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नन्दा

  • (१) धर्मके तीसरे पुत्र हर्षकी पत्नी ( आदि० ६६ । ३३ ) ।
  • (२) ( अपरनन्दा ) नैमिषारण्यके आसपास वहाँसे पूर्व दिशामें स्थित एक नदी; इसके पास ही अपरनन्दा भी है । अर्जुनने युद्धके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए नन्दा और अपरनन्दाके तटपर भी थे ( आदि० २१४ । ६—७ ) ।
  • धौम्यने पूर्व दिशाके तीर्थोंके वर्णनके प्रसङ्गमें युधिष्ठिरके समक्ष इसका उल्लेख इस प्रकार किया है—कुण्डोद नामक रमणीक पर्वत बहुत फलमूल और जलसे सम्पन्न है । जहाँ प्यासे हुए निषधनरेश नलको जल और शान्ति उपलब्ध हुई थी । वहाँ तपस्वीजनोंसे सुशोभित पवित्र देववन नामक क्षेत्र है । यहाँ पर्वतके शिखरपर बाहुदा और नन्दा नदियाँ बहती हैं ( वन० ८० । २५—२७ ) ।
  • भाइयोंसहित युधिष्ठिरने लोमशके साथ नन्दा और अपर नन्दाकी यात्रा की । वे हेमकुट पर्वतपर आये और वहाँ अद्भुत बातें देखीं । वहाँ हवाके बिना भी बादल उत्पन्न होते और अपने आप हजारों ओले गिरने लगते थे । खिन्न मनुष्य उस पर्वतपर चढ़ नहीं सकते थे । प्रायः
  • प्रतिदिन वहाँ तेज हवा चलती और रोज रोज मेघ वर्षा करता था । सवेरे-शाम उस पर्वतपर अग्निदेव प्रज्वलित दिखायी देते थे । वहाँ मक्खियाँ लोगोंको डंक मारती थीं । यह सब ऋषभ नामक प्राचीन तपस्वी ऋषिके आदेशसे होता है—ऐसा लोमशमुनिने बताया । नन्दाके तटपर पहले देवतालोग आये थे । उस समय उनके दर्शनकी इच्छासे मनुष्य सहसा वहाँ आ पहुँचे । देवता यह नहीं चाहते थे; अतः उन्होंने उस पर्वतीय प्रदेशको जनसाधारणके लिये दुर्गम बना दिया । तबसे साधारण मनुष्योंके लिये इस ऋषभकूट या हेमकुट पर्वतपर चढ़ना तो दूर रहा; इसे देखना भी कठिन हो गया । जिसने तपस्या नहीं की है, वह इस महान् पर्वतका दर्शन नहीं कर सकता । यहाँ अब भी देवता-ऋषि निवास करते हैं । इसीलिये सायं प्रातः अग्नि प्रज्वलित होती है । यहाँ नन्दा में गोता लगानेसे मनुष्यका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है । युधिष्ठिरने वहाँ स्नान करके कौशिकी ( कोसी ) तीर्थकी यात्रा की थी ( वन० ११० । १—२१ ) ।
  • इस तीर्थमें मृत्युने तपस्या की थी ( द्रोण० ४५ । २०-२१ ) ।

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