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नकुल

  • ( १ ) पाण्डुके क्षेत्रज पुत्र तथा माद्रीके गर्भसे उत्पन्न दो पुत्रोंमेंसे एक; ये दोनों भाई जुड़वें उत्पन्न हुए थे । दोनों ही सुन्दर तथा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहनेवाले थे ( आदि० ९ । ११४; आदि० ६३ । ११०; आदि० ९५ । ६३ ) ।
  • अनुपम रूपाली तथा परम मनोहर नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ९७ । १११-११२ ) ।
  • इनकी उत्पत्ति तथा शतशृङ्गनिवासी ऋषियोंद्वारा इनका नामकरण-संस्कार ( आदि० १२३ । १०-२१ ) ।
  • वसुदेवके पुरोहित कार्यपद्वारा इनके उपनयन आदि संस्कार तथा राजर्षि शुक्रद्वारा इनका अस्त्रविद्याका अध्ययन और ढाल तलवार चलानेकी कलामें निपुणता प्राप्त करना ( आदि० १२३ । २१ के बाद दा० पाठ ) ।
  • पाण्डुकी मृत्युके पश्चात् माद्रीका अपने पुत्रों नकुल-सहदेवको कुन्तीके हाथोंमें सौंपकर पतिके साथ चितापर आरूढ़ होना ( आदि० १२५ अध्याय ) ।
  • शतशृङ्ग-निवासी ऋषियोंका पाँचों पाण्डवोंको कुन्तीसहित हस्तिनापुर ले जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथोंमें सौंपना ( आदि० १२५ अध्याय ) ।
  • द्रोणाचार्यका पाण्डवोंको नाना प्रकारके दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा देना ( आदि० १३१ । ९ ) ।
  • द्रुपदका अर्जुनका माद्रीकुमार नकुल और सहदेवको अपना चक्र-रक्षक बनाना ( आदि० १३१ । १० ) ।
  • द्रोणद्वारा सुशिक्षित किये गये नकुल विविध प्रकारसे युद्ध करनेमें कुशल होनेके कारण अपने भाइयोंको बहुत प्रिय थे और अतिरथी कहलाते थे ( आदि० १३८ । ३० ) ।
  • धृतराष्ट्रके आदेशसे कुन्तीसहित पाण्डवोंका वारणावतयात्रा, वहाँ उनका स्वागत और लाक्षागृहमें निवास ( आदि० अध्याय
  • १४२ से १५५ तक ) ।
  • लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना, भीमका नकुल-सहदेवको गोदमें लेकर चलना ( आदि० १४७ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश ( आदि० १५५ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंकी पाञ्चालयात्रा ( आदि० १५९ अध्याय ) ।
  • इनका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना ( आदि० १६५ अध्याय ) ।
  • पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार ( आदि० १६९ अध्याय ) ।
  • पाँचों पाण्डवोंका कुन्तीसहित द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना ( आदि० १६९ अध्याय ) ।
  • पाँचों भाइयोंका द्रौपदीके साथ विवाह ( आदि० १७० अध्याय ) ।
  • विदुरके साथ पाण्डवोंका हस्तिनापुरसे आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना ( आदि० २०६ अध्याय ) ।
  • पाँचों भाइयोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण ( आदि० २११ अध्याय ) ।
  • नकुलद्वारा द्रौपदीके गर्भसे शतानीकका जन्म ( आदि० २२० । ७९; आदि० ९५ । ७३ ) ।
  • इनका चेदिराजकी कन्या करेणुमतीके साथ विवाह और इनके द्वारा उसके गर्भसे निरमित्रका जन्म ( आदि० ९५ । ७५ ) ।
  • इनके द्वारा पश्चिमदिशाके देशोंपर विजय । नकुलके जीतकर लाये हुए खजानेका बीस हजार ऊँट बड़ी कठिनाईसे ढोकर ला सके थे ( सभा० ३२ अध्याय ) ।
  • राजसूय यज्ञके बाद ये गान्धारराज सुबल और उनके पुत्रोंको पाण्डवोंके यहाँ पहुँचाने गये थे ( सभा० ४५ । ७५ ) ।
  • युधिष्ठिरके द्वारा ये जुएके दाँवपर रखे और हारे गये थे ( सभा० ६५ । १२ ) ।
  • ये अपने शरीरमें धूल लपेटकर वनका ओर गये थे ( सभा० ८० । १८ ) ।
  • इनकी अर्जुनके लिये चिन्ता ( वन० ८० । २३-२६ ) ।
  • जटासुरने इनका अपहरण किया था ( वन० १५७ । १० ) ।
  • इनके द्वारा क्षेमङ्कर, महासुख और सुरथका वध ( वन० २७१ । १६-२२ ) ।
  • द्वैतवनमें जल लानेके लिये जाना और सरोवरपर गिरना ( वन० ३१२ । १३ ) ।
  • इनका विराट-नगरमें ग्रन्थिक नामसे रहनेकी बात बताना ( विराट० ३ । ४ ) ।
  • इनके 'नकुल' नामकी निरुक्ति ( विराट० ५ । २५ ) ।
  • राजा विराटके यहाँ रहनेके लिये उनसे प्रार्थना करना ( विराट० १२ । ८ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इनका त्रिगर्तोंके साथ युद्ध ( विराट० ३३ । १४ ) ।
