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अगस्त्य-

  • मित्रावरुणके पुत्र एक ब्रह्मर्षि, जिन्हें ‘कुम्भज’ भी कहते हैं ( शान्ति० २४२।१५१ )।
  • इन्होंने यज्ञविध्वंसकारी पशुओंपर आक्रमण करके उन्हें मार भगाया था ( आदि० १९०।१२ )।
  • इनके द्वारा अग्निवेश्यको धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त हुई थी ( आदि० १३८।१४ )।
  • इनका पिंजरोंके उद्धारार्थ विवाह करनेका विचार ( वन० ९६।१९ )।
  • इन्होंने अपनी पत्नी बनानेकी इच्छासे अपने ही द्वारा रची गयी एक दिव्य स्त्रीको तपस्वी विदर्भराजके यहाँ उनकी पुत्री-रूपमें दे दिया था ( वन० ९६।१२१ )।
  • विदर्भ-राजकुमारी लोपामुद्रासे इनका विवाह ( वन० ९७।१० )।
  • इनकी गद्गाद्वारमें पत्नीसहित तपस्या ( वन० ९७।११ )।
  • लोपामुद्रासे प्रेरित होकर इनका धनसंग्रहके लिये प्रस्थान ( वन० ९७।२५ )।
  • इनका श्रुतर्वा, ब्रह्मक्ष तथा त्रसदस्युसे धन माँगना ( वन० ९८।४, ९, १५ )।
  • इनके द्वारा वातापिका भक्षण ( वन० ९९।६ )।
  • इनकी इल्वसे धनकी याचना ( वन० ९९।१२ )।
  • इनका लोपामुद्राके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करना ( वन० ९९।२५ )।
  • देवताओंद्वारा इनकी स्तुति ( वन० १०३।१५-१८ )।
  • इनका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना ( वन० १०४। १२-१३ )।
  • इनके द्वारा समुद्रका शोषण ( वन० १०५। ३-६ )।
  • इनसे राक्षस मणिमान् तथा कुबेरको शाप प्राप्त होना ( वन० १६१।६०-६२ )।
  • इनका इन्द्रसे नहुषके पतनका वृत्तान्त सुनाना ( उद्योग० अध्याय १७ )।
  • इनके द्वारा वानप्रस्थाश्रमका पालन ( शान्ति० २४४। १६ )।
  • इनके शापसे नहुषका पतन ( शान्ति० २४२।५९ )।
  • कमलोंकी चोरी हो जानेपर इनका सारगर्भित प्रवचन ( अनु० १४।१-१३ )।
  • नहुषके अत्याचारके विषयमें भृगुजीसे इनका वार्तालाप ( अनु० १९।१६-२९ )।
  • नहुषके द्वारा इनका रथमें जोता जाना ( अनु० १००। १८-१९ )।
  • वायुद्वारा इनके प्रभावका वर्णन - इनके क्रोधसे दग्ध होकर दानवोंका अन्तरिक्षसे गिरना ( अनु० १९५। १ -१३ )।
  • अगस्त्यजीके द्वारा द्वादशवार्षिक यज्ञका अनुष्ठान और उसमें इनकी तपस्याका अद्भुत प्रभाव ( आश्र० अ० १२ )।

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