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पयोष्णी

  • एक परम पवित्र नदी, जो विन्ध्यपर्वतसे निकलकर दक्षिण दिशाकी ओर बहती है । राजा नलने इसे समुद्रगामिनी बताकर दमयन्तीको इसका और विन्ध्यपर्वतका दर्शन कराया था ( वन० ६१ । २२ ) ।
  • सरिताओंमें श्रेष्ठ पयोष्णीमें जाकर स्नान एवं देवता-पितरोंका पूजन करनेसे तीर्थसेवकोको सहस्र गोदानका फल मिलता है ( वन० ८५ । १० ) ।
  • राजा नृगने पयोष्णीके तटपर उत्तम वाराहतीर्थमें यज्ञ किया था; जिसमें सोम पीकर इन्द्र और दक्षिणा पाकर ब्राह्मण मस्त हो गये थे ( वन० ८८ । ४—६; वन० १२१ । १—२ ) ।
  • पयोष्णीका जल चाहे उछालकर शरीरपर पड़ गया हो, चाहे कभी लेकर मनुष्यके किये हुए समस्त पापोंको हर लेता है । यह भगवान् शङ्करका भृङ्गनामक वाच्यविशेष है, जिसके दर्शनसे मनुष्यको शिवधामकी प्राप्ति होती है । इसका माहात्म्य दूसरी सभी नदियोंसे बढ़कर है ( वन० ८८ । ७—९ ) ।
  • धर्मराज युधिष्ठिर लोमशजी, भाइयों और सेवकोंके साथ विदर्भनरेश सुमित्र तथा उत्तम तीर्थोंवाली पुष्यसालिळा पयोष्णीके तटपर गये थे । उसके जलमें यज्ञसम्बन्धी सोमरसका सम्मिश्रण हुआ था । धर्मराजने पयोष्णीके तटपर जाकर उसका जल पीया और वहाँ निवास किया ( वन० १२१ । ३१—३२ ) ।
  • अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयने इसके तटपर सात अश्वमेध यज्ञ करके सोमरसके द्वारा वज्रधारी इन्द्रको संतुष्ट किया था ( वन० १२१ । ३ ) ।
  • यह भारतकी उन प्रमुख नदियोंमेंसे है, जिसका जल भारतवासी पीते हैं ( भीष्म० ९ । २० ) ।

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