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नहुष

  • ( १ ) कश्यप और कद्रुसे उत्पन्न हुआ एक प्रमुख नाग ( आदि० ३५ । १ ) ।
  • ( २ ) आयुके द्वारा स्वर्गानुरागीके गर्भसे उत्पन्न पाँच पुत्रोंमेंसे एक ( आदि० ७५ । २५ ) ।
  • इनके पराक्रम और गुणोंका वर्णन ( आदि० ७५ । २७-२८ ) ।
  • इनके इन्द्रकालमें इनके द्वारा ऋषियोंके वाहन बनाये जानेकी चर्चा ( आदि० ७५ । २९ ) ।
  • इन्होंने तेज, तप, ओज और पराक्रमद्वारा देवताओंको तिरस्कृत करके इन्द्रपदका उपभोग किया था ( आदि० ७५ । २९-३० ) ।
  • इनके पुत्रोंके नाम—यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव थे ( आदि० ७५ । ३०-३१ ) ।
  • ये यमराजकी सभामें उपस्थित होते हैं ( सभा० ८ । ८ ) ।
  • अजगर-योनिमें पड़े हुए इनके द्वारा भीमसेनका पकड़ा जाना ( वन० १७८ । २८ ) ।
  • भीमसेनके पूछनेपर उनसे अपना परिचय देना ( वन० १७९ । १०-२४ ) ।
  • युधिष्ठिरके साथ इनके प्रश्नोत्तर ( वन० १८० । ६ से १८१ । ४३ तक ) ।
  • इनका शापमुक्त होकर पुनः स्वर्गगमन ( वन० १८१ । ४४ ) ।
  • इन्होंने कभी वैष्णव याग किया था और उससे पवित्र हो स्वर्गलोककी यात्रा की थी ( वन० २५० । १५ ) ।
  • ये इन्द्रके विमानपर बैठकर अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये आये थे ( विराट० ५६ । १ ) ।
  • देवताओंके अनुरोधसे इन्द्र-पदपर इनका अभिषेक ( उद्योग० ११ । ९ ) ।
  • शचीको देखकर कामासक्त होना ( उद्योग० ११ । १८-१९ ) ।
  • शचीके विषयमें देवताओंको इनका उत्तर ( उद्योग० १२ । ६-८ ) ।
  • शचीको कुछ कालकी अवधि देना ( उद्योग० १३ । ७ ) ।
  • सप्तर्षियोंको वाहन बनाना ( उद्योग० १५ । २२ ) ।
  • महर्षि अगस्त्यद्वारा इन्हें शाप और इनका स्वर्गसे पतन ( उद्योग० १५ । १८-२८ ) ।
  • आयुके खड्गकी प्राप्ति ( शान्ति० २६२ । ७४ ) ।
  • इन्हें पापकी प्राप्ति और ऋषियोंद्वारा इनका उद्धार ( शान्ति० २६२ । ४८-५० ) ।
  • इनकी इन्द्रपद-प्राप्तिसे लेकर अन्ततककी कथा ( शान्ति० ३४२ । ४४-५२ ) ।
  • च्यवन संवाद और इनका गौके मूल्यके विषयमें संवाद ( शान्ति० ३४२ । ५४-५५ ) ।
  • च्यवनद्वारा इन्हें वर-प्राप्ति ( अनु० ५१ । ४४ ) ।
  • इन्होंने लाखोंकी संख्यामें गौओंका दान किया था; इससे इन्हें देवदुर्लभ स्थानकी प्राप्ति हुई ( अनु० ८१ । ५-६ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर इनका शाप लगना ( अनु० ९४ । २८ ) ।

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