ ) ।
  • जन्मान्ध होनेके कारण इनका राज्य-प्राप्तिसे वञ्चित होना ( आदि० १०८ । २५ ) ।
  • गान्धारीके साथ विवाह ( आदि० १०९ । १६ ) ।
  • इनके द्वारा सौ अश्वमेध यज्ञका सम्पादन तथा प्रति-यज्ञमें लाख-लाख स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणाका दान ( आदि० ११३ । ५ ) ।
  • इनके द्वारा गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्र होनेका वृत्तान्त ( आदि० ११४ । १२-२५ ) ।
  • दुर्योधनके जन्मकालिक अमङ्गलसूचक लक्षणों या अपशकुनोंको देखकर उसे त्याग देनेके लिये इनको विदुरकी सलाह ( आदि० ११४ । ३४-३९ ) ।
  • इनके द्वारा वैश्य-जातीय स्त्रीके गर्भसे युयुत्सुका जन्म ( आदि० ११४ । ४३ ) ।
  • इनकी पुत्री दुःशलाके जन्मकी कथा ( आदि० ११५ अध्याय ) ।
  • इन्होंने अपने सभी पुत्रोंका विवाह-संस्कार कराया ( आदि० ११५ । १७ ) ।
  • अपनी पुत्री दुःशलाका विवाह सिन्धुराज जयद्रथके साथ किया ( आदि० ११६ । १८ ) ।
  • पाण्डुके शापग्रस्त होकर वानप्रस्थ लेनेपर इनका शोक ( आदि० ११६ । ४५ ) ।
  • इनके द्वारा राजोचित ढंगसे पाण्डु तथा माद्रीके अन्त्येष्टि-संस्कार करानेके लिये विदुरको आदेश ( आदि० १२६ । १-२ ) ।
  • युधिष्ठिरका युवराज-पदपर अभिषेक ( आदि० १३८ । १-२ ) ।
  • पाण्डवोंकी उन्नति देख-कर इनकी चिन्ता और इनके प्रति कणिकद्वारा कूटनीति-का उपदेश ( आदि० १३९ । १-२ ) ।
  • पाण्डवोंको वारणावत जानेके लिये इनका आदेश ( आदि० १४२ । १० ) ।
  • वारणावतनिवासियोंको पाण्डवों एवं पुरोचनके जलनेका संदेश देना ( आदि० १४५ । १९ ) ।
  • पाण्डवोंके लिये इनका मिथ्या विलाप ( आदि० १४७ । १० ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवोंको जलाञ्जलि-दान ( आदि० १४५ । १५ ) ।
  • पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा ( आदि० १४९ । २२ के बादसे २५ तक ) ।
  • इनका पाण्डवोंके विषयमें दुर्योधनसे वार्तालाप ( आदि० २०० । १-२० ) ।
  • दुर्योधनसे बुलाकर पाण्डवोंको आधा राज्य देनेके लिये इनसे भीष्मका आग्रह ( आदि० २०२ अध्याय ) ।
  • द्रौपदी एवं पाण्डवोंके लिये उपहार भेजने, उनको आदरपूर्वक द्रुपदनगरसे बुलाने एवं पाण्डवोंका
  • आधा राज्य दे देनेके लिये द्रोणाचार्यका अनुरोध ( आदि० २०३ । १-१२ ) ।
  • पाण्डवोंका पराक्रम बतला कर उन्हें दुर्योधनसे बुलाने एवं उनका आधा राज्य दे देनेके लिये इनसे विदुरकी सलाह ( आदि० २०४ । १५-३० ) ।
  • पाण्डवोंको उनकी माता तथा द्रौपदीके साथ ले आनेके लिये इनका विदुरको आदेश ( आदि० २०५ । ४ ) ।
  • द्रुपदनगरसे आते हुए पाण्डवोंकी अगवानीके लिये इनका कौरवोंको आदेश ( आदि० २०६ । १२ ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरका आधे राज्यपर अभिषेक और उन्हें भार रहित लावण्यवासमें रहनेका आदेश ( आदि० २०६ । २३ के बाद दा० पाठ ) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें गये थे ( सभा० ३४ । ५ ) ।
  • इनका दुर्योधनसे उसकी चिन्ताका कारण पूछना ( सभा० ४९ । ९-११ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको भेजना ( सभा० ४९ । ५५-५९ ) ।
  • इनका दुर्योधनको वैर-विरोध होनेके कारण जुआ न खेलनेकी सलाह देना ( सभा० ५० । १२ ) ।
  • पाण्डवोंके साथ विरोध न करनेके लिये इनका दुर्योधनको समझाना ( सभा० ५४ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा युयुत्सुकी निन्दा ( सभा० ५६ । १२ ) ।
  • पाण्डवों-को द्यूतक्रीड़ामें सम्मिलित होनेके लिये बुलानेके हेतु इनका विदुरको आदेश ( सभा० ५६ । २१ ) ।
  • इनका विदुरके साथ वार्तालाप ( सभा० ५७ अध्याय ) ।
  • द्यूतक्रीड़ाके अवसरपर इनको विदुरकी चेतावनी ( सभा० ६१ अध्याय ) ।
