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नारद

  • ( १ ) एक देवर्षि, जो ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । ये जनमेजयके सदस्य बने थे ( आदि० ५४ । ८ ) ।
  • ये ही कालान्तरमें देवगन्धर्व होकर कश्यपद्वारा 'मुनि' के गर्भसे उत्पन्न हुए हैं ( आदि० ६५ । ४४ ) ।
  • इन्होंने तीन लाख श्लोकोंवाला महाभारत देवताओंको सुनाया था ( आदि० १ । १०६-१०७; स्वर्गा० ५ । ५६ ) ।
  • इन्होंने दक्षके पुत्रोंको सांख्यज्ञानका उपदेश दिया था, जिससे वे मनुष्यत्वसे विरक्त होकर घरसे निकल गये थे ( आदि० ७५ । ७-८ ) ।
  • ये अर्जुनके जन्म-समयमें पधारे थे ( आदि० १२२ । ५७ ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें अन्य गन्धर्वों और अप्सराओंके साथ गये थे ( आदि० १९६ । ७ ) ।
  • द्रौपदीके निमित्त पाण्डवोंका आपसमें कोई मतभेद न हो—इस उद्देश्यसे इनका इन्द्रप्रस्थमें आगमन ( आदि० २०७ । १ ) ।
  • इनके गुण, प्रभाव एवं रहस्यका विशद वर्णन ( आदि० २०७ । १ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवोंके प्रति सुन्दर और उपसुन्दकी कथाका वर्णन करके द्रौपदीके विषयमें परस्पर फूटसे बचनेके लिये कोई नियम बनानेकी प्रेरणा ( आदि० अध्याय २०८ से २२१ तक ) ।
  • इनका वर्गो आदि अप्सराओंको आश्वासन और दक्षिण समुद्रके समीपवर्ती तीर्थोंमें रहनेका आदेश देना ( आदि० २९६ । १० ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरको प्रश्नके रूपमें विविध मङ्गलमय उपदेश ( सभा० ५ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर तथा ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन ( सभा० अध्याय ५ से १५ तक ) ।
  • इनका हरिश्चन्द्रकी संक्षिप्त कथा सुनाकर युधिष्ठिरको राजसूय यज्ञ करनेके लिये पाण्डुका संदेय सुनाना ( सभा० १२ । २३-२४ ) ।
  • बाणासुरद्वारा अनिरुद्धके कैद होनेकी श्रीकृष्णको सूचना देना ( सभा० ३८ । २९ के बाद दा० पाठ; पृष्ठ ८२२; कालम १ ) ।
  • राजसूययज्ञमें अवभृथ-स्नानके समय इन्होंने युधिष्ठिरका अभिषेक किया ( सभा० ५३ । १० ) ।
  • कौरवोंके विनाशके विषयमें नारदकी भविष्यवाणी ( सभा० ८० । ३३-३५ ) ।
  • इन्होंने धौम्यको सूर्यके अष्टोत्तरशत नामका उपदेश दिया था ( वन० ३ । ७५ ) ।
  • इनका शाल्वको मारनेके लिये उद्यत प्रद्युम्नके पास आकर देवताओंका संदेश सुनाना ( वन० ११ । २२-२४ ) ।
  • इन्द्रलोकमें अर्जुनके स्वागतमें अन्य गन्धर्वोंके साथ ये भी पधारे थे ( वन० ४३ । १४ ) ।
  • इनके द्वारा इन्द्रके प्रति दमयन्ती-स्वयंवरकी सूचना ( वन० ५४ । २०-२१ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको तीर्थयात्राका प्रसंग सुनाकर अन्तर्धान होना ( वन० ८१ । १२ से ८९ अध्यायतक ) ।
  • राजा सगरकी उनके पुत्रोंकी मृत्युका समाचार सुनाना ( वन० १०७ । ३३ ) ।
  • अर्जुनको दिव्यास्त्रप्रदर्शनसे रोकना ( वन० १०५ । १८-२३ ) ।
  • काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास इनका आगमन और मार्कण्डेय मुनिसे कथा सुननेका अनुमोदन करना ( वन० १८३ । ४०-४१ ) ।
  • सुहोत्र और शिबिमें इनका शिबिको श्रेष्ठतर बताना ( वन० १९४ । ३-७ ) ।
  • राजा अश्वपतिके सत्यवान्के गुण-दोषका वर्णन करके उनके साथ सावित्रीके विवाहके लिये सम्मति देकर विदा होना ( वन० २९४ । ११-३२ ) ।
  • शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर जाते हुए श्रीकृष्णकी परिक्रमा करना ( उद्योग० ८३ । २७ ) ।
  • पूर्वजन्मके शिबि सरीखे लोगोंमें सातवें मातलिको वरुण-लोकमें ले जाना और वहाँ आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखाना ( उद्योग० ९८ अध्याय ) ।
  • मातलिको पाताल-लोकमें ले जाना ( उद्योग० ९९ अध्याय ) ।
  • मातलिको हिरण्यपुर-का वर्णन और दिग्दर्शन ( उद्योग० १०० अध्याय ) ।
  • मातलिको गरुडलोकमें ले जाना ( उद्योग० १०१ अध्याय ) ।
