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धौम्य

  • (१) उत्कोचक तीर्थमें तपस्या करनेवाले एक महर्षि, देवल ऋषिके अनुज; पाण्डवोंके पुरोहित ( आदि० १६२ । २ ) ।
  • पाण्डवोंद्वारा इनका पुरोहितरूपमें वरण ( आदि० १६२ । ६ ) ।
  • इन्होंने वेदीपर प्रज्वलित अग्निकी स्थापना करके उसमें मन्त्रोंद्वारा आहुति दी और युधिष्ठिरको बुलाकर कृष्णाके साथ उनका गठबन्धन कर दिया । उन दोनों दम्पतिका पाणिग्रहण कराकर उनसे अग्निकी परिक्रमा करवायी और अन्य शास्त्रीय विधियोंका
  • (१) अनुष्ठान करके उनका विवाह-कार्य सम्पन्न कर दिया । इसी प्रकार क्रमशः सभी पाण्डवोंका विवाह द्रुपदकुमारी कृष्णाके साथ कराया ( आदि० १९० । ११-१४ ) ।
  • इन्होंने पाण्डवोंके उपनयनादि संस्कार कराये थे ( आदि० २२० । ८० ) ।
  • युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें ये होता थे ( सभा० ३३ । ३५ ) ।
  • इन्होंने युधिष्ठिरका अभिषेक किया ( सभा० ५३ । १० ) ।
  • पाण्डवोंके वनगमनके समय महर्षि धौम्य हाथमें कुशा लेकर उनके आगे-आगे जाते तथा यमसाम और रुद्रसामका गान करते थे ( वन० ३ । ८ ) ।
  • इनकी सूर्योपासनाके लिये युधिष्ठिरको प्रेरणा ( वन० ३ । ५-१२ ) ।
  • इनके द्वारा सूर्यके अष्टोत्तरशत नामोंका वर्णन ( वन० ३ । १६-१८ ) ।
  • किर्मीरकी मायाका नाश ( वन० ११ । २० ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति तीर्थोंका वर्णन ( वन० अध्याय ८७ से ९० तक ) ।
  • युधिष्ठिरके प्रति ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन ( वन० १६३ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीका अपहरण करनेपर जयद्रथको फटकारना और द्रौपदीकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना ( वन० २६८ । २६-२७ ) ।
  • अज्ञातवासके लिये चिन्तित हुए युधिष्ठिरको समझाना ( वन० २९५ । १२-२१ ) ।
  • पाण्डवोंकी राजिक यहाँ रहनेका ढंग बताना ( विराट० ४ । ७-५१ ) ।
  • अज्ञातवासके लिये यात्रा करते समय पाण्डवोंकी अग्निहोत्रसम्बन्धी अग्निको प्रज्वलित करके धौम्यने उनकी समृद्धि-वृद्धि, राज्यलाभ तथा भूलोक-विजयके लिये वेद-मन्त्र पढ़कर हवन किया । जब पाण्डव चले गये, तब जययज्ञ करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्यजी उस अग्निहोत्रसम्बन्धी अग्निको साथ लेकर पाञ्चालदेशमें चले गये ( विराट० ४ । ५४-५७ ) ।
  • युद्धमें मारे गये पाण्डवपक्षके सगे-सम्बन्धी जनोंका दाहकर्म कराया था ( स्त्री० २६ । २४-३० ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा धार्मिक कार्योंके लिये नियुक्ति ( शान्ति० ४३ । १४ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १३० । १५-१६ ) ।
  • (२) एक ऋषि, जिन्होंने रातमें सत्यवान्के न लौटनेपर उनके पिता राजा द्युमत्सेनको सत्यवान्के जीवित होनेका विश्वास दिलाया था ( वन० २९८ । १९ ) ।
  • हस्तिनापुरके मार्गमें श्रीकृष्णसे इनकी भेंट ( उद्योग० ८३ । ६४ के बाद दा० पा० ) ।
  • ये शिवभक्त उपमन्यु ऋषिके छोटे भाई हैं ( अनु० १७ । ११२ ) ।
  • एक प्राचीन ऋषि, जो शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीके पास आये थे ( शान्ति० ४७ । ११ ) ।

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