  • इनका द्रौपदीको वरदान ( सभा० ७१ । ३१-३३ ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर और आश्वासन दे उन्हें इन्द्रप्रस्थ लौट जानेका आदेश ( सभा० ७३ अध्याय ) ।
  • इनकी पुनः जुएके लिये स्वीकृति ( सभा० ७४ । २४ ) ।
  • इन्हें गान्धारी-की चेतावनी ( सभा० ७५ अध्याय ) ।
  • प्रजाके शोकके विषयमें इनका विदुरसे संवाद ( सभा० ८० । ३५ के बाद दा०पाठ ) इनकी चिन्ता तथा संजयसे बातचीत ( सभा० ८१ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा विदुरकी सलाहका विरोध ( वन० ५ । १८-२१ ) ।
  • विदुरको बुलानेके लिये इनका संजयको आदेश ( वन० ६ । ५-१० ) ।
  • इनकी विदुरसे क्षमा-प्रार्थना ( वन० ६ । २१ ) ।
  • इनका पाण्डवोंके विषयमें मैत्रेयजीसे प्रश्न करना ( वन० १० । ९ ) ।
  • इनका संजय-के सम्मुख पुत्रोंके लिये चिन्ता करना ( वन० ४८ अध्याय ) ।
  • इनका पाण्डवोंका पराक्रम सुनकर सं-तप्त होना ( वन० ५१ । १४-२३ ) ।
  • इनका पाण्डवोंका समाचार सुनकर इनके वेदयुक्त और चिन्ता-पूर्ण उद्गार ( वन० २३६ अध्याय ) ।
  • इनका दुर्योधन-
  • को घोषणात्राके लिये अनुमति देना ( वन० २२९ । २२ ) ।
  • दुपद-पुरोहितको सत्कारके साथ विदा करना ( उद्योग० २१ । २१ ) ।
  • संजयसे पाण्डवपक्षके वीरोंका वर्णन करते हुए संजयको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना ( उद्योग० २२ अध्याय ) ।
  • संजयकी बात सुनकर चिन्ताके कारण जागरण और विदुरको बुलाकर उनसे कल्याणकी बात पूछना ( उद्योग० ३३ । १-११ ) ।
  • इनका संजयसे युधिष्ठिरके सहायकोंके विषयमें प्रश्न ( उद्योग० ३० । ९ ) ।
  • भीमसेनके पराक्रमसे डरकर इनका विलाप करना ( उद्योग० ५१ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा अर्जुनके पराक्रमसे प्राप्त होनेवाले भयका वर्णन ( उद्योग० ५२ अध्याय ) ।
  • कौरवभामने मुझसे भय दिखाकर शान्तिका प्रस्ताव ( उद्योग० ५३ । १४-१५ ) ।
  • पाण्डवोंकी युद्ध-तैयारी सुनकर इनका विलाप ( उद्योग० ५० । २६-३५ ) ।
  • दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि कर लेनेके लिये समझाना ( उद्योग० ५८ । २-९ ) ।
  • भीमके पराक्रमका वर्णन करके अपने पक्षके अन्य राजाओंको भय दिखाना ( उद्योग० ५८ । १९-२८ ) ।
  • अपने पक्षकी अपेक्षा पाण्डव-पक्षको अधिक शक्तिशाली समझकर दुर्योधनको संधि के लिये समझाना ( उद्योग० ६० अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनको संधि की सलाह देना ( उद्योग० ६५ अध्याय ) ।
  • संजयसे दोनों पक्षोंके बला-बलके विषयमें प्रश्न ( उद्योग० ६७ । ४-५ ) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णका गुणगान ( उद्योग० ७१ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णके सत्कारके लिये दुर्योधनको आज्ञा देना ( उद्योग० ८५ । ७-१० ) ।
  • विदुरसे श्रीकृष्णकी अगवानी करने, भेंट देने तथा उन्हें दुःशासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना ( उद्योग० ८६ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णको कैद करनेकी बात सुनकर दुर्योधनका विरोध करना ( उद्योग० ८८ । १०-१८ ) ।
  • इनके द्वारा राजमहलमें श्रीकृष्णका आतिथ्य ( उद्योग० ८९ । १२-१५ ) ।
  • दुर्योधनको समझानेके लिये श्रीकृष्णसे अनुरोध ( उद्योग० १२४ । २-७ ) ।
  • दुर्योधनको समझाना ( उद्योग० १२५ । २२-२७ ) ।
  • गान्धारीसे दुर्योधनको उद्दण्डता बताना ( उद्योग० १२९ । ७-८ ) ।
  • श्रीकृष्णको कैद करनेसे दुर्योधनको रोकना ( उद्योग० १३० । ३४-३९ ) ।
  • श्रीकृष्णके विश्व-रूप-दर्शनके लिये उनसे आँखकी याचना और नेत्र पाकर भगवत्स्वरूपदर्शनसे कृतार्थ होना ( उद्योग० १३१ । १८-२१ ) ।
