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परशुराम

  • महर्षि जमदग्निके पुत्र, माताका नाम रेणुका, इनके द्वारा समन्तपञ्चक क्षेत्रका निर्माण ( आदि० २ । ४ ) ।
  • क्षत्रियोंके रुधिरसे पितरोंका तर्पण तथा पितरों- द्वारा इनको वरदान ( आदि० २ । ५-७ ) ।
  • इन्होंने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य किया और अन्तमें महेन्द्र पर्वतपर उत्तम तपस्या की ( आदि० ६४ । ४ ) ।
  • इनके द्वारा महर्षि कश्यपको समस्त पृथ्वीका दान ( आदि० १२९ । ६२ ) ।
  • द्रोणको सम्पूर्ण अस्त्रोंकी शिक्षा ( आदि० १२९ । ६६ ) ।
  • द्रोणको ब्रह्मास्त्रका दान ( आदि० १६५ । १३ ) ।
  • ये धर्मसभामें उपस्थित होते हैं ( सभा० ८ । १९ ) ।
  • इनके द्वारा जम्भासुरके मस्तकका भेदन और शतदुन्दुभि नामक दैत्यका विनाश । इनके द्वारा इक्कीस बार क्षत्रियोंका विनाश हुआ और सहस्र- बाहु अर्जुन मारा गया । शाल्वके साथ इनका भयानक युद्ध, शाल्वके सौभविमानको नष्ट न कर सकनेके सम्बन्धमें इनके प्रति नग्निकाका कुमा- रिकाओंके वचन ( सभा० ३८ । २९ के बाद, पृष्ठ ७२२ से ७२५ तक ) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें गये थे और इनके सहित ऋषियोंने युधिष्ठिरका अभिषेक किया ( सभा० ५३ । १९ ) ।
  • परशुरामजीने भृगुतुङ्ग पर्वतपर युधिष्ठिरको उपदेश दिया था ( सभा० ७८ । १५ ) ।
  • लोमशजीद्वारा युधिष्ठिरके प्रति इनके चरित्रका वर्णन ( वन० ११६ । ४०-७१ ) ।
  • पिताकी आज्ञासे इनका अपनी माताका वध करना ( वन० ११६ । १४ ) ।
  • इनको पिताका वरदान ( वन० ११६ । १८ ) ।
  • इनके द्वारा कार्तवीर्य अर्जुनका वध ( वन० ११६ । २५ ) ।
  • कुपित हुए इनका इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे सूनी करना ( वन० ११० । १ ) ।
  • इनका यश और कश्यप आदि ब्राह्मणों- को भूमिदान ( वन० ११० । ११ ) ।
  • ये कर्णके गुरु थे ( वन० ३०२ । ९ ) ।
  • हस्तिनापुर जाते समय मार्गमें इनका अभिवादन मिलना और वार्तालाप करना ( उद्योग० ८३ । ६४ के बादसे ७२ तक ) ।
  • कौरव- सभा में दम्भोद्भवका उदाहरण देते हुए नर-नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमाका वर्णन ( उद्योग० ९६ अध्याय ) ।
  • अम्बाका कार्य करनेके लिये उसे सान्त्वना देना ( उद्योग० १०० । ३२-३३ ) ।
  • अम्बाके साथ हस्तिनापुर जाकर भीष्मसे उसे ग्रहण करनेको कहना ( उद्योग० १०८ । ३० ) ।
  • भीष्मके अस्वीकार करनेपर उन्हें मार डालनेकी धमकी देना ( उद्योग० १०८ । ३५-३६ ) ।
  • भीष्मके साथ युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें जाना ( उद्योग० १०८ । ६६ ) ।
  • इनके संकल्पमय रथका
  • वर्णन ( उद्योग० १०९ । ३-४ ) ।
  • भीष्मके साथ युद्धारम्भ ( उद्योग० १०९ । १९ से १८४ अध्याय तक ) ।
  • देवता, पितर और गान्धर्वके आग्रहसे इनका युद्ध बंद करके भृंगेश्वर संतुष्ट होना ( उद्योग० १८४ । ३६ ) ।
  • अम्बा- से अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए जानेके लिये कहना ( उद्योग० १८४ । ३ ) ।
  • संजयको समझाते हुए नारदजीद्वारा इनके चरित्रका वर्णन ( द्रोण० ७० अध्याय ) ।
  • शिवसे वरदान पाना और दानवोंका वध करना ( कर्ण० ३५ । १७४-१७५ ) ।
  • ब्राह्मणरूपधारी कर्णका रहस्य खुल जानेपर इनके द्वारा उसको शाप-दान ( कर्ण० ४ । ९ ) ।
  • इनके देखनेमात्रसे दंदनामक राक्षसका कीट-योनिसे उद्धार ( शान्ति० ३ । १९४ ) ।
  • कर्णको शाप ( शान्ति० ३ । ३०-३२ ) ।
  • इनके जन्मका प्रसंग ( शान्ति० ३ । ३१-३२ ) ।
  • तपस्याद्वारा महादेवजीसे कुठार प्राप्त करना ( शान्ति० ४९ । ३३ ) ।
  • हैहयराज अर्जुनकी भुजाओंका छेदन ( शान्ति० ४९ । ४८ ) ।
  • कार्तवीर्यके वंशका संहार ( शान्ति० ४९ । ५२-५३ ) ।
  • यज्ञान्तमें सारी पृथ्वी दक्षिणारूपमें कश्यपको दान ( शान्ति० ४९ । ६३-६४ ) ।
  • शूर्पारिक क्षेत्रमें निवास ( शान्ति० ४९ । ६६-६७ ) ।
  • मुचुकुन्दको कपोत और बहेलियेकी कथा सुनाना ( शान्ति० अध्याय १७३ से १७९ तक ) ।
  • इनके द्वारा ब्राह्मणको पृथ्वीदान ( शान्ति० २३४ । ४ ) ।
  • इन्द्रकी महिमाके विषयमें युधिष्ठिरको अपना अनु- भव सुनाना ( अनु० ९८ । १२-१५ ) ।
  • वसिष्ठ आदि ऋषियोंसे अपनी शुद्धि का उपाय पूछना ( अनु० ८४ । ३९-४० ) ।
  • इनके द्वारा भूमिदान ( अनु० १३० । १२ ) ।
  • कार्तवीर्य अर्जुनका वध ( आश्रम० २९ । ११ ) ।
  • इक्कीस बार क्षत्रियोंका संहार ( आश्रम० २९ । १८ ) ।
  • पितरोंके समझानेसे युद्धसे विरत होना और तपस्याद्वारा परमसिद्धिकी प्राप्ति ( आश्रम० ३० अध्याय ) ।

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