  • मातलिसे संतानरहित सुरभि तथा रमातलका वर्णन ( उद्योग० १०२ अध्याय ) ।
  • मातलिसे नागलोकका वर्णन ( उद्योग० १०३ अध्याय ) ।
  • आर्यकके सम्मुख मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव ( उद्योग० १०४ । १-७ ) ।
  • दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजद्वारा विश्वामित्र-की परीक्षा और विश्वामित्रको गुरुदक्षिणा देनेके लिये गालवके हठका वर्णन ( उद्योग० १०६ अध्यायसे १२३-२२ तक ) ।
  • भीष्मको परशुरामके ऊपर प्रस्वापनास्त्रके प्रयोगसे मना करना ( द्रोण० ७८ । २५-२४ ) ।
  • पुत्र-शोकसे दुखी अकम्पनको इनके द्वारा सान्त्वना ( द्रोण० ५२ । ३७ से द्रोण० ५४ । ४४-५० तक ) ।
  • राजा संजयसे उनकी कन्याको माँगना ( द्रोण० ५५ । १२ ) ।
  • महर्षि पर्वतके शापके बदले उन्हें शाप देना ( द्रोण० ५५ । १७ ) ।
  • राजा संजयको पुत्र-प्राप्तिका वर देना ( द्रोण० ५५ । २३ के बाद ) ।
  • पुत्रशोकसे दुखी संजय-को मरुत्तका चरित्र सुनाकर समझाना ( द्रोण० ५५ । ३६-५० ) ।
  • राजा सुहोत्रकी दानशीलताका वर्णन करना ( द्रोण० ५६ अध्याय ) ।
  • पौरवकी दानशीलताका वर्णन ( द्रोण० ५७ अध्याय ) ।
  • शिबिके यज्ञ और दान-की महत्ताका वर्णन ( द्रोण० ५८ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ५९ अध्याय ) ।
  • राजा भगी-रथके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ६० अध्याय ) ।
  • महा-राज दिलीपके उदारताका वर्णन ( द्रोण० ६१ अध्याय ) ।
  • मान्धाताकी महत्ताका वर्णन ( द्रोण० ६२ अध्याय ) ।
  • महाराज ययातिकी कथा ( द्रोण० ६३ अध्याय ) ।
  • राजा अम्बरीषके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ६४ अध्याय ) ।
  • राजा शशबिन्दुके दानका वर्णन ( द्रोण० ६५ अध्याय ) ।
  • राजा गयके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ६६ अध्याय ) ।
  • राजा रन्तिदेवके अतिथिसत्कारका वर्णन ( द्रोण० ६७ अध्याय ) ।
  • राजा भरतके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ६८ अध्याय ) ।
  • राजा पृथुके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ६९ अध्याय ) ।
  • परशुरामजीका चरित्र सुनाना ( द्रोण० ७० अध्याय ) ।
  • संजयके मरे हुए पुत्रको जीवित करके उन्हें देना ( द्रोण० ७१ । ८ ) ।
  • रणक्षेत्रमें अर्जुनद्वारा बाणोंके प्रहारसे प्रकट किये हुए सरोवरोंको देखनेके लिये नारदजी वहाँ पधारे थे ( द्रोण० ११ । ६१ ) ।
  • रात्रियुद्धमें कौरव-पाण्डव सेनाओंमें दीपकका प्रकाश करना ( द्रोण० १६३ । १५ ) ।
  • वृषद्मनको विवाह करनेके लिये प्रेरित करना ( शल्य० ५३ । १२-१३ ) ।
  • बलरामजीसे कौरवोंके विनाश-का समाचार बताना ( शल्य० ५३ । २५-३४ ) ।
  • अश्वत्थामा और अर्जुनके ब्रह्मास्त्रको शान्त करनेके लिये प्रकट होना ( सौप्तिक० १० । ११ ) ।
  • युद्धके पश्चात् युधिष्ठिरके पास आकर उनसे कुशल-समाचार पूछना ( शान्ति० १ । १०-१२ ) ।
  • युधिष्ठिरसे कर्णको शाप प्राप्त होनेका प्रसंग सुनाना ( शान्ति० अध्याय २ से ३ तक ) ।
  • कर्णके पराक्रमका वर्णन ( शान्ति० अध्याय ४ से ५ तक ) ।
  • इनके द्वारा संजयके प्रति कहे हुए षोडश-राजकीयोपाख्यानका श्रीकृष्णद्वारा युधिष्ठिरके समक्ष वर्णन ( शान्ति० २९ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा पर्वत ऋषि के साथ इनके विचरने और परस्पर शाप आदिका वर्णन ( शान्ति० ३० अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको संजयपुत्र सुवर्णष्ठीविका वृत्तान्त सुनाना ( शान्ति० ३१ अध्याय ) ।
  • शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मको देखनेके लिये अन्य ऋषियोंके साथ इनका भी जाना ( शान्ति० ४७ । ५ ) ।
  • युधिष्ठिर आदिको भीष्मके धर्मविषयक प्रश्नके लिये प्रेरणा देना ( शान्ति० ५० । ८-१० ) ।
