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धृष्टद्युम्न

  • इसका पुनः वनमें पाण्डवोंसे भेंट करना ( वन० ५१ । १० ) ।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इसे रण-निमन्त्रण दिया गया ( उद्योग० ४ । ८ ) ।
  • उद्योग० ४ । २० ) ।
  • यह एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पाण्डवोंके पास आया ( उद्योग० १६ । ७ ) ।
  • संजयद्वारा इसकी वीरताका वर्णन ( उद्योग० ५० । ४४ ) ।
  • युधिष्ठिरकी सेनाके सात सेनापतियोंमेंसे एकके पदपर इसका अभिषेक किया गया था ( उद्योग० १५७ । ११—१३ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें बाह्लीकके साथ इसका युद्ध ( भीष्म० ७५ । ३८—४१ ) ।
  • भूरि-श्रवाके साथ इसका युद्ध और पराजय ( भीष्म० ८४ । ३९ ) ।
  • पौरवके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११६ । १२—१४ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इसकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । ४३ ) ।
  • कृपाचार्यके साथ युद्ध ( द्रोण० १३ । ३३—३४ ) ।
  • इसके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । २३—२४ ) ।
  • अम्बष्ठके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । ४९—५० ) ।
  • इसका वीरधन्वके साथ युद्ध ( द्रोण० १०६ । १० ) ।
  • इसके द्वारा वीरधन्वाका वध ( द्रोण० १०७ । १० ) ।
  • इसका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और उनके द्वारा पुत्रसहित इसका वध ( द्रोण० १२५ । २३—४१ ) ।
  • व्यासजीके आवाहन करनेपर परलोकवासी कौरव-पाण्डव वीरोंके साथ यह भी गङ्गाजलसे प्रकट हुआ था ( आश्रम० ३२ । ११ ) ।
  • स्वर्गलोकमें जाकर यह विश्वेदेवोंमें मिल गया था ( स्वर्ग० ५ । १६—१८ ) ।
  • पाञ्चालराज द्रुपदके अग्नितुल्य तेजस्वी पुत्र । यज्ञ-कर्मका अनुष्ठान होते समय प्रज्वलित अग्निसे धृष्टद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ । ये द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये धनुष लेकर प्रकट हुए थे । फिर उसी वेदीसे द्रौपदी प्रकट हुई थी; अतः इन्हें उसका ‘अग्रज बन्धु’ कहा जाता है ( आदि० ६७ । १०८—११० ) ।
  • ये अग्निके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६७ । १२६ ) ।
  • याजने द्रुपदकी रानीको यज्ञका हविष्य ग्रहण करनेके लिये बुलाया । महारानीने शुद्ध होकर आनेकी इच्छा प्रकट की और थोड़ी देरतक महर्षिको प्रतीक्षाके लिये कहा; परंतु याजने कहा—‘रानी ! इस हविष्यको याजने तैयार किया और उपयाजने इसका संस्कार किया है; फिर इससे संतानकी उत्पत्तिरूप अभीष्टकी सिद्धि कैसे नहीं होगी ? तुम इसे लेने आओ या न आओ !’ इतना कहकर ज्यों ही याजने उस संस्कारयुक्त हविष्यकी अग्निमें आहुति दी, त्यों ही उस प्रज्वलित अग्निसे ये एक तेजस्वी कुमाररूपसे प्रकट हुए ( आदि० १६६ । ३३ ) ।
  • इनके अङ्गोंकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्भासित हो रही थी । इनके मस्तकपर किरीट; अङ्गोंमें उत्तम कवच तथा हाथोंमें खड्ग, बाण और धनुष शोभा पाते थे । ये गर्जना करते हुए एक श्रेष्ठ रथपर जा चढे मानो युद्धकी यात्राके लिये जा रहे हों, इससे पाञ्चालोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । ये 'साधु-साधु' कहकर इन्हें शाबाशी देने लगे ( आदि० १६६ । ४०-४१ ) ।
