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नल

  • कुण्डल हर लिये थे । देवता उसे युद्धमें पराजित न कर सके । देवताओंने श्रीकृष्णसे उसके वधके लिये प्रार्थना की । श्रीकृष्णने निर्मोचन नगरकी सीमापर जाकर सहसा मुरके छः हजार लोहमय पाश काट दिये । फिर मुरका वध और राक्षस-समुदायका नाश करके उन्होंने निर्मोचन नगरमें प्रवेश किया । वहाँ नरकासुरके साथ उनका युद्ध हुआ । श्रीकृष्णके हाथसे वह असुर मारा गया ( उद्योग० ४८ । ८०-८५ ) ।
  • पृथ्वी देवीके अनुरोधसे श्रीकृष्णने उसके पुत्र नरकासुरके लिये वैष्णवास्त्र प्रदान किया था । वह अस्त्र नरकासुरके पुत्र भगदत्तको भी पितासे प्राप्त हुआ था ( द्रोण० २९ । ३०-३६ ) ।
  • ( १ ) एक प्राचीन ऋषि, जो इन्द्र-सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ७ । १० ) ।
  • ( २ ) एक प्राचीन नरेश, जो युद्धमें पराजित नहीं होते थे ( आदि० ९ । २२६-२३५ ) ।
  • ये निषधके राजा वीरसेनके पुत्र थे ( वन० ५२ । ५६ ) ।
  • बृहदश्वद्वारा इनके गुणोंका वर्णन ( वन० ५३ । २-४ ) ।
  • इनका बहुत-से सुवर्णमय पंखोंसे विभूषित हंसोंको देखकर उनमेंसे एकको पकड़ना
  • ( वन० ५३ । १९ ) ।
  • हंसका दमयन्तीके समक्ष नलका गुणोंका वर्णन और उसका नलके प्रति अनुराग ( वन० ५३ । २७-३२; वन० ५४ । १-४ ) ।
  • स्वयंवरका समाचार सुनकर दमयन्तीमें अनुरक्त हुए राजा नलका विदर्भ देशको प्रस्थान ( वन० ५४ । २७ ) ।
  • इन्द्र आदि लोकपालोंद्वारा दूत बननेके लिये अनुरोध ( वन० ५४ । ३१ ) ।
  • इनका दूत बनकर दमयन्तीके महलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका वरण करनेके लिये समझाना ( वन० ५५ । ११-२५; वन० ५५ । १-१२ ) ।
  • दमयन्तीका नलको ही वरण करनेका निश्चय प्रकट करना और नलका दूतत्व करके लौटकर दमयन्तीका संदेश लोकपालोंको सुनाना ( वन० ५६ । १५-३० ) ।
  • स्वयंवरमें दमयन्ती- द्वारा नलका पतिरूपमें वरण और लोकपालोंद्वारा नलको वरकी प्राप्ति ( वन० ५७ । १-३८ ) ।
  • दमयन्तीके साथ विवाह-संस्कार ( वन० ५७ । ४१ ) ।
  • नलका नगरको लौटना, प्रजापालन, यज्ञ तथा दमयन्तीके साथ विहार करना, दमयन्तीके गर्भसे इन्हें इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नामवाली कन्याकी प्राप्ति ( वन० ५७ । ४२-४६ ) ।
  • देवताओंद्वारा नलके गुणोंका गान तथा इनपर कलियुगका कोप ( वन० ५८ अध्याय ) ।
  • नलमें कलिका प्रवेश और इनका पुष्करके साथ जुआ- खेलना ( वन० ५९ अध्याय ) ।
  • इनका जुएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको प्रस्थान ( वन० ६१ । १ ) ।
  • इनका पक्षियोंको पकड़नेके लिये उनके ऊपर वस्त्र फेंकना ( वन० ६१ । १४ ) ।
  • इनका सोते हुए दमयन्तीके आधे वस्त्रको फाड़कर पहनना, उसे वनमें अकेली छोड़कर जाना और पुनः लौटकर विलाप करना ( वन० ६२ । १-२५ ) ।
  • नलका दमयन्तीको अकेली छोड़कर बार- बार जाना और लौटना तथा कलिसे आकर्षित हो करुण विलाप करके चल देना ( वन० ६२ । २६-२९ ) ।
  • इनके द्वारा कर्कोटक नागकी दावानलसे रक्षा ( वन० ६६ । १ ) ।
  • कर्कोटकका नलको डँसकर उनके रूपको बदल देना और इन्हें आश्वासन देना एवं पहलेके रूपकी प्राप्तिके लिये एक वस्त्र प्रदान करना ( वन० ६६ । ११-२६ ) ।
  • इनकी अयोध्या नरेश ऋतुपर्णके यहाँ बाहुक नामसे अश्वाध्यक्ष-पदपर नियुक्ति, इनकी दमयन्तीके लिये चिन्ता तथा जावलसे वार्ता ( वन० ६७ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा ऋतुपर्णको अच्छे अश्वका परिचय देना
  • ( वन० ७१ । १६ ) ।
  • इनकी अक्षसंचालनकी कला ( वन० ७१ । २३ ) ।
  • इन्हें ऋतुपर्णद्वारा द्यूतविद्याकी प्राप्ति ( वन० ७२ । २९ ) ।
  • इनके शरीरसे कलियुगका निष्क्रमण ( वन० ७२ । ३० ) ।
  • इनका दमयन्तीकी दासी केशिनीसे वार्तालाप ( वन० ७४ अध्याय ) ।
  • दमयन्तीके आदेशसे केशिनीद्वारा बाहुककी परीक्षा; इनकी अपने पुत्र-पुत्रीसे भेंट और उनके प्रति वात्सल्य ( वन० ७५ अध्याय ) ।
  • इनका बाहुकरूपसे दमयन्तीके महलमें जाकर उससे वार्तालाप करना तथा पुनः नल- रूपमें प्रकट होना ( वन० ७६ । १-५२ ) ।
  • इनका दमयन्तीसे मिलन ( वन० ७६ । ४६ ) ।
  • इनका ऋतुपर्णके साथ वार्तालाप तथा उन्हें अश्वविद्याका दान ( वन० ७७ । १०-१७ ) ।
  • इनका पुष्करको जुएमें हराना ( वन० ७८ । १९ ) ।
  • इनके द्वारा पुष्करको सान्त्वना ( वन० ७८ । २०-२६ ) ।
  • इनके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व ( वन० ७९ । १०, १५-१७ ) ।
  • ये यमसभा में उपस्थित हो सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । ११ ) ।
  • ये देवराज इन्द्रके विमानमें बैठकर अर्जुन तथा कौरवोंमें होनेवाले युद्धको देखनेके लिये आये थे ( विराट० ५६ । १० ) ।
  • गोदान-महिमाके विषयमें इनका नाम निर्देश ( अनु० ७६ । १५ ) ।
  • (२) एक वानरसेनापति, जो देव शिल्पी विश्वकर्माका पुत्र था ( वन० २८३ । ४१ ) ।
  • इसके द्वारा समुद्रपर सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े सेतुका निर्माण ( वन० २८२ । ४३-४४ ) ।
  • इसका तुण्ड नामक राक्षससे युद्ध ( वन० २८५ । १ ) ।

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