  • कुरुक्षेत्रमें कौरव-पाण्डवके पड़ाव पड़ जानेपर आगेके समाचारके विषयमें संजयसे पूछना ( उद्योग० १५९ । ३ ) ।
  • व्यासजीसे विजयसूचक लक्षणोंके विषयमें पूछना ( भीष्म० ३ । ५४ ) ।
  • संजयसे युद्धकी महिमा पूछना ( भीष्म० ४ ।
  • ३—८ ) ।
  • संजयसे भीष्मकी मृत्युका समाचार सुनकर इनका विलाप ( भीष्म० १४ अध्याय ) ।
  • संजयसे इनका युद्धका सारा वृत्तान्त सुनना ( भीष्मपर्वसे शल्यपर्व तक ) अपनी सेनाको मारी जाती सुनकर इनकी चिन्ता ( भीष्म० ७६ अध्याय ) ।
  • द्रोणाचार्यकी मृत्यु सुनकर इनका शोकसे व्याकुल होना ( द्रोण० अध्याय ९ से १० तक ) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमाका वर्णन ( द्रोण० ११ अध्याय ) ।
  • अर्जुनकी जय तथा जयद्रथकी प्रतिज्ञापर इनका विलाप करना ( द्रोण० ८५ अध्याय ) ।
  • सात्यकिद्वारा अपनी सेनाका संहार सुनकर विषाद करना ( द्रोण० ११४ । १-४६ ) ।
  • इनके द्वारा भीमसेनके बलका वर्णन और अपने पुत्रोंकी निन्दा ( द्रोण० १२५ । १-२४ ) ।
  • कर्णसे कर्मद्वारा अर्जुनपर शक्ति न छोड़े जानेका कारण पूछना ( द्रोण० १६२ । ९-१० ) ।
  • कर्णकी मृत्यु सुनकर शोककुल होना ( कर्ण० ५ अध्याय ) ।
  • कर्णकी मृत्यु सुनकर विलाप करना और उसके वधका विस्तृत वर्णन करनेके लिये संजयसे कहना ( कर्ण० अध्याय ८ से ९ तक ) ।
  • कर्णवधका समाचार सुनकर मोहित होना ( कर्ण० ९६ । ५४ ) ।
  • शल्य और दुर्योधनके वधका समाचार सुनकर मूर्छित होना ( शल्य० ३१ । ३९-४० ) ।
  • इनका विलाप करना और युद्धका समाचार पूछना ( शल्य० ४२ अध्याय ) ।
  • युद्धकी समाप्तिपर इनका विलाप ( स्त्री० १ । १०-२१ ) ।
  • व्यासजीसे अपना दुःख बताकर विलाप करना ( स्त्री० ८ । ६-११ ) ।
  • संजयकी बात सुनकर इनका मूर्छित होना ( स्त्री० ९ । ८ ) ।
  • स्त्रियों और प्रजालोगोंके साथ रण-भूमिमें जानके लिये नगरसे बाहर निकलना ( स्त्री० १० । १६ ) ।
  • भीमसेनकी लोहमयी मूर्तिको तोड़ना ( स्त्री० १२ । १० ) ।
  • पाण्डवोंको हृदयसे लगाना ( स्त्री० १३ । १० ) ।
  • युधिष्ठिरसे मरे हुए लोगोंकी संख्या और गतिके विषयमें प्रश्न करना ( स्त्री० २६ । ८, ११, १८ ) ।
  • युधिष्ठिरसे मरे हुए लोगोंके दाह-संस्कार करनेको कहना ( स्त्री० २६ । २१-२२ ) ।
  • युधिष्ठिरसे मरे सगे-सम्बन्धियोंका श्राद्ध करनेका उपदेश ( शान्ति० १ । ८-२० ) ।
  • युधिष्ठिरको समझाना ( आश्रम० १ । १-२० ) ।
  • भीमसेन सहित युधिष्ठिर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वारा गान्धारीसहित धृतराष्ट्रकी सेवा ( आश्रम० १ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका गान्धारीसहित धृतराष्ट्रके अनुकूल बर्ताव ( आश्रम० २ अध्याय ) ।
  • भीमकी मर्मभेदिनी बातोंसे व्यथित हुए धृतराष्ट्र का गान्धारीसहित वनमें जानेका उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध ( आश्रम० ३ । १-४० ) ।
  • राजा धृतराष्ट्रका उपवाससे दुर्बल होनेके कारण बोलनेमात्रसे
  • थककर गान्धारीका सहारा ले अचेत सा होकर लेट जाना; राजा युधिष्ठिरके हाथ फेरनेसे इनका सचेत होना और उनसे पुनः हाथ फेरने और हृदयसे लगानेके लिये कहना ( आश्रम० ३ । ६१-७३ ) ।
  • युधिष्ठिरको हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघना और उनसे तपस्याके लिये पुनः अनुमति माँगना । युधिष्ठिरका इनसे अन्न ग्रहण करनेके लिये कहना और इनको वनमें जानेकी अनुमति दे देनेकी शर्तपर ही भोजन करनेको उद्यत होना ( आश्रम० ३ । ७५-८६ ) ।