  • इनके जन्मके समय आकाशवाणी हुई थी—यह कुमार पाञ्चालोंका भय दूर करेगा; द्रोणवधके लिये इसका प्राकट्य हुआ है ( आदि० १६६ । ४२-४३ ) ।
  • इनका धृष्टद्युम्न नाम होनेका कारण ( आदि० १६६ । ५२ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इनकी शिक्षा ( आदि० १६६ । ५३ ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें इनकी घोषणा ( आदि० १६८ । ३५-३६ ) ।
  • इनका द्रौपदीको स्वयंवरमें आये हुए राजाओंका परिचय देना ( आदि० १६८ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा गुप्तरूपसे पाण्डवोंके व्यवहारोंका निरीक्षण ( आदि० १९१ । १-१२ ) ।
  • द्रौपदीके सम्बन्धमें चिन्तित हुए द्रुपदको इनका आश्वासन देना ( आदि० १९२ । १२ ) ।
  • व्यासजीके पूछनेपर द्रौपदीके विवाहके सम्बन्धमें इनका सम्मत ( आदि० १९५ । १० ) ।
  • युधिष्ठिरके यहाँसे राजा विराट्के यहाँ इन्हें पहुँचाने गये थे । ( सभा० ५३ । १० ) ।
  • द्रौपदीके द्वारा इनकी स्थिरताका वर्णन ( सभा० ५३ । १३ ) ।
  • इनके द्वारा रोती हुई द्रौपदीको आश्वासन ( वन० १३१ । १३४-१३५ ) ।
  • इनका द्रौपदीकुमारोंको साथ लेकर अपनी राजधानीको प्रस्थान ( वन० १३१ । ४० ) ।
  • इन्होंने काम्यकवनमें जाकर पाण्डवोंसे भेंट की ( वन० १५१ । १० ) ।
  • उपप्लव्य नगरमें अभिमन्युके विवाहमें इनका आगमन ( विराट० ७२ । १८ ) ।
  • संजयद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( उद्योग० ५० । १६ ) ।
  • ये पाण्डव-दलके प्रधान सेनापति चुने गये थे ( उद्योग० १५७ । १३ ) ।
  • इनका उलूकसे दुर्योधनके संदेशका उत्तर देना ( उद्योग० १६३ । ४५-४७ ) ।
  • इनके द्वारा अपने पक्षके महारथियोंको समान प्रतिज्ञामें युद्ध करनेका आदेश और उनका नामनिर्देशन ( उद्योग० १६४ । ५-१० ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें द्रोणाचार्यके साथ इनका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । ३१-३४ ) ।
  • भीष्मके साथ युद्ध ( भीष्म० ४७ । ३१ ) ।
  • दूसरे दिनके युद्धके लिये इनके द्वारा क्रौञ्चारुणव्यूहका निर्माण ( भीष्म० ५० । ४२-४७ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ घोर युद्ध ( भीष्म० ५३ अध्याय ) ।
  • कलिङ्गोंसे युद्ध करते समय भीमसेनकी रक्षामें पहुँचना ( भीष्म० ५४ । ११ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध ( भीष्म० ६१ । १९ ) ।
  • पौरवपुत्र दमनकका वध ( भीष्म० ६१ । २० ) ।
  • शल्यके पुत्रका वध ( भीष्म० ६१ । २१ ) ।
  • शल्यके साथ युद्ध और घायल होना ( भीष्म० ६२ । ८-१२ ) ।
  • इनके द्वारा मकरव्यूहका निर्माण ( भीष्म० ७५ । ४-४५ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा धृतराष्ट्रपुत्रोंपर इनकी विजय ( भीष्म० ८० । ४-५ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा पराजित होना ( भीष्म० ८० । ४६-४७ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ८१ । ४२-४५ ) ।
  • कृतवर्माके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ९१ । ६-१०; भीष्म० १११ । ४०-४५ ) ।
