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धृतवर्मा

  • त्रिगर्तराज सूर्यवर्मा और केतुवर्माका भाई, जिसने सूर्यवर्माके पराजित होने और केतुवर्माके मारे जानेपर स्वयं ही आगे बढ़कर अश्वमेधीय अश्वकी रक्षाके लिये आये हुए अर्जुनके साथ लोहा लिया था । इसके द्वारा अर्जुनपर बाणवर्षा । अर्जुनका बाण लगनेसे इसके हाथोंकी फुर्ती देखकर अर्जुनद्वारा मन-ही-मन उसकी प्रशंसा, उसके तेजका वर्णन । अर्जुनके हाथमें गहरी चोट लगनेके कारण सात्यकि धनुषका गिर जाना; इससे धृतवर्माका अट्टहास करना; तब रोषमें भरे हुए अर्जुनका बाणोंकी वर्षा करना; धृतवर्माको बचानेके लिये त्रिगर्त योद्धाओंका अर्जुनपर धावा बोलना और अर्जुनद्वारा अठारह त्रिगर्त वीरोंके मारे जानेपर धृतवर्मा आदि सभी त्रिगर्तोंका दास बनकर अर्जुनकी शरणमें आना ( आश्रम० ७४ । १६—३३ ) ।

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