  • व्यासजीके समझानेपर युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेकी अनुमति देना और उनसे भोजन करनेको प्रार्थना करना ( आश्रम० ४ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा राजा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश ( आश्रम० अध्याय ५ से ७ तक ) ।
  • धृतराष्ट्रका कुरुजाङ्गलदेशकी प्रजासे वनमें जानेकी आज्ञा माँगना और अपने अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करना ( आश्रम० अध्याय ८ से ९ तक ) ।
  • प्रजाकी ओरसे भाम्ब नामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको उत्तर देना ( आश्रम० १० अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे श्राद्ध करनेके लिये धन माँगना ( आश्रम० ११ । १-६ ) ।
  • युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना ( आश्रम० १२ अध्याय ) ।
  • विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारता पूर्ण उत्तर सुनाना ( आश्रम० १३ अध्याय ) ।
  • राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दानयज्ञका अनुष्ठान ( आश्रम० १४ अध्याय ) ।
  • गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान; कुन्तीका गान्धारीका हाथ अपने कंधेपर रखकर जाना, पाण्डवों, द्रौपदी आदि स्त्रियों और पुरवासियोंका रोते हुए इनके पीछे-पीछे जाना ( आश्रम० १५ अध्याय ) ।
  • राजा धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना; कृपाचार्य और युयुत्सुको युधिष्ठिरके हाथों सौंपना ( आश्रम० १६ । १-५ ) ।
  • कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका वनके मार्गमें गङ्गातटपर निवास करना ( आश्रम० १६ । १६-२५ ) ।
  • धृतराष्ट्र आदिका गङ्गातटसे दुर्गम क्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना ( आश्रम० १७ अध्याय ) ।
  • नारदजीका धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना और इन्हें मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना ( आश्रम० २० अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्र आदिके लिये पुरवासियों तथा पाण्डवोंकी चिन्ता ( आश्रम० २१ अध्याय ) ।
  • पाण्डवों तथा पुरवासियोंका वनमें जाकर कुन्ती और गान्धारीसहित धृतराष्ट्रके दर्शन करना ( आश्रम० २२ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत ( आश्रम० २३ । १-१० ) ।
  • धृतराष्ट्रके पास महीने त्यागका आगमन, इनसे कुशल पूछते हुए उनके द्वारा विदुर और युधिष्ठिरको
  • धर्मरूपताका प्रतिपादन तथा इनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये आदेश प्रदान करना ( आश्रम० २६ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रका व्यासजीसे अपने मानसिक शोक एवं अशान्तिका वर्णन करना ( आश्रम० २९ । २३-३४ ) ।
  • व्यासजीका धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय देना तथा उनकी आज्ञासे इन सबका गङ्गातटपर जाना ( आश्रम० ३१ अध्याय ) ।
  • व्यासजीकी कृपासे दिव्य दृष्टि पाकर धृतराष्ट्रका गङ्गाजलसे प्रकट हुए अपने पुत्रों और सगे-सम्बन्धियोंका दर्शन करना एवं प्रसन्न होना ( आश्रम० ३२ अध्याय ) ।
  • व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना ( आश्रम० ३६ अध्याय ) ।
  • कुन्ती, गान्धारीसहित धृतराष्ट्रकी तीव्र तपस्या एवं गङ्गाद्वारके वनमें इनका दावानलसे दग्ध हो जाना ( आश्रम० ३७ । १०-३२ ) ।
  • धृतराष्ट्र आदिकी हड्डियोंका गङ्गामें प्रवाह तथा इनका श्राद्ध-कर्म ( आश्रम० ३९ अध्याय ) ।
  • स्वर्गलोकमें जानेपर गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका धनाध्यक्ष कुबेरके दुर्लभलोकको प्राप्त करना ( स्वर्गा० ५ । १४ ) ।

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