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नारायण

  • भगवान् विष्णु तथा उनके अवतारभूत धर्मपुत्र नारायण, जो अपने भाई नरके साथ बदरिकाश्रममें सुवर्णमय रथपर बैठकर तपस्या करते हैं । ये स्वायम्भुव मन्वन्तरमें धर्मके यहाँ चार स्वरूपोंमें अवतीर्ण हुए थे— नर, नारायण, हरि और कृष्ण ( शान्ति० ३३४ । १-१२ ) ।
  • इनका देवताओंको समुद्र-मन्थनका आदेश ( आदि० १७ । ११-१३ ) ।
  • मोहिनीरूप धारण करके देवताओंको अमृत पिलाना ( आदि० १८ । ४५-४६ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इनके द्वारा राहुके मस्तकका उच्छेद तथा देवासुर-संग्राममें असुरोंका संहार ( आदि० १९ । ५-१०, ११-२४ ) ।
  • इन्होंने गरुड़को अपना वाहन बनाया और ध्वजमें स्थान दिया ( आदि० ३३ । १२-१७ ) ।
  • इनके कृष्ण और श्वेत केश श्रीकृष्ण और बलरामके रूपमें प्रकट हुए थे ( आदि० १९६ । ३२-३३ ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ११ । ५२-५३ ) ।
  • भीष्मद्वारा इनके स्वरूप एवं महिमाका वर्णन तथा इनके द्वारा मधु कैटभ दैत्यके वधके प्रसंगका वर्णन ( सभा० ३८ । २९ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७८१ से ७८४ तक ) ।
  • इनके वाराह, नृसिंह आदि अवतारोंका संक्षेपसे तथा श्रीकृष्णावतारका कुछ विस्तारसे वर्णन ( सभा० ३८ । पृष्ठ ७४ से ८६ तक ) ।
  • इन्द्रद्वारा इनके अवतारका वर्णन ( वन० ४७ । १० ) ।
  • इनके द्वारा इन्द्रको सान्त्वना तथा नरकासुरका वध ( वन० १४२ । २५-२७ ) ।
  • इनका वाराह अवतार और पृथ्वीका उद्धार ( वन० १४५ । ४५-४७ ) ।
  • प्रलयकालमें बालमुकुन्द रूपमें मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना ( वन० १८४ । १-४१ ) ।
  • इन्होंने कुवलाश्वमें अपने तेजको स्थापित किया ( वन० २०४ । १३ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको पार्षद-प्रदान ( शल्य० ४५ । ३० ) ।
  • इन्द्ररूपसे मन्धाताको दर्शन दिया ( शान्ति० ६४ । १४ ) ।
  • इन्द्ररूप धारण करके राजधर्मके विषयमें मान्धाताके साथ इनका संवाद ( शान्ति० ६४ । १६-३०; शान्ति० ६५ अध्याय ) ।
  • नारदजीके पूछनेपर इनका अपने आराध्य त्रिगुणरूपको पुरुष सनातन परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ बताना ( शान्ति० ३३४ । २८-४५ ) ।
  • राजा उपरिचरपर कृपा ( शान्ति० ३३७ । ३३-३५ ) ।
  • नारदजीको अपने चतुर्व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना ( शान्ति० ३३९ । ७०-१०८ ) ।
  • अपने भावी अवतारोंका वर्णन करना ( शान्ति० ३३९ । १०९-१०८ ) ।
  • ब्रह्मादि देवताओंको प्रवृत्ति-निवृत्ति आदि धर्मोंका उपदेश देना ( शान्ति० ३४० । ४४-८९ ) ।
  • शिवजीके साथ युद्ध और विजय ( शान्ति० ३४२ । ११०-११६ ) ।
  • नारदजीसे वासुदेवजीका माहात्म्य बतलाना ( शान्ति० ३४४ अध्याय ) ।
  • नारदजीसे भगवान् वासुदेवके पितरोंके पूजनकी मर्यादाका वर्णन कराना ( शान्ति० ३४५ । १२-२८ ) ।
  • इनसे मधु और कैटभकी उत्पत्ति ( शान्ति० ३४७ । २४-२६ ) ।
  • ब्रह्माजीद्वारा नारायणकी स्तुति; इनका हयग्रीवरूपसे प्रकट होकर मधु-कैटभद्वारा अपहृत हुए वेदोंको ढूँढ़ लाना और मधु-कैटभके साथ युद्ध करके उन दोनोंके वधद्वारा ब्रह्माजीका शोक दूर करना ( शान्ति० ३४७ । ६९-७१ ) ।
  • इनकी महिमाका वर्णन ( शान्ति० ३४७ । ८०-९६ ) ।
  • पौष मासमें नारायणके पूजनसे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन ( अनु० १०६ । ४ ) ।
  • इनके सहस्र नामोंका वर्णन ( अनु० १४९ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्ण इस लोकसे तिरोहित होनेके बाद अपने नारायण स्वरूपमें प्रतिष्ठित हुए ( स्वर्गा० ५ । २४ ) ।

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