  • भीष्मवधके लिये अपनी सेनाको प्रोत्साहन ( भीष्म० ११० । २०-२३ ) ।
  • भीष्मके साथ युद्ध ( भीष्म० ११४ । ३९ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११६ । ४५-५४; द्रोण० ७ । ४८-५४ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । ४०-४२, ६०-६२ ) ।
  • सुशर्माके साथ युद्ध ( द्रोण० १४ । ३७-३९ ) ।
  • द्रोणाचार्यसे भयभीत युधिष्ठिरको आश्वासन ( द्रोण० २० । २२-२३ ) ।
  • दुर्मुखके साथ युद्ध ( द्रोण० २० । २६-२९ ) ।
  • इनके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । ४ ) ।
  • द्रोणपर आक्रमण ( द्रोण० ३१ । १० ) ।
  • इनके द्वारा चन्द्रवर्मा और निषधराज बृहत्क्षत्रका वध ( द्रोण० ३२ । ५५-६६ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ घोर युद्ध ( द्रोण० ९५ तथा ९७ अध्याय ) ।
  • द्रोणाचार्यको मूर्च्छित करके उनके रथपर चढ़ जाना ( द्रोण० १२२ । ५५-५८ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा पराजय ( द्रोण० १२२ । ७१-७२ ) ।
  • भीमसेनके कहनेसे युधिष्ठिरकी रक्षाका भार स्वीकार करना ( द्रोण० १२७ । १०-११ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्धमें पराजित होना ( द्रोण० १६० । ४१-४२ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ युद्ध ( द्रोण० १७० । २-१२ ) ।
  • इनके द्वारा दुःशासनका वध ( द्रोण० १७० । २२ ) ।
  • भीमसेनका पराजय ( द्रोण० १७१ । ४५-५२ ) ।
  • सात्यकिका पराजय ( द्रोण० १७३ । ७ ) ।
  • द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा ( द्रोण० १७६ । ४६ ) ।
  • दुःशासनको हराकर द्रोणाचार्यका आक्रमण ( द्रोण० १७९ । १-८ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ भयंकर संग्राम ( द्रोण० अध्याय १९१ से १९२ । २६-३५ तक ) ।
  • इनके द्वारा द्रोणाचार्यका सिर काटा जाना ( द्रोण० १९२ । ६२-६३ ) ।
  • इनका अर्जुनके समक्ष द्रोणवधरूपी अपने कृत्यका समर्थन करना ( द्रोण० १९७ । २४-४४ ) ।
  • सात्यकिके कटु-वचनोंका उत्तर देना ( द्रोण० १९८ । २५-४५ ) ।
  • अश्वत्थामाद्वारा पराजय ( द्रोण० २०० । ४३ ) ।
  • इनके द्वारा गजसेनाका संहार ( कर्ण० २२ । २-७ ) ।
  • कृपाचार्यसे भयभीत होना ( कर्ण० २४ । १६-१८ ) ।
  • कृतवर्माको मूर्च्छित करना ( कर्ण० ५४ । ५ ) ।
  • दुर्योधनको युद्धमें परास्त करना ( कर्ण० ५४ । ३४-३५ ) ।
  • कर्णके साथ युद्ध ( कर्ण० ५५ । १५-१७ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्धमें जीते-जी पकड़ा जाना ( कर्ण० ५९ । ३९-४३ ) ।
  • दुःशासनके काबूमें पड़ जाना ( कर्ण० ६१ । ३३ ) ।
  • कृपाचार्यके साथ युद्ध ( शल्य० ११ । ८ ) ।
  • इनके द्वारा शाल्वके हाथीका वध ( शल्य० २० । २५ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय ( शल्य० २५ । २३ ) ।
  • अश्वत्थामाद्वारा इनका रात्रिमें वध ( सौप्तिक० ८ । २६ ) ।
  • इनका दाह-संस्कार ( स्त्री० २६ । ३४ ) ।
  • इनका श्राद्धकर्म ( शान्ति० ५२ । ४-५ ) ।
  • स्वर्गमें जाकर ये अग्निके स्वरूपमें मिल गये ( स्वर्गा० ५ । २९ ) ।

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