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परीक्षित् ( परीक्षित् )

  • (१) कुरु (१) कुमार अविक्षित्के प्रथम पुत्र । इनके क्षत्रिय पत्नीसे सुषेण, उग्रसेन, चित्रसेन, इन्द्रसेन, सुषेण तथा भीमसेन नामक छः पुत्र थे । ये सभी धर्म और अर्थके ज्ञाता थे ( आदि० ९४ । ५२-५४ ) ।
  • (२) कुरुकुमार अनघाश्वके पुत्र । इनकी माताका नाम 'अमृता' था । इनके द्वारा सुयशाके गर्भसे भीमसेनका जन्म हुआ था ( आदि० ९५ । ४१-४२ ) ।
  • (३) एक पाण्डुवंशीय सम्राट्, जो सुभद्राकुमार अभिमन्यु और उत्तराके पुत्र थे ( आश्व० ६६ अध्याय ) ।
  • इनके जन्मकालमें भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुरमें विद्यमान थे ( आश्व० ६६ । ८ ) ।
  • ये ब्रह्मस्रावसे पीड़ित होनेके कारण चेष्टाहीन शवके रूपमें उत्पन्न हुए; अतः स्वजनोंका हर्ष और शोक बढ़ानेवाले हो गये थे ( आश्व० ६६ । ९ ) ।
  • इन्हें जीवित करनेके लिये कुन्तीकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना ( आश्व० ६६ । १७-२८ ) ।
  • इन्हें जिलानेके लिये रोती हुई सुभद्राकी श्रीकृष्ण- से प्रार्थना ( आश्व० ६७ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णका प्रसूतिगृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये उसकी प्रार्थना ( आश्व० ६८ अध्याय ) ।
  • उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवनदान देना ( आश्व० ६९ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा परीक्षित्का नामकरण । उत्तराका इन्हें गोदमें लेकर श्रीकृष्णको प्रणाम करना और श्रीकृष्णका शिशु परीक्षित्के लिये बहुत-से रत्न उपहारमें देना ( आश्व० ७० । ९-१२ ) ।
  • इनकी एक मासकी अवस्था होनेपर पाण्डवोंका हिमालयसे धन लेकर आना ( आश्व० ७० । १३-१४ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा परीक्षित्का कुरुदेशके राजपुरपर अभिषेक ( महाप्रस्थान० १ । ७-८ ) ।
  • कृपाचार्यकी पूजा करके युधिष्ठिरका पुरवासियोंसहित परी- क्षित्को शिष्यभावसे उनकी सेवामें सौंपना ( महाप्रस्थान० १ । १५-१५ ) ।
  • इनका माद्रवतीके साथ विवाह और उसके गर्भसे जनमेजय आदिका जन्म ( आदि० ९५ । ८५ ) ।
  • इनके तीन पुत्र और थे—श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन ( आदि० १ । १७ ) ।
  • ये अपने प्रपितामह पाण्डुकी भाँति शिकार खेलनेके शौकीन थे ( आदि० ४० । १०-११ ) ।
  • इनका एक दिन मृगयाके लिये एक गहन वनमें जाकर एक हिंसक पशुको बींधना और उस पशुका अदृश्य हो जाना ( आदि० ४० । १३-१६ ) ।
  • थके-माँदे और प्यासे हुए राजाका शमीक मुनिके आश्रम- पर आना; अपने बाणोंसे बिंधे हुए पशुका पता पूछना और ध्यानस्थ मुनिके उत्तर न देनेपर कुपित हुए नरेशका उनके कंधेपर एक मरा हुआ साँपको डाल देना ( आदि० ४० । १७-२१ ) ।
  • राजाके दुर्व्यवहारसे दुखी हुए ऋषिकुमार कृशका शृङ्गीऋषिको उनके विरुद्ध उत्तेजित करना ( आदि० ४० । २७—३२ ) ।
  • शृङ्गी ऋषिका कुरासे राजा परीक्षित्‌के दुर्ब्यवहारकी बात जानकर अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापकी अनुचित बताना ( आदि० ४१ अध्याय ) ।
  • शमीकमुनिके भेजे हुए गौरमुखका राजा परीक्षित्‌के पास आना और शृङ्गीऋषिके दिये हुए शापकी बात बताकर उनसे आत्मरक्षाके लिये प्रयत्न करनेको कहना ( आदि० ४२ । १३—२२ ) ।
  • राजा परीक्षित्‌का पश्चात्ताप करना, मन्त्रियोंकी सलाहसे एक ही खंभेका ऊँचा महल बनवाना और रक्षाके लिये मन्त्र, औषध आदिकी आवश्यक व्यवस्था करना ( आदि० ४२ । २३—३२ ) ।
  • परीक्षित्‌की रक्षाके लिये आते हुए काश्यपको लौटाकर तक्षकका छद्मसे परीक्षित्‌के पास पहुँचकर उन्हें डँस लेना ( आदि० ४३ अध्याय ) ।
  • इनकी मृत्युसे दुखी हुए मन्त्रियोंका रोदन और इनके अल्पवयस्क पुत्र जनमेजयका राज्याभिषेक ( आदि० ४४ । १—६ ) ।
  • जनमेजयके पूछनेपर मन्त्रियोंद्वारा इनके धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन ( आदि० ४५ । ३—१८ ) ।
  • तक्षकद्वारा इनकी मृत्यु होनेका पुनः वर्णन ( आदि० अध्याय ४५ से ५० तक ) ।
  • व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने परलोकवासी पिता परीक्षित्‌का दर्शन । उनका अपने पिताको अवभृथ-स्नान करानेका तथा परीक्षित्‌का अदृश्य हो जाना ( आश्रम० ३५ । ६—९ ) ।

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