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नैमिष

  • ( इसे नैमिष एवं नैमिषारण्य भी कहा जाता है । आजकल लोग इसे ‘नीमसार’ कहते हैं । यह स्थान सीतापुर जिलेमें है । ) नैमिषारण्य तीर्थमें शौनकने अपना द्वादश वार्षिक यज्ञ किया था ( आदि० १ । ९; आदि० ४ । १ ) ।
  • ऋषियोंकी प्रेरणासे सौतिने यहीं महाभारतकी सम्पूर्ण कथा सुनायी थी ( आदि० १ । ९-२५ ) ।
  • इस तीर्थमें देवताओंने यज्ञ किया था ( आदि० ११६ ।
  • (१) नैमिषारण्यमें आकर अर्जुनने उत्सर्जनी ( कमल-मण्डित गोमती ) नदीका दर्शन किया ( आदि० २१४ । ६ ) ।
  • (२) इस सिद्धक्षेत्र पुण्यमय तीर्थमें देवताओंके साथ ब्रह्माजी नित्य निवास करते हैं । नैमिषकी खोज करनेवाले पुरुषका आधा पाप क्षण भर नष्ट हो जाता है और उस तीर्थमें प्रवेश करते ही वह सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है । वहाँ तीर्थधर्ममें तत्पर हो एक मासतक निवास करना चाहिये । पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी नैमिषमें विद्यमान हैं । जो वहाँ स्नान करके नियम-पालन-पूर्वक नियमित भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका फल पाता और अपने सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है । जो नैमिषमें उपवासपूर्वक उपासना करता है, वह समस्त उपद्रवोंसे जीवनभरका अनुभव करता है । नैमिषतीर्थ नित्य पवित्र और पुण्यमय है ( वन० ८४ । ५९-६४ ) ।
  • देवर्षिसेवित प्राच्य दिशामें नैमिष नामक तीर्थ है, जहाँ भिन्न-भिन्न देवताओंके पृथक्-पृथक् पुण्यतीर्थ हैं । वहाँ देवर्षिसेवित परम रमणीय पुण्यमयी गोमती नदी है । देवताओंकी यज्ञभूमि और सूर्यका यज्ञ-पात्र विद्यमान है ( वन० ८७ । ६-७ ) ।
  • भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने नैमिषारण्य तीर्थमें आकर गंगाके पुण्य तीर्थमें स्नान, गोदान एवं धन दान किया ( वन० ९५ । १-२ ) ।

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