  • जाति-भाइयोंमें फूट न पड़नेके विषयमें श्रीकृष्णके प्रश्नोंका उत्तर ( शान्ति० ८१ अध्याय ) ।
  • सेमलवृक्षकी प्रशंसा ( शान्ति० १५४ । १०-३१ ) ।
  • सेमलवृक्षका अहंकार देखकर उसे फटकारना ( शान्ति० १५५ । १-१८ ) ।
  • वायुदेवके पास जाकर सेमलवृक्षकी बात कहना ( शान्ति० १५६ । २-४ ) ।
  • भगवान् विष्णुसे कृपा- याचना ( शान्ति० २०० । ४६ के बाद ) ।
  • भगवान् विष्णुका स्तवन ( शान्ति० २०१ । दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इन्द्रके साथ लक्ष्मीका दर्शन ( शान्ति० २२८ । १९६ ) ।
  • पुत्रशोकसे दुखी अकम्पनको समझाना ( शान्ति० अध्याय २४६ से २५८ तक ) ।
  • महर्षि असितदेवलसे सृष्टि विषयक प्रश्न ( शान्ति० २७० । ३ ) ।
  • महर्षि नम्रमुखसे उनकी शोकहीनताका कारण पूछना ( शान्ति० २८६ । ३-४ ) ।
  • गालवमुनिको श्रेष्यका उपदेश देना ( शान्ति० २८७ । १२-५६ ) ।
  • व्यासजीके पास आना और उनकी उदासीका कारण पूछना ( शान्ति० ३२८ । १२-१५ ) ।
  • व्यासजीको पुत्रके साथ वेदपाठ करनेको कहना ( शान्ति० ३२८ । २०-२१ ) ।
  • शुकदेवजीको वैराग्य और ज्ञान आदि विविध विषयोंका उपदेश ( शान्ति० अध्याय ३२९ से ३३३ तक ) ।
  • नर-नारायणके समक्ष सबसे श्रेष्ठ कौन है, इस बातकी जिज्ञासा ( शान्ति० ३३४ । २५-२७ ) ।
  • श्वेतद्वीपका दर्शन और वहाँके निवासियोंका वर्णन ( शान्ति० ३३५ । ९-१२ ) ।
  • दो सौ नामोंद्वारा भगवान्की स्तुति ( शान्ति० ३३८ अध्याय ) ।
  • श्वेतद्वीपमें भगवान्का दर्शन ( शान्ति० ३३९ । १-१० ) ।
  • श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके समक्ष वहाँके हृदयका वर्णन करना ( शान्ति० ३४३ । ४०-६६ ) ।
  • मार्कण्डेयजीके विविध प्रश्नोंका उत्तर देना ( अनु० २२ । दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • भीष्मके पूछनेपर पूजनीय पुरुषोंके लक्षण और उनके आदर-सत्कारसे होनेवाले लाभका वर्णन करना ( अनु० ३१ । १५-३५ ) ।
  • पञ्चचूड़ा अप्सरासे स्त्रियोंके स्वभावके विषयमें प्रश्न ( अनु० ३८ । ६ ) ।
  • भीष्मजीसे अन्नदानकी महिमाका वर्णन ( अनु० ६३ । १५-४३ ) ।
  • देवकी देवीको विभिन्न नक्षत्रोंमें विविध वस्तुओंके दानका महत्त्व बताना ( अनु० ६४ । ५-३५ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शाप खाना ( अनु० ९४ । ३० ) ।
  • पुण्डरीकको श्रेष्यके लिये भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश देना ( अनु० १२४ । दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इनके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूत-गणोंसहित शिवजीकी शोभाका वर्णन ( अनु० १४० अध्याय ) ।
  • संवर्तको पुरोहित बनानेके लिये मरुत्तको सलाह देना ( आश्रम० ६ । १८-१९ ) ।
  • मरुत्तको संवर्त का पता बताना ( आश्रम० ६ । २०-२१ ) ।
  • महर्षि देव- मतके प्रश्नोंका उत्तर देना ( आश्रम० २४ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरके अश्वमेध-यज्ञमें इनकी उपस्थिति ( आश्रम० ८८ । ३१ ) ।
  • नारदजीका प्राचीन ऋषियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना और क्षत्रवृद्धके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिको वर्णन करना ( आश्रम० २० अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके समक्ष वनमें कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दावानलसे दग्ध होनेका समाचार बताना ( आश्रम० ३७ । १-३८ ) ।
  • धृतराष्ट्र लौकिक अग्निसे नहीं, अपनी ही अग्निसे दग्ध हुए हैं—यह युधिष्ठिरको बताना और उनके लिये अञ्जलि प्रदान करनेकी आज्ञा देना ( आश्रम० ३९ । १-१८ ) ।
  • माण्डव्यके पटस मूल पैदा होनेका शाप देनेवाले ऋषियोंमें ये भी थे ( मौसल० १ । १५-२२ ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरकी प्रशंसा ( महाप्र० ३ । २६-२९ ) ।

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