  • दूत बनकर जानेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णसे इनका समयोचित कर्तव्य करनेके लिये निवेदन ( उद्योग० ८० अध्याय ) ।
  • द्रुपदको प्रधान सेनापति बनानेके लिये इनका प्रस्ताव ( उद्योग० १५१ । १६ ) ।
  • उल्लूकसे दुर्योधनके संदेशका उत्तर ( उद्योग० १६३ । ३८ ) ।
  • कवच उतारकर कौरवसेनाकी ओर
  • (१) पैदल ही जाते हुए युधिष्ठिरसे इनका प्रश्न करना ( भीष्म० ४३ । १८ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें दुःशासनके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ४५ । २२-२४ ) ।
  • शल्यके साथ युद्धमें इनका घायल होना ( भीष्म० ८३ । ४५ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इनके द्वारा अश्वसेनाका संहार ( भीष्म० ८९ । ३२-३४ ) ।
  • इनका शकुनिके साथ युद्ध ( भीष्म० १०५ । ११-१२ ) ।
  • विकर्णके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ११० । ११-१२ ) ।
  • भीष्म० १११ । ३१-३२ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनका वीरत्वका वर्णन ( द्रोण० १० । २९-३० ) ।
  • शल्यके साथ युद्ध ( द्रोण० २३ । ३१-३२ ) ।
  • इनके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० ५४ । ७ ) ।
  • शकुनिके साथ इनका युद्ध ( भीष्म० ९६ । २१-२५ ) ।
  • विकर्णके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० १०५ । २१ ) ।
  • इनके द्वारा विकर्णकी पराजय ( द्रोण० १०७ । १२ ) ।
  • इनके द्वारा शकुनिकी पराजय ( द्रोण० १६९ । १६ ) ।
  • दुर्योधनको युद्धमें पराजित करना ( द्रोण० १८७ । ५०-५५ ) ।
  • धृष्टद्युम्नकी रक्षा करना ( द्रोण० १८९ । ७ ) ।
  • इनके द्वारा भगदत्तके पुत्रके मारे जानेकी चर्चा ( कर्ण० ५ । १२८ ) ।
  • इनके द्वारा अङ्गराजका वध ( कर्ण० २२ । १८ ) ।
  • कर्णसे पराजित होकर भागना और उनके द्वारा जीवित छोड़ दिया जाना ( कर्ण० २३ । ३० ) ।
  • सुषेणके साथ युद्ध ( कर्ण० ४८ । ३४-४० ) ।
  • दुर्योधनके साथ युद्धमें घायल होना ( कर्ण० ५१ । ५९ ) ।
  • वृषसेनके साथ युद्ध ( कर्ण० ६१ । ३६-३९ ) ।
  • कर्णद्वारा पराजय ( कर्ण० ६३ । १३ ) ।
  • वृषसेनके साथ युद्ध ( कर्ण० ८४ । १९-३५ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णके तीन पुत्रों ( चित्रसेन, सत्यसेन और सुषेण ) का वध ( शल्य० १० । १९-५० ) ।
  • शल्यके साथ युद्ध ( शल्य० अध्याय १३ तथा १५ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरकी आज्ञासे द्रौपदीको बुलानेके लिये जाना ( सौप्तिक० १० । २८ ) ।
  • गृहस्थधर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना ( शान्ति० १२ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा सेनाध्यक्षके पदपर नियुक्ति ( शान्ति० ४१ । १२ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इन्हें दुर्मर्षणके राजभवनकी प्राप्ति ( शान्ति० ४४ । १०-११ ) ।
  • भीष्मजीसे खड्गकी उत्पत्ति आदिके विषयमें इनका प्रश्न ( शान्ति० १६६ । २-९ ) ।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर इनका त्रिवर्गमें अर्थकी प्रधानता बताना ( शान्ति० १६७ । २२-२९ ) ।
  • अश्वमेधयज्ञके समय ये भीमसेनके साथ नगरकी रक्षाके कार्यमें नियुक्त थे ( आश्व० ७३ । १९ ) ।
  • कुन्तीका वन जाते समय इन्हें युधिष्ठिरको सौंपना ( आश्रम० १६ । १५ ) ।
  • वनमें मिलनेके लिये आये हुए नकुलको देखकर कुन्ती बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ी थीं ( आश्रम० २४ । १९ ) ।
  • संजयका
  • शृंगियोंसे इनका परिचय देना ( आश्रम० २५ । ८ ) ।
  • इनकी पत्नीका परिचय ( आश्रम० २५ । १४ ) ।
  • महाप्रस्थानके पथमें इनका गिरना और भीमसेनके पूछनेपर युधिष्ठिरका इनके पतनका कारण बताना ( महाप्र० २ । १२-१७ ) ।
  • स्वर्गमें जाकर युधिष्ठिरका इन्हें देखनेकी इच्छा प्रकट करना ( स्वर्ग० २ । १० ) ।
  • युधिष्ठिरने नकुल, सहदेवको तेजस्वी अश्विनीकुमारोंके स्थानपर विराजमान देखा ( स्वर्ग० ४ । ९ ) ।
  • ( २ ) युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञको तुच्छ बतानेवाला एक नेवला ( आश्व० ९० अध्याय ) ।

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